रविवार, 14 जून 2026

जैन सामायिक पाठ (32 पद) | सम्पूर्ण पाठ, महत्व, शिक्षाएँ एवं आध्यात्मिक लाभ

परिचय-
जैन धर्म में सामायिक आत्मशुद्धि, समता और आत्मचिंतन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधना है। "सामायिक" शब्द का अर्थ है समभाव में स्थित होना अर्थात् राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों से दूर होकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का प्रयास करना। सामायिक के माध्यम से साधक सभी जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और क्षमा का भाव विकसित करता है तथा अपने द्वारा हुए दोषों का आत्मनिरीक्षण करता है।
प्रस्तुत सामायिक पाठ जैन परंपरा का अत्यंत लोकप्रिय और प्रेरणादायक पाठ है। इसके पदों में जीवदया, समता, आत्मज्ञान, वैराग्य, कर्म सिद्धांत, प्रायश्चित तथा मोक्षमार्ग का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। इस पाठ का नियमित अध्ययन और मनन मन को शांति प्रदान करता है तथा साधक को आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। सामायिक केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाने वाली आध्यात्मिक साधना है।

सामायिक पाठ का महत्व-
सामायिक जैन साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को सांसारिक आसक्ति, राग-द्वेष और मानसिक अशांति से ऊपर उठाकर समता की अवस्था तक पहुँचाना है। सामायिक के समय साधक सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखता है तथा अपने दोषों और भूलों का आत्मचिंतन करता है।
जैन दर्शन के अनुसार आत्मा स्वभाव से शुद्ध, ज्ञानमय और अनन्त शक्तियों से सम्पन्न है, किन्तु कर्मों के बंधन के कारण उसका वास्तविक स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता। सामायिक का अभ्यास आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाने का एक प्रभावी माध्यम माना गया है। यह पाठ साधक को संयम, विवेक, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक जागृति की प्रेरणा प्रदान करता है।

 ।।सामयिक पाठ।।
प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणीजनोंमें हर्ष प्रभो।
करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥ 1॥
यह अनन्त बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो।
ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनन्त बल दो मुझको॥ 2॥
सुख दुख बैरी बन्धु वर्ग में, काँच कनक में समता हो।
वन उपवन प्रासाद कुटी में नहीं खेद, नहिं ममता हो॥ 3॥
जिस सुन्दर तम पथ पर चलकर, जीते मोह मान मन्मथ।
वह सुन्दर पथ ही प्रभु मेरा, बना रहे अनुशीलन पथ॥ 4॥
एकेन्द्रिय आदिक जीवों की यदि मैंने हिंसा की हो।
शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह,निष्फल हो दुष्कृत्य विभो॥ 5॥
मोक्षमार्ग प्रतिकूल प्रवर्तन जो कुछ किया कषायों से।
विपथ गमन सब कालुष मेरे, मिट जावें सद्भावों से॥ 6॥
चतुर वैद्य विष विक्षत करता, त्यों प्रभु मैं भी आदि उपान्त।
अपनी निन्दा आलोचन से करता हूँ पापों को शान्त॥ 7॥
सत्य अहिंसादिक व्रत में भी मैंने हृदय मलीन किया।
व्रत विपरीत प्रवर्तन करके शीलाचरण विलीन किया॥ 8॥
कभी वासना की सरिता का, गहन सलिल मुझ पर छाया।
पी पीकर विषयों की मदिरा मुझ में पागलपन आया॥ 9॥
मैंने छली और मायावी, हो असत्य आचरण किया।
परनिन्दा गाली चुगली जो मुँह पर आया वमन किया॥ 10॥
निरभिमान उज्ज्वल मानस हो, सदा सत्य का ध्यान रहे।
निर्मल जल की सरिता सदृश, हिय में निर्मल ज्ञान बहे॥ 11॥
मुनि चक्री शक्री के हिय में, जिस अनन्त का ध्यान रहे।
गाते वेद पुराण जिसे वह, परम देव मम हृदय रहे॥12॥
दर्शन ज्ञान स्वभावी जिसने, सब विकार हों वमन किये।
परम ध्यान गोचर परमातम, परम देव मम हृदय रहे॥13॥
जो भव दुख का विध्वंसक है, विश्व विलोकी जिसका ज्ञान।
योगी जन के ध्यान गम्य वह, बसे हृदय में देव महान्॥ 14॥
मुक्ति मार्ग का दिग्दर्शक है, जनम मरण से परम अतीत।
निष्कलंक त्रैलोक्य दर्शी वह देव रहे मम हृदय समीप॥ 15॥
निखिल विश्व के वशीकरण वे, राग रहे न द्वेष रहे।
शुद्ध अतीन्द्रिय ज्ञान स्वभावी, परम देव मम हृदय रहे॥ 16॥
देख रहा जो निखिल विश्व को कर्म कलंक विहीन विचित्र।
स्वच्छ विनिर्मल निर्विकार वह देव करें मम हृदय पवित्र॥ 17॥
कर्म कलंक अछूत न जिसको कभी छू सके दिव्य प्रकाश।
मोह तिमिर को भेद चला जो परम शरण मुझको वह आप्त॥ 18॥
जिसकी दिव्य ज्योति के आगे, फीका पड़ता सूर्य प्रकाश।
स्वयं ज्ञानमय स्व पर प्रकाशी, परम शरण मुझको वह आप्त॥ 19॥
जिसके ज्ञान रूप दर्पण में, स्पष्ट झलकते सभी पदार्थ।
आदि अन्तसे रहित शान्तशिव, परम शरण मुझको वह आप्त॥
जैसे अग्नि जलाती तरु को, तैसे नष्ट हुए स्वयमेव।
भय विषाद चिन्ता नहीं जिनको, परम शरण मुझको वह देव॥
तृण, चौकी, शिल, शैलशिखर नहीं, आत्म समाधि के आसन।
संस्तर, पूजा, संघ-सम्मिलन, नहीं समाधि के साधन॥ 22॥
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, विश्व मनाता है मातम।
हेय सभी हैं विषय वासना, उपादेय निर्मल आतम॥ 23॥
बाह्य जगत कुछ भी नहीं मेरा, और न बाह्य जगत का मैं।
यह निश्चय कर छोड़ बाह्य को, मुक्ति हेतु नित स्वस्थ रमें॥
अपनी निधि तो अपने में है, बाह्य वस्तु में व्यर्थ प्रयास।
जग का सुख तो मृग तृष्णा है, झूठे हैं उसके पुरुषार्थ॥ 25॥
अक्षय है शाश्वत है आत्मा, निर्मल ज्ञान स्वभावी है।
जो कुछ बाहर है, सब पर है, कर्माधीन विनाशी है॥ 26॥
तन से जिसका ऐक्य नहीं हो, सुत, तिय, मित्रों से कैसे।
चर्म दूर होने पर तन से, रोम समूह रहे कैसे॥ 27॥
महा कष्ट पाता जो करता, पर पदार्थ, जड़-देह संयोग।
मोक्षमहल का पथ है सीधा, जड़-चेतन का पूर्ण वियोग॥ 28॥
जो संसार पतन के कारण, उन विकल्प जालों को छोड़।
निर्विकल्प निद्र्वन्द्व आत्मा, फिर-फिर लीन उसी में हो॥ 29॥
स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ, फल निश्चय ही वे देते।
करे आप, फल देय अन्य तो स्वयं किये निष्फल होते॥ 30॥
अपने कर्म सिवाय जीव को, कोई न फल देता कुछ भी।
पर देता है’ यह विचार तज स्थिर हो, छोड़ प्रमादी बुद्धि॥ 31॥
निर्मल, सत्य, शिवं सुन्दर है, ‘अमितगति’ वह देव महान।
शाश्वत निज में अनुभव करते, पाते निर्मल पद निर्वाण॥ 32॥
दोहा
इन बत्तीस पदों से जो कोई, परमातम को ध्याते हैं।
साँची सामायिक को पाकर, भवोदधि तर जाते हैं॥

सामायिक पाठ की शिक्षाएँ-
सामायिक पाठ हमें सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि किसी भी जीव के प्रति द्वेष, हिंसा या घृणा का भाव आत्मकल्याण में बाधक है। पाठ में समता का विशेष महत्व बताया गया है, जिसके अनुसार सुख-दुःख, लाभ-हानि, मित्र-शत्रु तथा मान-अपमान जैसी परिस्थितियों में समान भाव रखना चाहिए।
यह पाठ आत्मा और शरीर के भेद का ज्ञान कराता है तथा बताता है कि आत्मा शाश्वत, चेतन और ज्ञानस्वरूप है जबकि शरीर नश्वर और परिवर्तनशील है। सामायिक पाठ आत्मचिंतन, प्रायश्चित और आत्मसुधार की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। इसमें कर्म सिद्धांत का सुंदर वर्णन मिलता है और यह समझाया गया है कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है।
पाठ में वैराग्य, संयम और मोक्षमार्ग की प्रेरणा भी निहित है। यह साधक को बाहरी विषयों और मोह-माया से हटाकर आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होने का संदेश देता है।

सामायिक पाठ के लाभ-
सामायिक पाठ का नियमित अध्ययन और मनन मन को शांति प्रदान करता है। इससे क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाओं में कमी आती है तथा मैत्री, करुणा और क्षमा जैसे श्रेष्ठ गुणों का विकास होता है।
यह पाठ आत्मचिंतन की आदत विकसित करता है और व्यक्ति को अपनी भूलों को पहचानने तथा उन्हें सुधारने की प्रेरणा देता है। सामायिक का अभ्यास मानसिक संतुलन बढ़ाता है और जीवन में समता की भावना को मजबूत करता है। धार्मिक दृष्टि से यह आत्मशुद्धि, पुण्य संचय और आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
सामायिक पाठ के माध्यम से साधक धीरे-धीरे आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने लगता है और मोक्षमार्ग के प्रति उसकी श्रद्धा और दृढ़ होती जाती है।

निष्कर्ष-
सामायिक पाठ जैन धर्म की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर है। इसके प्रत्येक पद में आत्मकल्याण, समता, करुणा, संयम और मोक्षमार्ग का गहन संदेश निहित है। यह पाठ केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि जीवन को धर्ममय, शांत और संतुलित बनाने की प्रेरणा प्रदान करता है। जो साधक श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ सामायिक पाठ का अध्ययन तथा मनन करता है, वह आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में निरंतर आगे बढ़ सकता है।

FAQ-
सामायिक क्या है?
सामायिक जैन धर्म की एक महत्वपूर्ण साधना है जिसका उद्देश्य समता भाव में स्थित होकर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि करना है।
सामायिक पाठ में मुख्य रूप से क्या वर्णित है?
सामायिक पाठ में मैत्री, करुणा, समता, आत्मज्ञान, प्रायश्चित, कर्म सिद्धांत और मोक्षमार्ग का वर्णन मिलता है।
सामायिक पाठ का नियमित अध्ययन क्यों करना चाहिए?
नियमित अध्ययन से मन की शांति, आत्मचिंतन, समता भाव और आध्यात्मिक जागृति का विकास होता है।
क्या सामायिक केवल जैन साधकों के लिए ही उपयोगी है?
यद्यपि यह जैन परंपरा का पाठ है, किन्तु इसमें वर्णित समता, करुणा, क्षमा और आत्मचिंतन के सिद्धांत सभी के लिए प्रेरणादायक हैं।
सामायिक का मुख्य उद्देश्य क्या है?
सामायिक का मुख्य उद्देश्य राग-द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर होना और मोक्षमार्ग की साधना करना है।

स्रोत-
सामायिक पाठ को कई ग्रन्थों से लिया गया हैं जैसे भावना द्वात्रिंशतका, भगवती आराधना, रत्नकरण्डक श्रावकाचार आदि। जिनमें आचार्य अमितगति जी का सामायिक पद्यानुवाद अत्यंत प्रचलित हैं।

महत्वपूर्ण बिंदु-
सामायिक पाठ क्यों किया जाता है सामायिक पाठ से कर्मों की निर्जरा होती हैं। आत्मा की विशुद्धि हेतु इस पाठ को प्रतिदिन किया जाता हैं। जैन श्रावक प्रतिदिन तीनों पहर इस पाठ को करते है।

श्री मल्लिनाथ चालीसा | सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, लाभ एवं महत्व (Mallinath Chalisa)

जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ-
जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में भगवान मल्लिनाथ का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पूजनीय है। वे जैन परंपरा के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं, जिनकी भक्ति से भक्तों के जीवन में शांति, ज्ञान और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। "श्री मल्लिनाथ चालीसा" एक ऐसी पवित्र स्तुति है जिसमें भगवान मल्लिनाथ के जीवन, उनके त्याग, तपस्या और केवलज्ञान की प्राप्ति का अद्भुत वर्णन किया गया है। यह चालीसा न केवल एक धार्मिक रचना है, बल्कि यह आत्मा की उन्नति का मार्गदर्शक भी है।
प्रतिदिन इस चालीसा का पाठ करने से भक्त के जीवन में रोग, शोक और संकट दूर होते हैं। मन को शांति मिलती है और आत्मा परमात्मा की ओर उन्मुख होती है। इस लेख में हम श्री मल्लिनाथ चालीसा के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे — उनका जन्म, जीवन, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष — और जानेंगे कि यह चालीसा हमारे जीवन को किस प्रकार सुख और समृद्धि से भर सकती है।

भगवान मल्लिनाथ का परिचय-
भगवान मल्लिनाथ जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं। उनका जन्म मिथिला नगरी में हुआ था, जो आज के बिहार राज्य में स्थित है। उनके पिता का नाम राजा कुम्भ था और उनकी माता एक अत्यंत सात्विक और धर्मपरायण महिला थीं। भगवान मल्लिनाथ के जन्म के समय मिथिला नगरी में रत्नों की वृष्टि हुई थी, जो इस बात का संकेत था कि यह बालक साधारण नहीं, बल्कि संसार को मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला महान आत्मा है।
चालीसा में इस अद्भुत पल का वर्णन इस प्रकार किया गया है:
मिथिला नगरी धन्य हो गयी। रत्नों की वृष्टि भी हो गयी।
राजा कुम्भ घर शहनाई। माँ आंगन में बजी बधाई।।
भगवान मल्लिनाथ के जन्म के समय इंद्र ने स्वयं आकर तांडव नृत्य किया, देवताओं ने उत्सव मनाया और समस्त प्रकृति ने उनके स्वागत में अपनी छटा बिखेरी। वृक्ष फलों से लद गए, बागों में फूल खिल उठे और कोयल ने मीठे गीत गाए। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि भगवान मल्लिनाथ के रूप में संसार में एक असाधारण आत्मा का अवतरण हुआ है।
बाल्यकाल और आध्यात्मिक चेतना
भगवान मल्लिनाथ बचपन से ही अन्य बच्चों से बिल्कुल अलग थे। जहाँ अन्य बालक खेल-कूद में मग्न रहते थे, वहीं मल्लिनाथ जी ज्ञान, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते थे। मात्र आठ वर्ष की आयु में ही उन्होंने अणुव्रत धारण कर लिए थे — यह वे पाँच छोटे व्रत हैं जो जैन गृहस्थ धर्म की नींव माने जाते हैं।
चालीसा में उनके बाल्यकाल की इस विशेषता का सुंदर वर्णन है:
आठ वर्ष में अणुव्रत धारे। सब बालक में वे थे न्यारे।।
आगम के अनुरूप थी चर्या। चलने में समती थी ईर्या।।
उनकी वाणी में जिनवाणी की मिठास थी। वे कभी किसी को नहीं सताते थे, सबको अच्छी बातें बताते थे। छोटी सी आयु में ही वे ऐसे गुरु प्रतीत होते थे जिनके पास बैठकर नर-नारी दोनों को मन की शांति मिलती थी। उनके भावों की शुद्धता और आत्मा की पवित्रता देखकर सभी उनके प्रति श्रद्धा से नत हो जाते थे।
मति, श्रुति और अवधि — इन तीनों ज्ञानों के वे धारक थे। इतनी कम आयु में इतना गहन ज्ञान होना यह सिद्ध करता था कि भगवान मल्लिनाथ वास्तव में एक महान तीर्थंकर के रूप में इस संसार में आए थे।

वैराग्य और दीक्षा ग्रहण-
जब युवावस्था आई, तो माता-पिता ने विवाह की तैयारी शुरू कर दी। महलों को सजाया गया, मिथिलापुर में उत्सव की तैयारियाँ हुईं। किंतु भगवान मल्लिनाथ के मन में संसार के प्रति वैराग्य पहले से ही जड़ जमा चुका था। उन्होंने विवाह करने से इनकार कर दिया, क्योंकि वे जानते थे कि संसार के ये क्षणभंगुर सुख आत्मा की मुक्ति में बाधक हैं।

चालीसा में इस महत्वपूर्ण मोड़ का वर्णन बड़े ही भावपूर्ण तरीके से किया गया है:
किंतु मन वैराग्य समाया। शादी करना मन न भाया।।
बने दिगम्बर लेली दीक्षा। क्षणभंगुर सुख तज दी इच्छा।।

भगवान मल्लिनाथ जी को वैराग्य उत्पत्ति एवं दिगम्बर दीक्षा ग्रहण करना-
अर्थात् उन्होंने समस्त वस्त्रों, संपत्ति और सांसारिक संबंधों का त्याग कर दिया। यह दीक्षा केवल बाहरी त्याग नहीं थी, बल्कि यह आंतरिक इच्छाओं, अहंकार और मोह से भी मुक्ति का संकल्प था। दिगम्बर दीक्षा का अर्थ है आकाश को ही वस्त्र मान लेना — यानी प्रकृति के साथ एकाकार होकर आत्मसाधना में लीन हो जाना।
यह साहसिक कदम हमें सिखाता है कि जब आत्मा में सच्चा वैराग्य जागता है, तो संसार की कोई भी सुख-सुविधा उसे रोक नहीं सकती। यह वैराग्य भय से नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक से उत्पन्न होता है।

तपस्या और केवलज्ञान की प्राप्ति-
दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् भगवान मल्लिनाथ वन में चले गए। वहाँ उन्होंने घोर तपस्या की। आत्मा में ध्यान लगाया और कर्मों को नष्ट करने का संकल्प लिया। उन्होंने मिथिला में ही एक बार आहार किया, जिसे पाकर नन्दीषेण को महान पुण्य प्राप्त हुआ।
चालीसा में इस तपस्या काल का वर्णन इस प्रकार है:
जंगल में ही वास बसाया। आतम में ही ध्यान लगाया।।
कर्म भी डरकर शीघ्र ही भागे। केवलज्ञान का दीप भी जागे।।
भगवान मल्लिनाथ की साधना के परिणामस्वरूप उनके सभी घाती कर्म नष्ट हो गए और उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। केवलज्ञान अर्थात् वह पूर्ण, असीमित और अनंत ज्ञान जो त्रिकाल और त्रिलोक को एक साथ जान लेता है। जब यह केवलज्ञान प्रकट हुआ, तो चारों दिशाओं में प्रकाश फैल गया।
इंद्र ने आज्ञा दी और धनकुबेर (कुबेर) ने समवसरण की रचना की। देवता और मनुष्य दौड़-दौड़कर आए और वीतराग प्रभु के दर्शन का लाभ उठाया। उनकी दिव्य मुद्रा को देखकर सूर्य और चंद्रमा भी फीके पड़ गए। यह वह क्षण था जब एक साधक तीर्थंकर के रूप में संसार के सामने प्रकट हुआ।

भगवान मल्लिनाथ की महिमा और चमत्कार-
जैन परंपरा में तीर्थंकरों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा जाता है कि उनके दर्शन मात्र से ही भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं। चालीसा में भी भगवान मल्लिनाथ की इसी अलौकिक महिमा का वर्णन किया गया है:
अंधा प्रभु का दर्शन करता। लँगड़ा भी सीढ़ी चढ़ जाता।।
बेहरा प्रभु की वाणी सुनता। मिथ्यादृष्टि सिर को धुनता।।
पगले को बुद्धि मिल जाती। ध्यानी को मुक्ति मिल जाती।।
यह पंक्तियाँ हमें बताती हैं कि भगवान मल्लिनाथ के प्रति सच्ची आस्था और श्रद्धा रखने वाले भक्त को कभी निराशा नहीं होती। उनकी भक्ति से न केवल शारीरिक रोग और कष्ट दूर होते हैं, बल्कि मन की व्याकुलता भी शांत होती है। जो व्यक्ति मिथ्यादृष्टि (भ्रमित दृष्टिकोण) में फँसा है, वह भी उनकी शरण में आकर सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकता है।
दुष्ट कर्म उनके समीप नहीं आते, रोग-शोक और बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। यह महिमा केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि जब भक्त सच्चे मन से वीतराग प्रभु का ध्यान करता है, तो उसका मन स्वयं ही शुद्ध और शांत हो जाता है, और शांत मन ही सभी रोगों की सबसे बड़ी औषधि है।

मोक्ष और परमातम पद की प्राप्ति-
भगवान मल्लिनाथ ने अपनी तपस्या और साधना के अंतिम चरण में श्री सम्मेद शिखर (झारखंड में स्थित जैनियों का सबसे पवित्र तीर्थ) पर जाकर योगनिरोध किया। योगनिरोध का अर्थ है — मन, वचन और काय की समस्त क्रियाओं को रोककर समाधि में लीन हो जाना।
चालीसा में इस परम घटना का वर्णन इस प्रकार है:
श्री सम्मेद शिखर जा पहुँचे। बैठे वहां पे आँखे मीचे।।
योगनिरोध से कर्म नशाये। फिर मुक्ति में वास वसाये।।
परमातम पद आपने पाया। भक्तों ने है शीश झुकाया।।
इस प्रकार भगवान मल्लिनाथ ने समस्त कर्मों को नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया और परमातम पद को प्राप्त किया। जैन दर्शन में मोक्ष का अर्थ है — आत्मा का उस अवस्था को प्राप्त करना जहाँ वह सभी कर्म-बंधनों से मुक्त होकर अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति को प्राप्त करती है। यही जैन धर्म का परम लक्ष्य है।

चालीसा पाठ का महत्व और लाभ-
श्री मल्लिनाथ चालीसा का नित्य पाठ करने से अनेक लाभ होते हैं। चालीसा के दोहे में स्पष्ट कहा गया है:
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि सिद्धि समृद्धि हो होवें भव से पार।।
लगातार चालीस दिनों तक इस चालीसा का पाठ करने से रिद्धि (भौतिक समृद्धि), सिद्धि (आध्यात्मिक उन्नति) और समृद्धि (सर्वांगीण विकास) की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही भव (संसार के जन्म-मृत्यु के चक्र) से पार जाने का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

इस चालीसा का पाठ करने वाले भक्त को क्या लाभ प्राप्त होते हैं:
आत्मिक लाभ: मन में शांति आती है, आत्मा शुद्ध होती है और मुक्ति का मार्ग स्पष्ट होता है।
मानसिक लाभ: चिंता, भय और मानसिक अशांति दूर होती है। ध्यान की शक्ति बढ़ती है।
शारीरिक लाभ: रोग और बीमारियाँ दूर होती हैं। स्वास्थ्य में सुधार होता है।
सांसारिक लाभ: दुख और संकट कम होते हैं। जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

भक्ति का सार-
श्री मल्लिनाथ चालीसा केवल एक स्तुति नहीं है, यह एक जीवन-दर्शन है। इसमें हमें यह सिखाया गया है कि संसार के सुख क्षणभंगुर हैं और आत्मा की उन्नति ही जीवन का असली उद्देश्य है। भगवान मल्लिनाथ का जीवन हमें बताता है कि चाहे राजकुल में जन्म मिले, चाहे सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध हों — फिर भी जब आत्मा में सच्चा वैराग्य जागता है, तो साधक उन सबको छोड़कर मुक्ति के पथ पर चल देता है।
चालीसा की ये पंक्तियाँ विशेष रूप से मार्मिक हैं:
चिंतन में प्रभु मेरे रहना। और नही कुछ तुमसे कहना।।
शुद्ध भाव से तुमको ध्याऊँ। नित चरणों में शीश झुकाऊँ।।
यह भक्त की वह अवस्था है जहाँ वह परमात्मा से कुछ माँगता नहीं, बस उनके चरणों में अपना सिर झुकाता है और उनके चिंतन में लीन रहता है। यही सच्ची भक्ति है — निर्लोभ, निःस्वार्थ और शुद्ध।

निष्कर्ष-
श्री मल्लिनाथ चालीसा जैन परंपरा की एक अमूल्य धरोहर है। यह हमें भगवान मल्लिनाथ के जीवन की उस यात्रा से परिचित कराती है जो मिथिला के राजमहल से शुरू होकर सम्मेद शिखर पर मोक्ष में समाप्त होती है। इस यात्रा में त्याग है, तपस्या है, ज्ञान है और अंततः परम मुक्ति है।
जो भी भक्त सच्चे मन से इस चालीसा का पाठ करता है, वह न केवल अपने जीवन के कष्टों से राहत पाता है, बल्कि धीरे-धीरे आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। भगवान मल्लिनाथ का आशीर्वाद उन सभी पर बना रहे जो इस चालीसा को श्रद्धा के साथ पढ़ते हैं और उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
मल्लिनाथ भगवान से, विनती बारम्बार।
दुख संकट मेरे नशे, नमन है शत शत बार।।

दर्शकों आइये हम भी इस चालीसा का सम्पूर्ण पाठ करते है एवं आत्मोन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं-


।।श्री मल्लिनाथ चालीसा।।

दोहा:-
परमेष्ठी की भक्ति ही, करती पाप से दूर।
जिनवाणी की आरती, देती सुख भरपूर।।
मल्लिनाथ भगवान के, चरणन शीश झुकाये।
चालीसा मैं नित पढूं रोग शोक नश जाएं।।

चोपाई:-

ज्ञान ज्योति में मेरे जिनवर।
ध्यान मती में मेरे जिनवर।।
मल्लिनाथ जी नाम तुम्हारा।
चरणों में है नमन हमारा।।

सर्वगुणी और अनुपम ज्ञानी।
वाणी आपकी है जिनवाणी।।
मुक्ति सुख का आनन्द लेते।
भक्तों को शुभ ज्ञान भी देते।।

मिथिला नगरी धन्य हो गयी।
रत्नों की वृष्टि भी हो गयी।।
राजा कुम्भ घर शहनाई।
माँ आंगन में बजी बधाई।।

गर्भ, जन्म कल्याणक पाये।
सुर नर मिल उत्सव को गाये।।
खुश हो नाच नाचकर गाये।
तांडव नृत्य भी इंद्र दिखाये।।

बागों में आई फुलवारी।
वृक्ष फलों से लदे थे भारी।।
कोयल मीठे भजन सुनावे।
सबका मन पुलकित हो जावे।।

जिनवर मीठी बोली बोले।
मात- पिता सबका मन डोले।।
मति- श्रुति- अवधि ज्ञान के धारी।
भाव शुद्ध हो आत्मबिहारी।।

आठ वर्ष में अणुव्रत धारे।
सब बालक में वे थे न्यारे।।
आगम के अनुरूप थी चर्या।
चलने में समती थी ईर्या।।

नही किसी को आप सताते।
अच्छी अच्छी बात बताते।।
छोटे से गुरु आप ही लगते।
नर नारी के भाव उमड़ते।।

यौवन की जब बारी आई।
मात पिता ने करी सगाई।।
महलों में हो गयी तैयारी।
मिथिलापुर की शोभा न्यारी।।

किंतु मन वैराग्य समाया।
शादी करना मन न भाया।।
बने दिगम्बर लेली दीक्षा।
क्षणभंगुर सुख तज दी इच्छा।।

जंगल में ही वास बसाया।
आतम में ही ध्यान लगाया।।
मिथिला में आहार किया था।
नन्दीषेण ने पुण्य लिया था।।

कर्म भी डरकर शीघ्र ही भागे।
केवलज्ञान का दीप भी जागे।।
चारों और हुआ उजियाला।
भक्त फेरते आपकी माला।।

इंद्र ने आज्ञा तब कर दीनी।
धनकुबेर रचना कर दीनी।।
दौड़ दौड़कर सुर नर आये।
वीतराग प्रभु की छवि पाये।।

लख मुद्रा मोहित हो जाते।
सूर्य चाँद फीके पड़ जाते।।
दुष्ट कर्म भी पास न आवे।
रोग शोक बीमारी जावे।।

अंधा प्रभु का दर्शन करता।
लँगड़ा भी सीढ़ी चढ़ जाता।।
बेहरा प्रभु की वाणी सुनता।
मिथ्यादृष्टि सिर को धुनता।।

पगले को बुद्धि मिल जाती।
ध्यानी को मुक्ति मिल जाती।।
हम भी प्रभु जी भक्त तुम्हारे।
मिले आपके चरण सहारे।।

भाव विभाव सभी मिट जावे।
मुक्ति पथ पर हम भी जावे।।
क्षणभंगुर सुख की इच्छाएं।
हमको ये संसार घुमाएं।।

बस मन में शांति हो जावे।
हर क्षण तेरा ध्यान लगावे।।
श्री सम्मेद शिखर जा पहुँचे।
बैठे वहां पे आँखे मीचे।।

योगनिरोध से कर्म नशाये।
फिर मुक्ति में वास वसाये।।
परमातम पद आपने पाया।
भक्तों ने है शीश झुकाया।।

चिंतन में प्रभु मेरे रहना।
और नही कुछ तुमसे कहना।।
शुद्ध भाव से तुमको ध्याऊँ।
नित चरणों में शीश झुकाऊँ।।

दोहा:-
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि सिद्धि समृद्धि हो होवें भव से पार।।
मल्लिनाथ भगवान से, विनती बारम्बार।
दुख संकट मेरे नशे, नमन है शत शत बार।।

20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का सम्पूर्ण जीवन परिचय | पंचकल्याणक, समवशरण एवं मोक्ष

भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। उनका लांछन (चिह्न) कछुआ है। उनका जन्म राजगृही (कुशाग्र नगर) में यदुवंशी काश्यप गोत्रीय राजा सुमित्र और रानी श्यामा देवी (सोमावती) के यहाँ हुआ था। उनका शरीर नील वर्ण का था तथा उनकी ऊँचाई 20 धनुष प्रमाण थी। उन्होंने संसार के जीवों को अहिंसा, संयम, तप और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया। जैन धर्म में उनके गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणक अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाते हैं।

संक्षिप्त जानकारी
क्रम : 20वें तीर्थंकर
नाम : भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ स्वामी
चिह्न : कछुआ
जन्म स्थान : राजगृही (कुशाग्र नगर)
पिता : राजा सुमित्र
माता : रानी श्यामा देवी (सोमावती)
वंश : यदुवंश (हरिवंश)
गोत्र : काश्यप
शरीर का वर्ण : नील
ऊँचाई : 20 धनुष
मोक्ष स्थान : श्री सम्मेदशिखर जी (निर्झर कूट)
कुल आयु : 30,000 वर्ष

तीर्थंकर प्रकृति बन्ध
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने अपने पूर्वभव में चम्पापुरी के राजा हरिवर्मा के रूप में उत्कृष्ट धर्माराधना द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया था। उस जन्म की आयु पूर्ण होने पर वे प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हुए। वहाँ से आयु पूर्ण कर वे अंतिम जन्म धारण करने के लिए राजगृही नगरी में अवतरित हुए।

गर्भ कल्याणक
प्राणत स्वर्ग से च्युत होकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जीव श्रावण कृष्ण द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में राजगृही नगरी के यदुवंशी राजा सुमित्र तथा रानी श्यामा देवी के गर्भ में अवतरित हुआ। यह उनका प्रथम कल्याणक था।

गर्भ कल्याणक विवरण
स्थान : राजगृही (कुशाग्र नगर)
तिथि : श्रावण कृष्ण द्वितीया
समय : पूर्वाह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण

जन्म कल्याणक
नौ माह पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जन्म वैशाख कृष्ण दशमी के दिन राजगृही नगरी में हुआ। उनके जन्म के समय श्रवण नक्षत्र था तथा राशि मकर थी। उनका शरीर नील वर्ण का और ऊँचाई 20 धनुष प्रमाण थी।

जन्म कल्याणक विवरण
स्थान : राजगृही
तिथि : वैशाख कृष्ण दशमी
समय : पूर्वाह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण
राशि : मकर
शरीर वर्ण : नील
ऊँचाई : 20 धनुष

कुमारकाल एवं राज्यकाल
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने 7,500 वर्ष तक कुमारकाल व्यतीत किया। इसके पश्चात उन्होंने 15,000 वर्ष तक राज्य का संचालन किया। वे विवाहित थे तथा उनके मुख्य पुत्र का नाम विजय था।

दीक्षा कल्याणक
पूर्वभवों के स्मरण से भगवान के भीतर वैराग्य जागृत हुआ। उन्होंने वैशाख कृष्ण दशमी के दिन अपराह्नकाल में देवों द्वारा लाई गई अपराजिता नामक पालकी में आरूढ़ होकर राजगृही के नील वन में 240 धनुष ऊँचे चम्पक वृक्ष के नीचे एक हजार राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण की।

दीक्षा कल्याणक विवरण
वैराग्य का कारण : जातिस्मरण
तिथि : वैशाख कृष्ण दशमी
समय : अपराह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण
नगर : राजगृही
वन : नील वन
दीक्षा वृक्ष : चम्पक
सहदीक्षित : 1,000 राजा
पालकी : अपराजिता
प्रथम आहार
दीक्षा के पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने तेला का नियम धारण किया। तीन दिन बाद उन्होंने राजगृही के राजा वृषभदत्त के यहाँ दूध की खीर का प्रथम आहार ग्रहण किया।

प्रथम आहार विवरण-
उपवास नियम : तेला
दीक्षा के 3 दिन बाद प्रथम आहार
आहारदाता : राजा वृषभदत्त
आहार : दूध की खीर

केवलज्ञान कल्याणक
कठोर तप और साधना के पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी को वैशाख कृष्ण नवमी के दिन राजगृही के नील वन में चम्पक वृक्ष के नीचे केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद उन्होंने अनंत जीवों को धर्मोपदेश प्रदान किया।

केवलज्ञान विवरण
तिथि : वैशाख कृष्ण नवमी
समय : पूर्वाह्नकाल
नक्षत्र : श्रवण
स्थान : नील वन, राजगृही
वृक्ष : चम्पक

समवशरण-
केवलज्ञान प्राप्ति के पश्चात धनपति कुबेर द्वारा भगवान के लिए विशाल समवशरण की रचना की गई। इस समवशरण का विस्तार ढाई योजन था। यहाँ देव, मनुष्य एवं तिर्यंच जीव समान रूप से भगवान की दिव्यध्वनि का लाभ प्राप्त करते थे।

भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के मुख्य गणधर श्री मल्लि थे। उनके कुल 18 गणधर और 30,000 मुनि थे। मुख्य आर्यिका पूर्वदत्ता जी थीं तथा 50,000 आर्यिकाएँ धर्मसंघ में सम्मिलित थीं। उनके समवशरण में 1 लाख श्रावक और 3 लाख श्राविकाएँ भी धर्मश्रवण करते थे।
भगवान के मुख्य यक्ष भृकुटि देव (वरुण) तथा मुख्य यक्षिणी अपराजिता देवी (बहुरूपिणी) थीं।



मोक्ष कल्याणक
दीर्घकाल तक धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करने के पश्चात भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी ने एक माह का योगनिरोध धारण किया। फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन सांयकाल में श्रवण नक्षत्र के समय श्री सम्मेदशिखर जी के निर्झर कूट से खड्गासन मुद्रा में एक हजार मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया।

मोक्ष कल्याणक विवरण-
तिथि : फाल्गुन कृष्ण द्वादशी
समय : सांयकाल
नक्षत्र : श्रवण
स्थान : श्री सम्मेदशिखर जी
विशिष्ट स्थान : निर्झर कूट
आसन : खड्गासन
सहमुक्त : 1,000 मुनि

भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के तीर्थ से 8,800 मुनियों ने अनुत्तर विमान प्राप्त किया, 19,200 मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया तथा 2,000 मुनि पहले से ग्रैवेयक पद को प्राप्त थे।

भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के समय के प्रमुख शलाका पुरुष-
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के तीर्थकाल में 10वें चक्रवर्ती श्री हरिषेण, 8वें बलदेव श्री रामचन्द्र जी, 8वें नारायण श्री लक्ष्मण तथा 8वें प्रतिनारायण श्री रावण हुए। भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी को माण्डलिक राजा का विशेष पद भी प्राप्त था।

भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जीवन संदेश-
भगवान मुनिसुव्रतनाथ स्वामी का जीवन त्याग, संयम, तप और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है। उन्होंने बताया कि आत्मा की शुद्धि ही वास्तविक सुख का मार्ग है। उनके उपदेश आज भी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र की दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।

प्रश्नोत्तरी में पूछें जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न-
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ कौन थे?
उत्तर : वे जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर थे।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ का चिह्न क्या है?
उत्तर : उनका चिह्न कछुआ है।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर : राजगृही (कुशाग्र नगर) में।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ के माता-पिता कौन थे?
उत्तर : राजा सुमित्र और रानी श्यामा देवी।
प्रश्न : भगवान मुनिसुव्रतनाथ का मोक्ष कहाँ हुआ था?
उत्तर : श्री सम्मेदशिखर जी के निर्झर कूट से।

स्रोत:
तिलोयपण्णत्ति
पद्मपुराण
हरिवंशपुराण
जैन परंपरागत ग्रंथ

महत्वपूर्ण बिंदु:-
भगवान बनी सुब्रत नाथ जी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर होने के साथ-साथ शनि ग्रह अनिष्ट निवारक भी आने जाते हैं उनकी पूजा से शनि ग्रह के प्रकट होने वाले दोष शांत हो जाते हैं एवं शनि द्वारा लगने वाली ढैय्या साढ़ेसाती के दोष भी मनुष्य को प्रभावित नहीं करते प्रतिदिन भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का स्तोत्र एवं चालीसा का पाठ करने से शनि पीड़ा नहीं सताती इसलिए प्रतिदिन हमें प्रभु की चालीसा का पाठ करना चाहिए एवं उनके मंत्र का जाप भी करना चाहिए आशा है आपको यह पोस्ट अच्छा लगा होगा अगर आपको यह पोस्ट अच्छा लगा तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और अपने मित्र संबंधी में हमारे ब्लॉग के बारे में जरूर बताएं तथा जिनवाणी ज्ञान को पढ़ते रहे आप सभी को सादर जय जिनेंद्र


शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

                        ।। श्री अनन्तनाथ चालीसा।।

अनन्त चतुष्टय धारी ‘अनन्त, अनन्त गुणों की खान “अनन्त’ ।
सर्वशुद्ध ज्ञायक हैं अनन्त, हरण करें मम दोष अनन्त ।
नगर अयोध्या महा सुखकार, राज्य करें सिहंसेन अपार ।
सर्वयशा महादेवी उनकी, जननी कहलाई जिनवर की ।
द्वादशी ज्येष्ठ कृष्ण सुखकारी, जन्मे तीर्थंकर हितकारी ।
इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, न्हवन करें मेरु पर जाकर ।
नाम “अनन्तनाथ’ शुभ दीना, उत्सव करते नित्य नवीना ।
सार्थक हुआ नाम प्रभुवर का, पार नहीं गुण के सागर का ।
वर्ण सुवर्ण समान प्रभु का, ज्ञान धरें मति- श्रुत- अवधि का ।
आयु तीस लख वर्ष उपाई, धनुष अर्धशत तन ऊंचाई ।
बचपन गया जवानी आई, राज्य मिला उनको सुखदाई ।
हुआ विवाह उनका मंगलमय, जीवन था जिनवर का सुखमय ।
पन्द्रह लाख बरस बीते जब, उल्कापात से हुए विरक्त तब ।
जग में सुख पाया किसने-कब, मन से त्याग राग भाव सब ।
बारह भावना मन में भाये, ब्रह्मर्षि वैराग्य बढाये ।
“अनन्तविजय” सुत तिलक-कराकर, देवोमई शिविका पधरा कर ।
गए सहेतुक वन जिनराज, दीक्षित हुए सहस नृप साथ ।
द्वादशी कृष्ण ज्येष्ठ शुभ मास, तीन दिन का धारा उपवास ।
गए अयोध्या प्रथम योग कर, धन्य ‘विशाख’ आहार करा कर ।
मौन सहित रहते थे वन में, एक दिन तिष्ठे पीपल- तल में ।
अटल रहे निज योग ध्यान में, झलके लोकालोक ज्ञान में ।
कृष्ण अमावस चैत्र मास की, रचना हुई शुभ समवशरण की ।
जिनवर की वाणी जब खिरती, अमृत रस कानों को लगती ।
चतुर्गति दुख चित्रण करते, भविजन सुन पापों से डरते ।
जो चाहो तुम मुक्ति पाना, निज आतम की शरण में जाना ।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित है, कहे व्यवहार मेँ रतनत्रय हैं ।
निश्चय से शुद्धातम ध्याकर, शिवपद मिलता सुख रत्नाकर ।
श्रद्धा करके भव्य जनों ने, यथाशक्ति व्रत धारे सबने ।
हुआ विहार देश और प्रान्त, सत्पथ दर्शाये जिननाथ ।
अन्त समय गए सम्मेदाचल, एक मास तक रहे सुनिश्चल ।
कृष्ण चैत्र अमावस पावन, मोक्षमहल पहुंचे मनभावन ।
उत्सव करते सुरगण आकर, कूट स्वयंप्रभ मन में ध्याकर ।
शुभ लक्षण प्रभुवर का ‘सेही’, शोभित होता प्रभु- पद में ही ।
अरुणा अरज करे बस ये ही, पार करो भवसागर से ही ।
है प्रभु लोकालोक अनन्त, झलकें सब तुम ज्ञान अनन्त ।

हुआ अनन्त भवों का अन्त, अद्भुत तुम महिमा है “अनन्त’ ।

रविवार, 1 अप्रैल 2018

                           ।।श्री अरहनाथ चालीसा।।

दोहा:-
पाँचों ही परमेष्ठी को, वन्दन बारम्बार।
जिनवाणी का ज्ञान ही, जीवन का आधार।।
श्री 'अरह' प्रभु की वन्दना, काटे कर्म क्लेश।
चालीसा पढ़कर मिले, सच्चा आतम भेष।।

चौपाई:-
सिद्धो की श्रेणी में रहते, 
सिद्ध प्रभु हम आपको कहते।
आठों कर्मों को नाशा है,
सिद्धालय में ही वासा है।।

भक्तों के आराध्य आप हो,
भक्तों के भी साध्य आप हो।
साधन है 'अरह' नाम तुम्हारा,
मुक्ति का मिल जाये किनारा।।

नम्रीभूत जगत है सारा,
वन्दन करता बारम्बारा।
सोमवंश में जन्म है पाया,
मित्रसेना को माँ बतलाया।।

पिता सुदर्शन सम्यग्दृष्टि,
महल में होती रत्न की वृष्टि।
सोलह शुभ सपने लख माँ ने,
तीर्थंकर के जन्म को पाने।।

चहुँ दिश निर्मल वायु बहती,
छह ऋतुएँ भी संग- संग रहती।
सब प्राणी के मन खुशहाली,
पूर्व दिशा में आई लाली।।

इन्द्रों संग सुर भू पर आये,
कल्याणक खुशियाँ बरसाये।
लक्ष्मी ने आ डाला डेरा,
सबके दुर्दिन को है फेरा।।

तीर्थंकर की महिमा गाई,
बस 'अर' प्रभु का नाम सहाई।
जब यौवन का मौसम आया,
कन्यायों को फिर परिणाया।।

राज्य पिता ने तुमको दीना,
न्याय से प्रभु ने कार्य को कीना।
चक्ररत्न ने स्वामी माना,
चक्रवर्ती बन विजय को जाना।।

षटखण्ड राजा शरण में आये,
आज्ञा को सिर माथ चढाये।
स्वप्न में भी खुद पास न आता,
जोड़ा फिर आतम से नाता।।

कामदेव पदवी के धारी,
किससे उपमा करें तुम्हारी।
देख सभी मोहित हो जाते,
बात कोई वे सोच न पाते।।

शरद ऋतु के बादल देखे,
फटे हुए थे कारण लेखे।
क्षणभंगुर संसार को जाना,
पहना फिर वैराग्य का बाना।।

कुम्भकार सम चक्र को छोड़ा,
गृहलक्ष्मी से नाता तोड़ा।
दीक्षा ले संयम को धारा,
नश्वर सुख को दिया किनारा।।

पँचमुष्ठी केशलोंच किया था,
आतम निज में लीन किया था।
एक सहज राजा संग आये,
दीक्षा ले संग ध्यान लगाये।।

तप अग्नि में कर्म जलाये,
केवलज्ञान का दीप जलाये।
देवों ने आ पूजा कीनी,
समवशरण रचना कर दीनी।।

भक्तों को स्थान मिला था,
भक्त हृदय भी शीघ्र खिला था।
जिनवरमुद्रा पाठ पढ़ाती,
ज्ञान- ध्यान की याद दिलाती।।

जिस- जिस ने प्रभु नाम लिया था,
उसका बेड़ापार हुआ था।
चार गति से हमें छुड़ाओ,
जग दुखों से हमें बचाओ।।

कर्म-बन्ध ढीले हो जाये,
तब ही प्रभु हम शरण में आये।
सच्चे हृदय से भक्ति करेंगे,
मन से प्रभुजी जाप करेंगे।।

पापकर्म से दूर हटेंगे,
क्रोध मान से दूर रहेंगे।
भक्ति का पथ हमको प्यारा,
क्षणभंगुर सुख इससे हारा।।

ज्ञान किरण हमको दिखला दो,
मुक्ति का रस्ता बतला दो।
ज्ञानामृत का भोजन पाऊँ,
और अमर इससे हो जाऊँ।।

श्री सम्मेद शिखर मन भाया,
वहाँ से मुक्ति को पडराया।
बार- बार मैं अरज करूँगा,
चरण आपके सदा रहूँगा।।

दोहा:-
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि- सिद्धि मंगल करें, होवें भव से पार।।
श्री 'अर' प्रभु के चरण में, वन्दन शत-शत बार।

सबकी विपदायें हरो, विनती बारम्बार।।

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

                         ।।श्री विमलनाथ चालीसा।।

सिद्ध अनन्तानन्त नमन कर, सरस्वती को मन में ध्याय ।।
विमलप्रभु क्री विमल भक्ति कर, चरण कमल में शीश नवाय ।।
जय श्री विमलनाथ विमलेश, आठों कर्म किए नि:शेष ।।
कृतवर्मा के राजदुलारे, रानी जयश्यामा के प्यारे ।।
मंगलीक शुभ सपने सारे, जगजननी ने देखे न्यारे ।।
शुक्ल चतुर्थी माघ मास की, जन्म जयन्ती विमलनाथ की ।।
जन्योत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया ।।
मेरु पर अभिषेक कराया, गन्धोंदक श्रद्धा से लगाया ।।
वस्त्राभूषण दिव्य पहनाकर, मात-पिता को सौंपा आकर ।।
साठ लाख वर्षायु प्रभु की, अवगाहना थी साठ धनुष की ।।
कंचन जैसी छवि प्रभु- तन की, महिमा कैसे गाऊँ मैं उनकी ।।
बचपन बीता, यौवन आया, पिता ने राजतिलक करवाया ।।
चयन किया सुन्दर वधुओं का, आयोजन किया शुभ विवाह का ।।
एक दिन देखी ओस घास पर, हिमकण देखें नयन प्रीतिभर ।।
हुआ संसर्ग सूर्य रश्मि से, लुप्त हुए सब मोती जैसे ।।
हो विश्वास प्रभु को कैसे, खड़े रहे वे चित्रलिखित से ।।
“क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार ।।
वैराग्य हृदय में समाया, छोडे क्रोध -मान और माया ।।
घर पहुँचे अनमने से होकर, राजपाट निज सुत को देकर ।।
देवीमई शिविका पर चढ़कर, गए सहेतुक वन में जिनवर ।।
माघ मास-चतुर्थी कारी, “नम: सिद्ध” कह दीक्षाधारी ।।
रचना समोशरण हितकार, दिव्य देशना हुई सुरवकार ।।
उपशम करके मिथ्यात्व का, अनुभव करलो निज आत्म का ।।
मिथ्यात्व का होय निवारण, मिटे संसार भ्रमण का कारणा ।।
बिन सम्यक्तव के जप-तप-पूजन, विष्फल हैँ सारे व्रत- अर्चन ।।
विषफल हैं ये विषयभोग सब, इनको त्यागो हेय जान अब ।।
द्रव्य- भाव्-नो कमोदि से, भिन्न हैं आत्म देव सभी से ।।
निश्चय करके हे निज आतम का, ध्यान करो तुम परमात्म का ।।
ऐसी प्यारी हित की वाणी, सुनकर सुखी हुए सब प्राणी ।।
दूर-दूर तक हुआ विहार, किया सभी ने आत्मोद्धारा ।।
‘मन्दर’ आदि पचपन गणधर, अड़सठ सहस दिगम्बर मुनिवर ।।
उम्र रही जब तीस दिनों क, जा पहुँचे सम्मेद शिखर जी ।।
हुआ बाह्य वैभव परिहार, शेष कर्म बन्धन निरवार ।।
आवागमन का कर संहार, प्रभु ने पाया मोक्षागारा ।।
षष्ठी कृष्णा मास आसाढ़, देव करें जिनभवित प्रगाढ़ ।।
सुबीर कूट पूजें मन लाय, निर्वाणोत्सव को’ हर्षाय ।।
जो भवि विमलप्रभु को ध्यावें। वे सब मन वांछित फल पावें ।।
‘अरुणा’ करती विमल-स्तवन, ढीले हो जावें भव-बन्धन ।।

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

                       ।।गोम्मटेश भजन।।

होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे...... 2

कौन सा देश, कहाँ के राजा, कौन पिता कहलाय...2
कौन मात के जाय बाहुबली, होली खेले रे...
                           महल में होली खेले रे...2
   होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

भारत देश में राज्य अयोध्या, ऋषभनाथ सुत पाय,
मात सुनन्दा जाय बाहुबली, होली खेले रे...
                           महल में होली खेले रे...2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

चंदा सूरज सी छवि जिनकी, क्या क्या नाम धराये,
करत कलोल महल में दोनों सब मन भाय रे...2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

भरत बड़े, बाहुबली छोटे, नाम जगत में पायें... 2
दो बहनों संग दोनों भैया होली खेले रे...
                        महल में होली खेले रे....
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

कालचक्र की गति है न्यारी, ऋषभ भये वैरागी,
वेष दिगम्बर धार करम संग होली खेले रे...
                    भरत संग होली खेले रे...
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

कर्म काट शिवपुर को ध्याये, तीर्थंकर पद पाये...2
आदिनाथ से पूर्व बाहुबली मुक्ति पाये रे....
                    केवली प्रथम कहाये रे....
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

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