परिचय-
जैन धर्म में सामायिक आत्मशुद्धि, समता और आत्मचिंतन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधना है। "सामायिक" शब्द का अर्थ है समभाव में स्थित होना अर्थात् राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों से दूर होकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का प्रयास करना। सामायिक के माध्यम से साधक सभी जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और क्षमा का भाव विकसित करता है तथा अपने द्वारा हुए दोषों का आत्मनिरीक्षण करता है।
प्रस्तुत सामायिक पाठ जैन परंपरा का अत्यंत लोकप्रिय और प्रेरणादायक पाठ है। इसके पदों में जीवदया, समता, आत्मज्ञान, वैराग्य, कर्म सिद्धांत, प्रायश्चित तथा मोक्षमार्ग का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। इस पाठ का नियमित अध्ययन और मनन मन को शांति प्रदान करता है तथा साधक को आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। सामायिक केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाने वाली आध्यात्मिक साधना है।
सामायिक पाठ का महत्व-
सामायिक जैन साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को सांसारिक आसक्ति, राग-द्वेष और मानसिक अशांति से ऊपर उठाकर समता की अवस्था तक पहुँचाना है। सामायिक के समय साधक सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखता है तथा अपने दोषों और भूलों का आत्मचिंतन करता है।
जैन दर्शन के अनुसार आत्मा स्वभाव से शुद्ध, ज्ञानमय और अनन्त शक्तियों से सम्पन्न है, किन्तु कर्मों के बंधन के कारण उसका वास्तविक स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता। सामायिक का अभ्यास आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाने का एक प्रभावी माध्यम माना गया है। यह पाठ साधक को संयम, विवेक, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक जागृति की प्रेरणा प्रदान करता है।
।।सामयिक पाठ।।
प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणीजनोंमें हर्ष प्रभो।
करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥ 1॥
यह अनन्त बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो।
ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनन्त बल दो मुझको॥ 2॥
सुख दुख बैरी बन्धु वर्ग में, काँच कनक में समता हो।
वन उपवन प्रासाद कुटी में नहीं खेद, नहिं ममता हो॥ 3॥
जिस सुन्दर तम पथ पर चलकर, जीते मोह मान मन्मथ।
वह सुन्दर पथ ही प्रभु मेरा, बना रहे अनुशीलन पथ॥ 4॥
एकेन्द्रिय आदिक जीवों की यदि मैंने हिंसा की हो।
शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह,निष्फल हो दुष्कृत्य विभो॥ 5॥
मोक्षमार्ग प्रतिकूल प्रवर्तन जो कुछ किया कषायों से।
विपथ गमन सब कालुष मेरे, मिट जावें सद्भावों से॥ 6॥
चतुर वैद्य विष विक्षत करता, त्यों प्रभु मैं भी आदि उपान्त।
अपनी निन्दा आलोचन से करता हूँ पापों को शान्त॥ 7॥
सत्य अहिंसादिक व्रत में भी मैंने हृदय मलीन किया।
व्रत विपरीत प्रवर्तन करके शीलाचरण विलीन किया॥ 8॥
कभी वासना की सरिता का, गहन सलिल मुझ पर छाया।
पी पीकर विषयों की मदिरा मुझ में पागलपन आया॥ 9॥
मैंने छली और मायावी, हो असत्य आचरण किया।
परनिन्दा गाली चुगली जो मुँह पर आया वमन किया॥ 10॥
निरभिमान उज्ज्वल मानस हो, सदा सत्य का ध्यान रहे।
निर्मल जल की सरिता सदृश, हिय में निर्मल ज्ञान बहे॥ 11॥
मुनि चक्री शक्री के हिय में, जिस अनन्त का ध्यान रहे।
गाते वेद पुराण जिसे वह, परम देव मम हृदय रहे॥12॥
दर्शन ज्ञान स्वभावी जिसने, सब विकार हों वमन किये।
परम ध्यान गोचर परमातम, परम देव मम हृदय रहे॥13॥
जो भव दुख का विध्वंसक है, विश्व विलोकी जिसका ज्ञान।
योगी जन के ध्यान गम्य वह, बसे हृदय में देव महान्॥ 14॥
मुक्ति मार्ग का दिग्दर्शक है, जनम मरण से परम अतीत।
निष्कलंक त्रैलोक्य दर्शी वह देव रहे मम हृदय समीप॥ 15॥
निखिल विश्व के वशीकरण वे, राग रहे न द्वेष रहे।
शुद्ध अतीन्द्रिय ज्ञान स्वभावी, परम देव मम हृदय रहे॥ 16॥
देख रहा जो निखिल विश्व को कर्म कलंक विहीन विचित्र।
स्वच्छ विनिर्मल निर्विकार वह देव करें मम हृदय पवित्र॥ 17॥
कर्म कलंक अछूत न जिसको कभी छू सके दिव्य प्रकाश।
मोह तिमिर को भेद चला जो परम शरण मुझको वह आप्त॥ 18॥
जिसकी दिव्य ज्योति के आगे, फीका पड़ता सूर्य प्रकाश।
स्वयं ज्ञानमय स्व पर प्रकाशी, परम शरण मुझको वह आप्त॥ 19॥
जिसके ज्ञान रूप दर्पण में, स्पष्ट झलकते सभी पदार्थ।
आदि अन्तसे रहित शान्तशिव, परम शरण मुझको वह आप्त॥
जैसे अग्नि जलाती तरु को, तैसे नष्ट हुए स्वयमेव।
भय विषाद चिन्ता नहीं जिनको, परम शरण मुझको वह देव॥
तृण, चौकी, शिल, शैलशिखर नहीं, आत्म समाधि के आसन।
संस्तर, पूजा, संघ-सम्मिलन, नहीं समाधि के साधन॥ 22॥
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, विश्व मनाता है मातम।
हेय सभी हैं विषय वासना, उपादेय निर्मल आतम॥ 23॥
बाह्य जगत कुछ भी नहीं मेरा, और न बाह्य जगत का मैं।
यह निश्चय कर छोड़ बाह्य को, मुक्ति हेतु नित स्वस्थ रमें॥
अपनी निधि तो अपने में है, बाह्य वस्तु में व्यर्थ प्रयास।
जग का सुख तो मृग तृष्णा है, झूठे हैं उसके पुरुषार्थ॥ 25॥
अक्षय है शाश्वत है आत्मा, निर्मल ज्ञान स्वभावी है।
जो कुछ बाहर है, सब पर है, कर्माधीन विनाशी है॥ 26॥
तन से जिसका ऐक्य नहीं हो, सुत, तिय, मित्रों से कैसे।
चर्म दूर होने पर तन से, रोम समूह रहे कैसे॥ 27॥
महा कष्ट पाता जो करता, पर पदार्थ, जड़-देह संयोग।
मोक्षमहल का पथ है सीधा, जड़-चेतन का पूर्ण वियोग॥ 28॥
जो संसार पतन के कारण, उन विकल्प जालों को छोड़।
निर्विकल्प निद्र्वन्द्व आत्मा, फिर-फिर लीन उसी में हो॥ 29॥
स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ, फल निश्चय ही वे देते।
करे आप, फल देय अन्य तो स्वयं किये निष्फल होते॥ 30॥
अपने कर्म सिवाय जीव को, कोई न फल देता कुछ भी।
पर देता है’ यह विचार तज स्थिर हो, छोड़ प्रमादी बुद्धि॥ 31॥
निर्मल, सत्य, शिवं सुन्दर है, ‘अमितगति’ वह देव महान।
शाश्वत निज में अनुभव करते, पाते निर्मल पद निर्वाण॥ 32॥
दोहा
इन बत्तीस पदों से जो कोई, परमातम को ध्याते हैं।
साँची सामायिक को पाकर, भवोदधि तर जाते हैं॥
प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणीजनोंमें हर्ष प्रभो।
करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥ 1॥
यह अनन्त बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो।
ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनन्त बल दो मुझको॥ 2॥
सुख दुख बैरी बन्धु वर्ग में, काँच कनक में समता हो।
वन उपवन प्रासाद कुटी में नहीं खेद, नहिं ममता हो॥ 3॥
जिस सुन्दर तम पथ पर चलकर, जीते मोह मान मन्मथ।
वह सुन्दर पथ ही प्रभु मेरा, बना रहे अनुशीलन पथ॥ 4॥
एकेन्द्रिय आदिक जीवों की यदि मैंने हिंसा की हो।
शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह,निष्फल हो दुष्कृत्य विभो॥ 5॥
मोक्षमार्ग प्रतिकूल प्रवर्तन जो कुछ किया कषायों से।
विपथ गमन सब कालुष मेरे, मिट जावें सद्भावों से॥ 6॥
चतुर वैद्य विष विक्षत करता, त्यों प्रभु मैं भी आदि उपान्त।
अपनी निन्दा आलोचन से करता हूँ पापों को शान्त॥ 7॥
सत्य अहिंसादिक व्रत में भी मैंने हृदय मलीन किया।
व्रत विपरीत प्रवर्तन करके शीलाचरण विलीन किया॥ 8॥
कभी वासना की सरिता का, गहन सलिल मुझ पर छाया।
पी पीकर विषयों की मदिरा मुझ में पागलपन आया॥ 9॥
मैंने छली और मायावी, हो असत्य आचरण किया।
परनिन्दा गाली चुगली जो मुँह पर आया वमन किया॥ 10॥
निरभिमान उज्ज्वल मानस हो, सदा सत्य का ध्यान रहे।
निर्मल जल की सरिता सदृश, हिय में निर्मल ज्ञान बहे॥ 11॥
मुनि चक्री शक्री के हिय में, जिस अनन्त का ध्यान रहे।
गाते वेद पुराण जिसे वह, परम देव मम हृदय रहे॥12॥
दर्शन ज्ञान स्वभावी जिसने, सब विकार हों वमन किये।
परम ध्यान गोचर परमातम, परम देव मम हृदय रहे॥13॥
जो भव दुख का विध्वंसक है, विश्व विलोकी जिसका ज्ञान।
योगी जन के ध्यान गम्य वह, बसे हृदय में देव महान्॥ 14॥
मुक्ति मार्ग का दिग्दर्शक है, जनम मरण से परम अतीत।
निष्कलंक त्रैलोक्य दर्शी वह देव रहे मम हृदय समीप॥ 15॥
निखिल विश्व के वशीकरण वे, राग रहे न द्वेष रहे।
शुद्ध अतीन्द्रिय ज्ञान स्वभावी, परम देव मम हृदय रहे॥ 16॥
देख रहा जो निखिल विश्व को कर्म कलंक विहीन विचित्र।
स्वच्छ विनिर्मल निर्विकार वह देव करें मम हृदय पवित्र॥ 17॥
कर्म कलंक अछूत न जिसको कभी छू सके दिव्य प्रकाश।
मोह तिमिर को भेद चला जो परम शरण मुझको वह आप्त॥ 18॥
जिसकी दिव्य ज्योति के आगे, फीका पड़ता सूर्य प्रकाश।
स्वयं ज्ञानमय स्व पर प्रकाशी, परम शरण मुझको वह आप्त॥ 19॥
जिसके ज्ञान रूप दर्पण में, स्पष्ट झलकते सभी पदार्थ।
आदि अन्तसे रहित शान्तशिव, परम शरण मुझको वह आप्त॥
जैसे अग्नि जलाती तरु को, तैसे नष्ट हुए स्वयमेव।
भय विषाद चिन्ता नहीं जिनको, परम शरण मुझको वह देव॥
तृण, चौकी, शिल, शैलशिखर नहीं, आत्म समाधि के आसन।
संस्तर, पूजा, संघ-सम्मिलन, नहीं समाधि के साधन॥ 22॥
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, विश्व मनाता है मातम।
हेय सभी हैं विषय वासना, उपादेय निर्मल आतम॥ 23॥
बाह्य जगत कुछ भी नहीं मेरा, और न बाह्य जगत का मैं।
यह निश्चय कर छोड़ बाह्य को, मुक्ति हेतु नित स्वस्थ रमें॥
अपनी निधि तो अपने में है, बाह्य वस्तु में व्यर्थ प्रयास।
जग का सुख तो मृग तृष्णा है, झूठे हैं उसके पुरुषार्थ॥ 25॥
अक्षय है शाश्वत है आत्मा, निर्मल ज्ञान स्वभावी है।
जो कुछ बाहर है, सब पर है, कर्माधीन विनाशी है॥ 26॥
तन से जिसका ऐक्य नहीं हो, सुत, तिय, मित्रों से कैसे।
चर्म दूर होने पर तन से, रोम समूह रहे कैसे॥ 27॥
महा कष्ट पाता जो करता, पर पदार्थ, जड़-देह संयोग।
मोक्षमहल का पथ है सीधा, जड़-चेतन का पूर्ण वियोग॥ 28॥
जो संसार पतन के कारण, उन विकल्प जालों को छोड़।
निर्विकल्प निद्र्वन्द्व आत्मा, फिर-फिर लीन उसी में हो॥ 29॥
स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ, फल निश्चय ही वे देते।
करे आप, फल देय अन्य तो स्वयं किये निष्फल होते॥ 30॥
अपने कर्म सिवाय जीव को, कोई न फल देता कुछ भी।
पर देता है’ यह विचार तज स्थिर हो, छोड़ प्रमादी बुद्धि॥ 31॥
निर्मल, सत्य, शिवं सुन्दर है, ‘अमितगति’ वह देव महान।
शाश्वत निज में अनुभव करते, पाते निर्मल पद निर्वाण॥ 32॥
दोहा
इन बत्तीस पदों से जो कोई, परमातम को ध्याते हैं।
साँची सामायिक को पाकर, भवोदधि तर जाते हैं॥
सामायिक पाठ की शिक्षाएँ-
सामायिक पाठ हमें सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि किसी भी जीव के प्रति द्वेष, हिंसा या घृणा का भाव आत्मकल्याण में बाधक है। पाठ में समता का विशेष महत्व बताया गया है, जिसके अनुसार सुख-दुःख, लाभ-हानि, मित्र-शत्रु तथा मान-अपमान जैसी परिस्थितियों में समान भाव रखना चाहिए।
यह पाठ आत्मा और शरीर के भेद का ज्ञान कराता है तथा बताता है कि आत्मा शाश्वत, चेतन और ज्ञानस्वरूप है जबकि शरीर नश्वर और परिवर्तनशील है। सामायिक पाठ आत्मचिंतन, प्रायश्चित और आत्मसुधार की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। इसमें कर्म सिद्धांत का सुंदर वर्णन मिलता है और यह समझाया गया है कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है।
पाठ में वैराग्य, संयम और मोक्षमार्ग की प्रेरणा भी निहित है। यह साधक को बाहरी विषयों और मोह-माया से हटाकर आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होने का संदेश देता है।
सामायिक पाठ के लाभ-
सामायिक पाठ का नियमित अध्ययन और मनन मन को शांति प्रदान करता है। इससे क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाओं में कमी आती है तथा मैत्री, करुणा और क्षमा जैसे श्रेष्ठ गुणों का विकास होता है।
यह पाठ आत्मचिंतन की आदत विकसित करता है और व्यक्ति को अपनी भूलों को पहचानने तथा उन्हें सुधारने की प्रेरणा देता है। सामायिक का अभ्यास मानसिक संतुलन बढ़ाता है और जीवन में समता की भावना को मजबूत करता है। धार्मिक दृष्टि से यह आत्मशुद्धि, पुण्य संचय और आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
सामायिक पाठ के माध्यम से साधक धीरे-धीरे आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने लगता है और मोक्षमार्ग के प्रति उसकी श्रद्धा और दृढ़ होती जाती है।
निष्कर्ष-
सामायिक पाठ जैन धर्म की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर है। इसके प्रत्येक पद में आत्मकल्याण, समता, करुणा, संयम और मोक्षमार्ग का गहन संदेश निहित है। यह पाठ केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि जीवन को धर्ममय, शांत और संतुलित बनाने की प्रेरणा प्रदान करता है। जो साधक श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ सामायिक पाठ का अध्ययन तथा मनन करता है, वह आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में निरंतर आगे बढ़ सकता है।
FAQ-
सामायिक क्या है?
सामायिक जैन धर्म की एक महत्वपूर्ण साधना है जिसका उद्देश्य समता भाव में स्थित होकर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि करना है।
सामायिक पाठ में मुख्य रूप से क्या वर्णित है?
सामायिक पाठ में मैत्री, करुणा, समता, आत्मज्ञान, प्रायश्चित, कर्म सिद्धांत और मोक्षमार्ग का वर्णन मिलता है।
सामायिक पाठ का नियमित अध्ययन क्यों करना चाहिए?
नियमित अध्ययन से मन की शांति, आत्मचिंतन, समता भाव और आध्यात्मिक जागृति का विकास होता है।
क्या सामायिक केवल जैन साधकों के लिए ही उपयोगी है?
यद्यपि यह जैन परंपरा का पाठ है, किन्तु इसमें वर्णित समता, करुणा, क्षमा और आत्मचिंतन के सिद्धांत सभी के लिए प्रेरणादायक हैं।
सामायिक का मुख्य उद्देश्य क्या है?
सामायिक का मुख्य उद्देश्य राग-द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर होना और मोक्षमार्ग की साधना करना है।
स्रोत-
सामायिक पाठ को कई ग्रन्थों से लिया गया हैं जैसे भावना द्वात्रिंशतका, भगवती आराधना, रत्नकरण्डक श्रावकाचार आदि। जिनमें आचार्य अमितगति जी का सामायिक पद्यानुवाद अत्यंत प्रचलित हैं।
महत्वपूर्ण बिंदु-