भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। उनका लांछन (चिह्न) कछुआ है। उनका जन्म राजगृही (कुशाग्र नगर) में यदुवंशी काश्यप गोत्रीय राजा सुमित्र और रानी श्यामा देवी (सोमावती) के यहाँ हुआ था। उनका शरीर नील वर्ण का था तथा उनकी ऊँचाई 20 धनुष प्रमाण थी। उन्होंने संसार के जीवों को अहिंसा, संयम, तप और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया। जैन धर्म में उनके गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणक अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाते हैं।
संक्षिप्त जानकारी
क्रम : 20वें तीर्थंकर
नाम : भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ स्वामी
चिह्न : कछुआ
जन्म स्थान : राजगृही (कुशाग्र नगर)
पिता : राजा सुमित्र
माता : रानी श्यामा देवी (सोमावती)
वंश : यदुवंश (हरिवंश)
गोत्र : काश्यप
शरीर का वर्ण : नील
ऊँचाई : 20 धनुष
मोक्ष स्थान : श्री सम्मेदशिखर जी (निर्झर कूट)
कुल आयु : 30,000 वर्ष
तीर्थंकर प्रकृति बन्ध
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने अपने पूर्वभव में चम्पापुरी के राजा हरिवर्मा के रूप में उत्कृष्ट धर्माराधना द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया था। उस जन्म की आयु पूर्ण होने पर वे प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हुए। वहाँ से आयु पूर्ण कर वे अंतिम जन्म धारण करने के लिए राजगृही नगरी में अवतरित हुए।
गर्भ कल्याणक
प्राणत स्वर्ग से च्युत होकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जीव श्रावण कृष्ण द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में राजगृही नगरी के यदुवंशी राजा सुमित्र तथा रानी श्यामा देवी के गर्भ में अवतरित हुआ। यह उनका प्रथम कल्याणक था।
गर्भ कल्याणक विवरण
स्थान : राजगृही (कुशाग्र नगर)
तिथि : श्रावण कृष्ण द्वितीया
समय : पूर्वाह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण
जन्म कल्याणक
नौ माह पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जन्म वैशाख कृष्ण दशमी के दिन राजगृही नगरी में हुआ। उनके जन्म के समय श्रवण नक्षत्र था तथा राशि मकर थी। उनका शरीर नील वर्ण का और ऊँचाई 20 धनुष प्रमाण थी।
जन्म कल्याणक विवरण
स्थान : राजगृही
तिथि : वैशाख कृष्ण दशमी
समय : पूर्वाह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण
राशि : मकर
शरीर वर्ण : नील
ऊँचाई : 20 धनुष
कुमारकाल एवं राज्यकाल
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने 7,500 वर्ष तक कुमारकाल व्यतीत किया। इसके पश्चात उन्होंने 15,000 वर्ष तक राज्य का संचालन किया। वे विवाहित थे तथा उनके मुख्य पुत्र का नाम विजय था।
दीक्षा कल्याणक
पूर्वभवों के स्मरण से भगवान के भीतर वैराग्य जागृत हुआ। उन्होंने वैशाख कृष्ण दशमी के दिन अपराह्नकाल में देवों द्वारा लाई गई अपराजिता नामक पालकी में आरूढ़ होकर राजगृही के नील वन में 240 धनुष ऊँचे चम्पक वृक्ष के नीचे एक हजार राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण की।
दीक्षा कल्याणक विवरण
वैराग्य का कारण : जातिस्मरण
तिथि : वैशाख कृष्ण दशमी
समय : अपराह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण
नगर : राजगृही
वन : नील वन
दीक्षा वृक्ष : चम्पक
सहदीक्षित : 1,000 राजा
पालकी : अपराजिता
प्रथम आहार
दीक्षा के पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने तेला का नियम धारण किया। तीन दिन बाद उन्होंने राजगृही के राजा वृषभदत्त के यहाँ दूध की खीर का प्रथम आहार ग्रहण किया।
प्रथम आहार विवरण-
उपवास नियम : तेला
दीक्षा के 3 दिन बाद प्रथम आहार
आहारदाता : राजा वृषभदत्त
आहार : दूध की खीर
केवलज्ञान कल्याणक
कठोर तप और साधना के पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी को वैशाख कृष्ण नवमी के दिन राजगृही के नील वन में चम्पक वृक्ष के नीचे केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद उन्होंने अनंत जीवों को धर्मोपदेश प्रदान किया।
केवलज्ञान विवरण
तिथि : वैशाख कृष्ण नवमी
समय : पूर्वाह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण
स्थान : नील वन, राजगृही
वृक्ष : चम्पक
समवशरण-
केवलज्ञान प्राप्ति के पश्चात धनपति कुबेर द्वारा भगवान के लिए विशाल समवशरण की रचना की गई। इस समवशरण का विस्तार ढाई योजन था। यहाँ देव, मनुष्य एवं तिर्यंच जीव समान रूप से भगवान की दिव्यध्वनि का लाभ प्राप्त करते थे।
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के मुख्य गणधर श्री मल्लि थे। उनके कुल 18 गणधर और 30,000 मुनि थे। मुख्य आर्यिका पूर्वदत्ता जी थीं तथा 50,000 आर्यिकाएँ धर्मसंघ में सम्मिलित थीं। उनके समवशरण में 1 लाख श्रावक और 3 लाख श्राविकाएँ भी धर्मश्रवण करते थे।
भगवान के मुख्य यक्ष भृकुटि देव (वरुण) तथा मुख्य यक्षिणी अपराजिता देवी (बहुरूपिणी) थीं।
मोक्ष कल्याणक
दीर्घकाल तक धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करने के पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने एक माह का योगनिरोध धारण किया। फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन सांयकाल में श्रवण नक्षत्र के समय श्री सम्मेदशिखर जी के निर्झर कूट से खड्गासन मुद्रा में एक हजार मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया।
मोक्ष कल्याणक विवरण-
तिथि : फाल्गुन कृष्ण द्वादशी
समय : सांयकाल
नक्षत्र : श्रवण
स्थान : श्री सम्मेदशिखर जी
विशिष्ट स्थान : निर्झर कूट
आसन : खड्गासन
सहमुक्त : 1,000 मुनि
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के तीर्थ से 8,800 मुनियों ने अनुत्तर विमान प्राप्त किया, 19,200 मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया तथा 2,000 मुनि पहले से ग्रैवेयक पद को प्राप्त थे।
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के समय के प्रमुख शलाका पुरुष-
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के तीर्थकाल में 10वें चक्रवर्ती श्री हरिषेण, 8वें बलदेव श्री रामचन्द्र जी, 8वें नारायण श्री लक्ष्मण तथा 8वें प्रतिनारायण श्री रावण हुए। भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी को माण्डलिक राजा का विशेष पद भी प्राप्त था।
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जीवन संदेश-
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जीवन त्याग, संयम, तप और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है। उन्होंने बताया कि आत्मा की शुद्धि ही वास्तविक सुख का मार्ग है। उनके उपदेश आज भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र की दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
प्रश्नोत्तरी में पूछें जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न-
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ कौन थे?
उत्तर : वे जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर थे।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ का चिह्न क्या है?
उत्तर : उनका चिह्न कछुआ है।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर : राजगृही (कुशाग्र नगर) में।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ के माता-पिता कौन थे?
उत्तर : राजा सुमित्र और रानी श्यामा देवी।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ का मोक्ष कहाँ हुआ था?
उत्तर : श्री सम्मेदशिखर जी के निर्झर कूट से।
स्रोत:
तिलोयपण्णत्ति
पद्मपुराण
हरिवंशपुराण
जैन परंपरागत ग्रंथ
महत्वपूर्ण बिंदु:-
भगवान बनी सुब्रत नाथ जी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर होने के साथ-साथ शनि ग्रह अनिष्ट निवारक भी आने जाते हैं उनकी पूजा से शनि ग्रह के प्रकट होने वाले दोष शांत हो जाते हैं एवं शनि द्वारा लगने वाली ढैय्या साढ़ेसाती के दोष भी मनुष्य को प्रभावित नहीं करते प्रतिदिन भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का स्तोत्र एवं चालीसा का पाठ करने से शनि पीड़ा नहीं सताती इसलिए प्रतिदिन हमें प्रभु की चालीसा का पाठ करना चाहिए एवं उनके मंत्र का जाप भी करना चाहिए आशा है आपको यह पोस्ट अच्छा लगा होगा अगर आपको यह पोस्ट अच्छा लगा तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और अपने मित्र संबंधी में हमारे ब्लॉग के बारे में जरूर बताएं तथा जिनवाणी ज्ञान को पढ़ते रहे आप सभी को सादर जय जिनेंद्र
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