सोमवार, 15 जून 2026

हे सर्वत्यागी हे वीतरागी हे गोम्मटेशम् तुभ्यं नमोस्तु | भगवान बाहुबली भजन


गोम्मटेश भजन: भगवान बाहुबली और आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की महिमा

दर्शकों इस लेख में हम भगवान बाहुबली के वीतरागी स्वरूप का चिंतन करेंगे एवं समाधिस्थ आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी द्वारा रचित इस भजन का पाठन करेंगे। इस भजन के पाठ से भगवान बाहुबली जी के चरित्र एवं आचार्य श्री के गुणों का वर्णन स्वयं ही एकरूप प्रदर्शित होता है। कैसे भगवान बाहुबली प्रथम मोक्षगामी हुए और कैसे आचार्य श्री कलयुग के भगवान बने। 
"हे सर्वत्यागी, हे वीतरागी, हे गोम्मटेशं तुभ्यं नमोस्तु।"
भूमिका-
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में जैन धर्म का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। इस परंपरा में भगवान बाहुबली — जिन्हें गोम्मटेश्वर के नाम से भी जाना जाता है — का व्यक्तित्व अद्वितीय है। वे केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि त्याग, वैराग्य और आत्मजय का जीवंत प्रतीक हैं। और इस महान परंपरा को आधुनिक युग में जीवंत करने वाले संत थे — समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, जिनका जीवन स्वयं एक भजन था।
भगवान बाहुबली: गोम्मटेश्वर की अमर गाथा
भगवान बाहुबली आदिनाथ (ऋषभदेव) के पुत्र थे। जब उनके पिता ने सांसारिक राज्य त्यागकर दीक्षा ली, तब राज्य का विभाजन पुत्रों में हुआ। बाहुबली को पोदनपुर का राज्य मिला। परंतु उनके भ्राता भरत चक्रवर्ती बनने की महत्त्वाकांक्षा में सब राजाओं को अपने अधीन करना चाहते थे। जब बाहुबली ने भरत की अधीनता स्वीकार करने से इनकार किया, तो द्वंद्वयुद्ध की घोषणा हुई।
युद्ध के तीनों चरणों — दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध और मल्लयुद्ध — में बाहुबली विजयी हुए। जब वे भरत को भूमि पर पटकने ही वाले थे, तब उनके मन में एक विचार कौंधा — "यह राज्य किसके लिए? यह विजय किसलिए? क्या मैं अपने ही भ्राता का वध करूँगा?"
उसी क्षण बाहुबली के भीतर वैराग्य जाग उठा। उन्होंने भरत को छोड़ दिया, राज्य का त्याग किया और वन में चले गए। वहाँ उन्होंने कायोत्सर्ग की मुद्रा में — एकदम निश्चल, पैरों में लिपटी लताओं और शरीर पर बैठे पक्षियों के साथ — वर्षों तक ध्यान किया। उनके ध्यान की गहराई इतनी थी कि प्रकृति उनके चारों ओर सिमट आई।
भजन में इसी महिमा का गुणगान है —
"हे विंध्यवासी घट घट प्रवासी, न रागिद्वेषम तुभ्यं नमोस्तु।"
वे विंध्य के वासी हैं — पर्वत पर विराजते हैं। वे घट-घट में प्रवास करते हैं — हर आत्मा में हैं। और उनमें न राग है, न द्वेष — वे पूर्णतः वीतरागी हैं।

श्रवणबेलगोला: पाषाण में प्रकट परमात्मा-
कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में विंध्यगिरि (इंद्रगिरि) पर्वत पर स्थित भगवान गोम्मटेश्वर की प्रतिमा विश्व की सबसे ऊँची मुक्तकाशी प्रतिमाओं में से एक है। 57 फुट ऊँची यह एकाश्म प्रतिमा लगभग 1000 वर्ष पुरानी है। इसका निर्माण गंग वंश के सेनापति चामुण्डराय ने करवाया था, जिनका उल्लेख भजन में बड़े श्रद्धाभाव से किया गया है —
"हे मात कालल के वीर बालक, चामुंडरायं तुभ्यं नमोस्तु।"
इस प्रतिमा के निर्माण में आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती और जिनचंद्रस्वामी का महत्त्वपूर्ण योगदान था। भजन में उनकी वंदना इस प्रकार है —
"हे नेमिचन्द्रम जिन चन्द्रस्वामी, हे विंध्य गिरिवर तुभ्यं नमोस्तु।"
प्रतिमा के नीलवर्णी कमल जैसे नयन, धनुषाकार भौंहें, शांत दृष्टि, दिव्य ग्रीवा, मौनधारी अधर — ये सब ध्यानयोगी की उस अवस्था को दर्शाते हैं जहाँ शरीर स्थिर है और आत्मा उड़ान पर है। भजन में इन्हीं दिव्य लक्षणों का भावपूर्ण वर्णन है —
"हे नीलकमलं हे वर्णविमलं... हे धनुषभृकुटि हे शान्तनयनं... हे मौनअधरं हे लम्बकर्णम्।"
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज: युग के महाध्यानी
यदि भगवान बाहुबली पाषाण में परमात्मा का रूप हैं, तो आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज आधुनिक युग में उसी वैराग्य के जीवंत अवतार थे।
10 अक्टूबर 1946 को जन्मे विद्यासागर जी ने मात्र 22 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की और दिगंबर जैन साधु के कठोरतम व्रतों को जीवन भर निभाया। वे नग्न रहते थे, पैरों में चप्पल नहीं, बर्तन में भोजन नहीं — केवल हाथ की अंजुलि में। उनका जीवन स्वयं कायोत्सर्ग था।
उन्होंने हजारों किलोमीटर पैदल विहार किया। उनके प्रवचनों में वेदांत, न्याय, व्याकरण, काव्य — सब समाहित थे। उनकी हिंदी काव्य रचना "मूकमाटी" हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जाती है।
17 फरवरी 2024 को उन्होंने संथारा (संलेखना) द्वारा — अर्थात् भोजन-जल का स्वैच्छिक त्याग करके — देह त्यागी। यह जैन परंपरा की सर्वोच्च साधना है, जिसमें साधक पूर्ण जागरूकता और समता के साथ मृत्यु को वरण करता है। जैसे बाहुबली ने शरीर की परवाह किए बिना ध्यान में खड़े रहे, वैसे ही विद्यासागर जी ने देह को साक्षी भाव से विसर्जित किया।
वे समाधिस्थ गए — न भय, न आसक्ति, न पीड़ा — केवल शांति।
भजन का आध्यात्मिक संदेश
यह भजन केवल स्तुति नहीं है — यह एक साधना है। जब हम गाते हैं "हे सर्वत्यागी, हे वीतरागी" — तो हम केवल बाहुबली को नहीं, उस आदर्श को नमन करते हैं जो हर आत्मा में संभव है।
"हे प्रतिमा योगी हे कामदेवं, हे पुण्यशाली तुभ्यं नमोस्तु।"
गोम्मटेश्वर की प्रतिमा योगी है — वे स्वयं साक्षात् तपस्वी हैं। वे कामदेव भी हैं — अर्थात् जो काम (इच्छाओं) को जीत चुके। यह विरोधाभास नहीं, यह सत्य है — जो सब इच्छाओं से मुक्त हो जाए, वही सच्चा सुंदर है, वही सच्चा सुखी है।
"हे निर्विकारी वैराग्यधारी, मुद्रा तुम्हारी तुभ्यं नमोस्तु।"
उनकी मुद्रा ही उनका संदेश है — निश्चल, निर्भय, निर्विकार।
उपसंहार
भगवान बाहुबली और आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज — दोनों एक ही सत्य के दो रूप हैं। एक पाषाण में, एक जीवन में — दोनों ने यह सिद्ध किया कि जब मनुष्य राग-द्वेष से ऊपर उठता है, तो वह देव हो जाता है।
यह भजन उसी देवत्व का आह्वान है। जब भी हम "जय जय जय जय गोम्मटेशं" पुकारते हैं — तो हम अपने भीतर के उस निर्मल, शांत, वीतराग आत्मस्वरूप को जगाते हैं।
तुभ्यं नमोस्तु। — हे भगवान, आपको नमस्कार।

।।गोम्मटेश भजन।।

हे सर्वत्यागी, हे वीतरागी,
हे गोम्मटेशं तुभ्यं नमोस्तु।

हे आदिपुत्रं हे ज्ञानवृत्तम
हे जगहितेशं तुभ्यं नमोस्तु।

हे नीलकमलं हे वर्णविमलं
हे श्यामकेशं तुभ्यं नमोस्तु।

हे धनुषभृकुटि हे शान्तनयनं
हे दृष्टि नासा तुभ्यं नमोस्तु।

हे मौनअधरं हे लम्बकर्णम्
हे दिव्य ग्रीवा तुभ्यं नमोस्तु।

हे विंध्यवासी घट घट प्रवासी
न रागिद्वेषम तुभ्यं नमोस्तु।

हे मात कालल के वीर बालक
चामुंडरायं तुभ्यं नमोस्तु।

हे नेमिचन्द्रम जिन चन्द्रस्वामी
हे विंध्य गिरिवर तुभ्यं नमोस्तु।

हे प्रतिमा योगी हे कामदेवं
हे पुण्यशाली तुभ्यं नमोस्तु।

हे निर्विकारी वैराग्यधारी
मुद्रा तुम्हारी तुभ्यं नमोस्तु।

हे नाथ नारायण वासुदेवं
हे सर्वपूज्यम तुभ्यं नमोस्तु।

हे विंध्य गिरी पर प्रतिमा तुम्हारी
अप लख निहारी तुभ्यं नमोस्तु।

जय जय जय जय गोम्मटेशं......

होली खेले युवराज बाहुबली | भगवान बाहुबली होली भजन | Bahubali Holi Bhajan

दर्शकों आज हम भगवान बाहुबली का विश्व प्रसिद्ध भजन होली खेले युवराज बाहुबली होली खेले रे इस भजन का पाठन करेंगे और भगवान बाहुबली के गुणों 
को समझेंगे कैसे भगवान बाहुबली नर से नारायण बनने की यात्रा में आगे बढ़े-

होली खेले युवराज बाहुबली — भरत और बाहुबली की वह अमर गाथा जो जैनागम में अमर है
दो भाई। एक ही पिता। एक ही महल। एक ही होली।
और फिर — दो बिल्कुल अलग रास्ते।
एक रास्ता चक्रवर्ती सम्राट बना। दूसरा रास्ता प्रथम केवली।
जब यह भजन कानों में पड़ता है — "होली खेले युवराज बाहुबली, भरत संग होली खेले रे" — तो मन में एक चित्र उभरता है। अयोध्या का वह स्वर्णिम महल। दो राजकुमार। रंगों की बौछार। हँसी-ठिठोली। और एक माँ जो दूर से यह सब देखकर मुस्कुरा रही है।
लेकिन यह भजन केवल होली का उत्सव नहीं है। यह उस गहरी जैन दार्शनिक कथा का काव्यात्मक रूप है जो हमें बताती है — संसार में साथ खेलने वाले भाई भी जब कर्म की राह पर चलते हैं, तो उनकी मंजिलें अलग हो जाती हैं।
आइए जैनागम के आलोक में इस भजन की गहराई को समझें।
🏰 अयोध्या का वह सुनहरा दौर — जब दोनों भाई साथ थे
जैनागम के अनुसार भगवान ऋषभनाथ (आदिनाथ) — जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं — के सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े थे भरत और उनसे छोटे थे बाहुबली।
भरत की माता का नाम सुमंगला था और बाहुबली की माता का नाम सुनन्दा था। दोनों ही भगवान ऋषभनाथ की पत्नियाँ थीं। भजन में इसी तथ्य को सुंदर प्रश्नोत्तर शैली में प्रस्तुत किया गया है —
"कौन सा देश, कहाँ के राजा, कौन पिता कहलाय...
मात सुनन्दा जाय बाहुबली..."
भारत देश। अयोध्या नगरी। ऋषभनाथ पिता। सुनन्दा माता।
यह परिचय केवल वंशावली नहीं है — यह उस युग का परिचय है जब इस धरती पर पहली बार सभ्यता का सूर्योदय हो रहा था। भगवान ऋषभनाथ ने ही इस युग के मनुष्यों को कृषि, शिल्प, व्यापार और समाज व्यवस्था सिखाई थी। उनके पुत्र भरत और बाहुबली उसी युग के दो सबसे तेजस्वी राजकुमार थे।
भजन में उनकी बाल-छवि का वर्णन मन को मोह लेता है —
"चंदा सूरज सी छवि जिनकी, क्या क्या नाम धराये,
करत कलोल महल में दोनों सब मन भाय रे..."
भरत — सूर्य जैसे तेजस्वी। बाहुबली — चंद्रमा जैसे शीतल और सौम्य। दोनों महल में मिलकर खेलते थे, होली खेलते थे, हँसते थे। यह वह निर्मल बचपन था जिसमें न राज्य की चिंता थी, न सीमाओं का विवाद।
👑 ऋषभनाथ का वैराग्य — और राज्य का बँटवारा
जैनागम बताता है कि एक दिन इंद्र की सभा में नीलांजना नामक देवांगना नृत्य करते-करते अचानक काल के गाल में समा गई। यह दृश्य देखकर भगवान ऋषभनाथ के मन में संसार की नश्वरता का गहरा बोध हुआ।
भजन इसे बड़े सरल शब्दों में कहता है —
"कालचक्र की गति है न्यारी, ऋषभ भये वैरागी,
वेष दिगम्बर धार करम संग होली खेले रे..."
यहाँ "करम संग होली खेले" का अर्थ अत्यंत गहरा है। भगवान ऋषभनाथ ने दिगम्बर वेष धारण करके कर्मों के साथ होली खेली — अर्थात् कर्मों को जलाकर भस्म कर दिया। जैसे होली में पुरानी बुराइयाँ जलाई जाती हैं, वैसे ही उन्होंने अपने कर्म जलाए।
दीक्षा लेने से पूर्व भगवान ऋषभनाथ ने अपना राज्य अपने पुत्रों में बाँटा। भरत को अयोध्या का राज्य मिला — जो सबसे बड़ा और वैभवशाली था। बाहुबली को पोदनपुर (तक्षशिला) का राज्य मिला। शेष 98 पुत्रों को भी विभिन्न राज्य दिए गए।
⚔️ भरत-बाहुबली संग्राम — जैनागम की महाकथा
यहाँ से कहानी उस मोड़ पर आती है जो इतिहास, दर्शन और अध्यात्म तीनों को एक साथ छूती है।
भगवान ऋषभनाथ के दीक्षा लेने के बाद भरत ने दिग्विजय अभियान शुरू किया। उनके पास चक्ररत्न था — जो चक्रवर्ती का प्रतीक है। एक-एक कर सभी राजा भरत के सामने झुकते गए। षट्खंड जीते गए।
लेकिन जब चक्ररत्न भरत की अयोध्या वापस आया तो वह नगर के द्वार पर रुक गया। शकुन शास्त्र के अनुसार इसका अर्थ था — अभी कोई राजा शेष है जिसने अधीनता स्वीकार नहीं की।
वह राजा थे — बाहुबली।
भरत ने बाहुबली को संदेश भेजा — अधीनता स्वीकार करो।
बाहुबली ने उत्तर दिया — मैं किसी के अधीन नहीं।
युद्ध की तैयारी हुई। लेकिन जैनागम के अनुसार दोनों पक्षों के मंत्रियों ने सुझाव दिया कि लाखों सैनिकों का रक्त बहाने की बजाय तीन प्रकार के द्वंद्व से निर्णय हो —
दृष्टियुद्ध (एक-दूसरे को देखते रहना — जो पहले आँख झुकाए वह हारा), जलयुद्ध (जल में एक-दूसरे को पराजित करना) और मल्लयुद्ध (कुश्ती)।
तीनों में बाहुबली विजयी हुए।
अब बाहुबली के हाथ में था भरत को उठाकर पटकने का क्षण। और वे यह कर भी सकते थे। लेकिन उसी क्षण उनके मन में एक विचार आया —
"मैं अपने बड़े भाई को मारने जा रहा हूँ? यह क्या कर रहा हूँ मैं? यह राज्य किसलिए? क्या यही जीवन का उद्देश्य है?"
उन्होंने अपना हाथ रोक लिया।
और उसी क्षण — एक चक्रवर्ती को जीतने वाले बाहुबली के भीतर वैराग्य का उदय हुआ।
🌿 बाहुबली का वैराग्य — सबसे नाटकीय त्याग
बाहुबली ने उसी रणभूमि में खड़े-खड़े अपने केश उखाड़े और दिगम्बर दीक्षा ले ली।
जैनागम में यह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। वे पोदनपुर की ओर पैदल चल पड़े — लेकिन रास्ते में ही एक वन में रुककर ध्यान में स्थिर हो गए। एक वर्ष तक वे निश्चल खड़े रहे। इतने निश्चल कि उनके पैरों में बाँबी बन गई, शरीर पर लताएँ लिपट गईं, पक्षियों ने घोंसले बना लिए।
लेकिन केवलज्ञान नहीं हुआ।
क्यों?
जैनागम का उत्तर अत्यंत सूक्ष्म है — उनके मन में अभी भी एक सूक्ष्म अहंकार था। वे सोचते थे — "मैंने चक्रवर्ती भरत को जीता। मैं इस वन में खड़ा हूँ। यह साधना मेरी है।"
यह "मेरी" — यही एक शब्द केवलज्ञान में बाधा था।
तब भगवान ऋषभनाथ की पुत्रियाँ (बाहुबली की बहनें) ब्राह्मी और सुंदरी आईं। उन्होंने बाहुबली से कहा —
"हाथी से उतरो।"
बाहुबली चौंके — "मैं तो वन में खड़ा हूँ, कहाँ का हाथी?"
तब उन्हें बोध हुआ — अहंकार रूपी हाथी पर अभी भी सवार हैं।
उसी क्षण अहंकार गला। और केवलज्ञान प्रकट हुआ।
🏆 प्रथम केवली — आदिनाथ से भी पहले
यह जैनागम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है जिसे भजन ने बड़े सुंदर ढंग से कहा है —
"आदिनाथ से पूर्व बाहुबली मुक्ति पाये रे,
केवली प्रथम कहाये रे..."
भगवान बाहुबली इस अवसर्पिणी काल के प्रथम केवली बने — अर्थात् भगवान ऋषभनाथ (जो स्वयं तीर्थंकर थे) से भी पहले बाहुबली को केवलज्ञान हुआ। यह इस बात का प्रमाण है कि तीर्थंकर का पद और केवलज्ञान अलग-अलग हैं। तीर्थंकर वह होता है जो धर्म-तीर्थ की स्थापना करता है — और वह पद पूर्व जन्मों की विशेष साधना से मिलता है।
बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे — पर वे प्रथम केवली थे। यह उनकी अपनी विशिष्ट महिमा है।
🗿 गोम्मटेश — वह विशाल प्रतिमा जो युगों से मौन खड़ी है
भगवान बाहुबली की उसी ध्यानस्थ मुद्रा को — जब वे एक वर्ष तक निश्चल खड़े थे — श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में विश्व की सबसे ऊँची एकाश्म प्रतिमा के रूप में स्थापित किया गया है।
गोम्मटेश — यही नाम है उनका। 57 फुट ऊँची यह प्रतिमा ग्रेनाइट पत्थर से बनी है। पैरों में बाँबी, शरीर पर लताएँ — सब कुछ उकेरा गया है। यह प्रतिमा केवल पत्थर नहीं — यह उस संदेश का मूर्त रूप है कि जब अहंकार जाता है, तब ज्ञान आता है।
हर बारह वर्ष में एक बार महामस्तकाभिषेक होता है — जब हजारों भक्त मिलकर इस विशाल प्रतिमा पर दूध, दही, केसर और पुष्पों से अभिषेक करते हैं। यह दृश्य अपने आप में अलौकिक होता है।
🎨 भजन का दर्शन — होली का असली रंग
अब इस भजन को फिर से सुनिए —
"होली खेले युवराज बाहुबली, भरत संग होली खेले रे..."
यह होली केवल रंगों की होली नहीं है। यह जीवन की होली है।
भरत ने सत्ता के रंग में होली खेली — और चक्रवर्ती बने।
बाहुबली ने वैराग्य के रंग में होली खेली — और प्रथम केवली बने।
ऋषभनाथ ने मोक्ष के रंग में होली खेली — और तीर्थंकर पद पाया।
तीनों ने होली खेली — पर तीनों के रंग अलग थे। और तीनों की मंजिल भी अलग।
जैनागम हमें यही सिखाता है — यह संसार एक रंगमंच है। हर आत्मा यहाँ अपनी-अपनी होली खेलती है। लेकिन जो आत्मा कर्मों की होली जलाकर आत्मा के असली रंग को पहचान लेती है — वही सच्ची विजेता है।
🙏 निष्कर्ष — बाहुबली का संदेश आज के लिए
भरत और बाहुबली की यह कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
आज भी दो भाई संपत्ति के लिए लड़ते हैं। आज भी अहंकार ज्ञान को रोकता है। और आज भी वह एक पल आता है जब कोई बाहुबली की तरह रुककर सोचता है — "यह सब किसलिए?"
भगवान बाहुबली का जीवन हमें बताता है —
जीतना बड़ी बात नहीं। जीतकर छोड़ देना — यही सबसे बड़ी जीत है।
"कर्म काट शिवपुर को ध्याये, तीर्थंकर पद पाये,
आदिनाथ से पूर्व बाहुबली मुक्ति पाये रे...
तो चलिए दर्शकों हम पढ़ते है इस सुंदर भजन को-


।।गोम्मटेश भजन।।

होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे...... 2

कौन सा देश, कहाँ के राजा, कौन पिता कहलाय...2
कौन मात के जाय बाहुबली, होली खेले रे...
                           महल में होली खेले रे...2
   होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

भारत देश में राज्य अयोध्या, ऋषभनाथ सुत पाय,
मात सुनन्दा जाय बाहुबली, होली खेले रे...
                           महल में होली खेले रे...2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

चंदा सूरज सी छवि जिनकी, क्या क्या नाम धराये,
करत कलोल महल में दोनों सब मन भाय रे...2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

भरत बड़े, बाहुबली छोटे, नाम जगत में पायें... 2
दो बहनों संग दोनों भैया होली खेले रे...
                        महल में होली खेले रे....
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

कालचक्र की गति है न्यारी, ऋषभ भये वैरागी,
वेष दिगम्बर धार करम संग होली खेले रे...
                    भरत संग होली खेले रे...
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

कर्म काट शिवपुर को ध्याये, तीर्थंकर पद पाये...2
आदिनाथ से पूर्व बाहुबली मुक्ति पाये रे....
                    केवली प्रथम कहाये रे....
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
                           भरत संग होली खेले रे......2

श्री संभवनाथ चालीसा | सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व एवं लाभ (Sambhavnath Chalisa)

।।श्री सम्भवनाथ चालीसा ।। — कैसे असंभव को सम्भव कर दिया भगवान सम्भवनाथ जी ने।
कभी-कभी सबसे बड़ा जागरण... सबसे छोटी घटना से होता है।
महल की छत। शाम की हवा। दूर तक फैला वन। और आकाश में एक बादल — जिस पर बर्फ का एक टुकड़ा टिका था। अचानक तेज़ हवा चली... और वह बर्फ का टुकड़ा हवा में उड़कर... मिट गया।
बस।
एक राजा जो चवालिस लाख पूर्व से राज कर रहा था — वह उस एक पल में बदल गया।
यह कहानी है जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान सम्भवनाथ की।
🌸 श्रावस्ती — वह नगरी जो धन्य हो गई
जैनागम के अनुसार भगवान सम्भवनाथ का जन्म श्रावस्ती नगरी में हुआ — वही नगरी जो इतनी सुंदर थी कि देवताओं के मन को भी मोह लेती थी।
उनके पिता का नाम राजा दृढ़राज और माता का नाम सुषेणा था। फाल्गुन शुक्ला अष्टमी को गर्भ कल्याणक हुआ और कार्तिक पूर्णिमा को इस धरती पर एक तीर्थंकर ने जन्म लिया।
चालीसा में इस दिव्य क्षण का वर्णन है —
"तीन लोक में खुशियाँ छाई। शची प्रभु को लेने आई।
मेरू पर अभिषेक कराया। सम्भव प्रभु शुभ नाम धराया।।"
इंद्र की पत्नी शची स्वयं आईं। मेरु पर्वत पर अभिषेक हुआ। तीनों लोकों में उत्सव मना। और इस महान आत्मा को नाम मिला — सम्भव — अर्थात् जो असम्भव को सम्भव कर दे।
यह नाम सार्थक था। क्योंकि मोक्ष — जो इस संसार में सबसे कठिन और असम्भव लगता है — उसे सम्भव करने का मार्ग उन्होंने दिखाया।
उनके चरण में अश्व (घोड़े) का शुभ लक्षण था। उनकी आयु साठ लाख पूर्व की थी।
👑 राज्य, वैभव और... एक खालीपन
बचपन बीता। यौवन आया। पिता ने राज्याभिषेक किया। सुंदर रानियाँ मिलीं। राज्य का सुख भोगा — पूरे चवालिस लाख पूर्व तक।
यह संख्या हमारी कल्पना से परे है। लेकिन जैन दर्शन एक गहरी बात कहता है — चाहे सुख कितने भी वर्षों तक भोगो, आत्मा की प्यास नहीं बुझती। क्योंकि जो प्यास लगी है वह आत्मज्ञान की है — और उसे सांसारिक सुख से नहीं बुझाया जा सकता।
भगवान सम्भवनाथ के साथ भी यही हुआ।
❄️ वह एक पल — बर्फ का टुकड़ा और वैराग्य का उदय
"एक दिन महल की छत के ऊपर। देख रहे वन-सुषमा मनहर।
देखा मेघ-महल हिमखण्ड। हुआ नष्ट चली वायु प्रचण्ड।।
तभी हुआ वैराग्य एकदम। गृहबन्धन लगा नागपाश सम।।"
महल की छत पर खड़े थे। वन की सुंदरता निहार रहे थे। आकाश में बादलों का एक विशाल महल जैसा आकार बना था — और उस पर बर्फ का एक टुकड़ा। अचानक तेज़ हवा आई और वह सब — वह भव्य बादल-महल, वह हिमखंड — पल भर में नष्ट हो गया।
और उस एक दृश्य ने भगवान सम्भवनाथ को भीतर तक हिला दिया।
"यह राज्य भी तो ऐसा ही है। यह महल भी। यह वैभव भी। यह शरीर भी।
एक हवा का झोंका — और सब खत्म।"
घर के बंधन अब नागपाश जैसे लगने लगे। वस्तुओं के स्वरूप का चिंतन शुरू हुआ। लौकांतिक देवों ने आकर वैराग्य का समर्थन किया।
निर्णय हो गया।
🔱 दीक्षा — राजसिंहासन से वन की धरती तक
अपने पुत्र को राज्य सौंपकर भगवान सम्भवनाथ सिद्धार्थ पालकी पर सवार हुए और सहेतुक वन की ओर चल पड़े।
मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को हजारों राजाओं के साथ उन्होंने दिगम्बर दीक्षा ली। केशलोंच किया। परिग्रह त्यागा। पूर्व दिशा की ओर मुख करके ध्यान लगाया।
और उसी दिन — दीक्षा के तत्काल बाद — एक चमत्कार हुआ।
"आत्मशुद्धि का प्रबल प्रणाम। तत्क्षण हुआ मनः पर्याय ज्ञान।।"
मनःपर्यायज्ञान — यह वह दिव्य शक्ति है जिससे दूसरों के मन के विचार जाने जा सकते हैं। दीक्षा लेते ही यह ज्ञान प्रकट हो गया। यह इस बात का प्रमाण था कि उनकी आत्मा कितनी शुद्ध थी — और मोक्ष का मार्ग अब अधिक दूर नहीं था।
उनका प्रथम आहार सुरेन्द्र नामक श्रावक के यहाँ हुआ — जिसका जीवन उस एक दान से धन्य हो गया।
🌟 चौदह वर्ष की साधना — और केवलज्ञान का उदय
दीक्षा के बाद चौदह वर्षों तक उन्होंने घोर तपस्या की। ध्यान, मौन, उपवास — एक-एक कर्म की परत हटती गई।
और फिर —
"चौदह वर्ष की आत्म सिद्धि। स्वयं ही उपजी केवल ऋद्धि।।
कृष्ण चतुर्थी कार्तिक सार। समवशरण रचना हितकार।।"
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को केवलज्ञान प्रकट हुआ। देवताओं ने समवसरण की रचना की। और भगवान सम्भवनाथ की दिव्य वाणी प्रकट हुई — जो हर जीव को उसकी अपनी भाषा में समझ आई।
यह जिनवाणी की सबसे बड़ी विशेषता है — वह सबको अपनी भाषा में सुनाई देती है।
📿 जिनवाणी का सार — तीन शब्दों में मोक्ष का रास्ता
भगवान सम्भवनाथ की वाणी में जो सबसे गहरी बात थी, वह चालीसा में इन पंक्तियों में है —
"जिनलिंग से निज को पहचानो। अपना शुद्धातम सरधानो।
दर्शन-ज्ञान-चरित्र बतावे। मोक्ष मार्ग एकत्व दिखाये।।"
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र — यही रत्नत्रय है। यही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।
और एक और कठोर सत्य —
"विषयभोग हैं भोगों से। काया घिरती है रोगों से।।"
जितने भी विषय-भोग हैं — वे सब अंततः शरीर को रोगों से घेर देते हैं। यह केवल आध्यात्मिक सत्य नहीं, यह वैज्ञानिक सत्य भी है। इंद्रियों के पीछे भागने से न सुख मिलता है, न शांति।
उनके संघ में 105 गणधर थे और पंद्रह हजार मुनिवर थे। देव, मनुष्य, तिर्यंच — सभी उनके समवसरण में उपस्थित रहते थे।
🏔️ सम्मेद शिखर — अंतिम पड़ाव
जब आयु का केवल एक महीना शेष बचा, तो भगवान सम्भवनाथ सम्मेद शिखर पहुँचे।
"अचल हुए खड्गासन में प्रभु। कर्म नाश कर हुए स्वयम्भु।।
चैत सुदी षष्ठी था न्यारी। धवल कूट की महिमा भारी।।"
चैत्र शुक्ल षष्ठी को धवल कूट पर — उन्होंने समस्त कर्मों को नष्ट किया और मोक्ष प्राप्त किया। खड्गासन में अचल खड़े रहकर आत्मा ने अपनी अंतिम उड़ान भरी — संसार से परे, कर्मों से परे, जन्म-मृत्यु से परे।
🙏 चालीसा पाठ का फल और निष्कर्ष
"चालीसा श्री सम्भवनाथ, पाठ करो श्रद्धा के साथ।
मनवांछित सब पूरण होवे, जनम-मरन दुख खोवे।।"
भगवान सम्भवनाथ का जीवन हमें एक ही बात सिखाता है — जागरण के लिए कोई बड़ी घटना की ज़रूरत नहीं। एक बूँद ओस, एक फटा बादल, एक पिघला बर्फ का टुकड़ा — बस इतना काफी है, अगर आँखें देखने वाली हों।
असम्भव को सम्भव करने वाले प्रभु सम्भवनाथ के चरणों में —
दर्शकों भले ही तीर्थंकरों का जीवन सुख में रहा हो और उन्होंने कई वैभव और आनन्द को अपने जीवन काल में व्यतीत किया हो लेकिन नर से नारायण बनने तक की यात्रा कठिन होती है और तीर्थंकर श्री संभवनाथ जी ने अपने जीवनकाल में यह करके दिखाया।
तो आइए हम भी उन प्रभु की चालीसा का पाठ करते हैं-

।।श्री सम्भवनाथ चालीसा।।

दोहा:-
श्री जिनदेव को करके वंदन, जिनवानी को मन में ध्याय ।
काम असम्भव कर दे सम्भव, समदर्शी सम्भव जिनराय ।।

चोपाई:-
जगतपूज्य श्री सम्भव स्वामी । तीसरे तीर्थकंर है नामी ।।
धर्म तीर्थ प्रगटाने वाले । भव दुख दुर भगाने वाले ।।
श्रावस्ती नगरी अती सोहे । देवो के भी मन को मोहे ।।
मात सुषेणा पिता दृडराज । धन्य हुए जन्मे जिनराज ।।
फाल्गुन शुक्ला अष्टमी आए । गर्भ कल्याणक देव मनाये ।।
पूनम कार्तिक शुक्ला आई । हुई पूज्य प्रगटे जिनराई ।।
तीन लोक में खुशियाँ छाई । शची पर्भु को लेने आई ।।
मेरू पर अभिषेक कराया । सम्भवपर्भु शुभ नाम धराया ।।
बीता बचबन यौवन आया । पिता ने राज्यभिषेक कराया ।।
मिली रानियाँ सब अनुरूप । सुख भोगे चवालिस लक्ष पूर्व ।।
एक दिन महल की छत के ऊपर । देख रहे वन-सुषमा मनहर ।।
देखा मेघ – महल हिमखण्ड । हुआ नष्ट चली वासु प्रचण्ड ।।
तभी हुआ वैराग्य एकदम । गृहबन्धन लगा नागपाश सम ।।
करते वस्तु-स्वरूप चिन्तवन । देव लौकान्तिक करें समर्थन ।।
निज सुत को देकर के राज । वन को गमन करें जिनराज ।।
हुए स्वार सिद्धार्थ पालकी । गए राह सहेतुक वन की ।।
मंगसिर शुक्ल पूर्णिमा प्यारी । सहस भूप संग दीक्षा धारी ।।
तजा परिग्रह केश लौंच कर । ध्यान धरा पूरब को मुख कर ।।
धारण कर उस दिन उपवास । वन में ही फिर किया निवास ।।
आत्मशुद्धि का प्रबल प्रणाम । तत्क्षण हुआ मनः पर्याय ज्ञान ।।
प्रथमाहार हुआ मुनिवर का । धन्य हुआ जीवन सुरेन्द्र का ।।
पंचाश्चर्यो से देवो के । हुए प्रजाजन सुखी नगर के ।।
चौदह वर्ष की आत्म सिद्धि । स्वयं ही उपजी केवल ऋद्धि ।।
कृष्ण चतुर्थी कार्तिक सार । समोशरण रचना हितकार ।।
खिरती सुखकारी जिनवाणी । निज भाषा में समझे प्राणी ।।
विषयभोग हैं भोगों से । काया घिरती है रोगो से ।।
जिनलिंग से निज को पहचानो । अपना शुद्धातम सरधानो ।।
दर्शन-ज्ञान-चरित्र बतावे । मोक्ष मार्ग एकत्व दिखाये ।।
जीवों का सन्मार्ग बताया । भव्यो का उद्धार कराया ।।
गणधर एक सौ पाँच प्रभु के । मुनिवर पन्द्रह सहस संघ के ।।
देवी – देव – मनुज बहुतेरे । सभा में थे तिर्यंच घनेरे ।।
एक महीना उम्र रही जब । पहुँच गए सम्मेद शिखर तब ।।
अचल हुए खङगासन में प्रभु । कर्म नाश कर हुए स्वयम्भु ।।
चैत सुदी षष्ठी था न्यारी । धवल कूट की महिमा भारी ।।
साठ लाख पूर्व का जीवन । पग में अश्व का था शुभ लक्षण ।।

दोहा:-
चालीसा श्री सम्भवनाथ, पाठ करो श्रद्धा के साथ ।
मनवांछित सब पूरण होवे, जनम – मरन दुख खोवे ।।

श्री विमलनाथ चालीसा | सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व एवं लाभ (Vimalnath Chalisa)

।। श्री विमलनाथ चालीसा ।। — एक बूँद ओस और नर से नारायण बनने तक का सफर
कभी-कभी जिंदगी का सबसे बड़ा सच... सबसे छोटी सी चीज़ बता देती है।
सुबह की धूप अभी-अभी निकली थी। राजमहल के बगीचे में घास पर ओस की बूँदें चमक रही थीं — मोतियों जैसी, हीरों जैसी। एक राजा खड़ा था और उन्हें देख रहा था। तभी सूरज की किरणें आईं... और वे सारी बूँदें — एक पल में — गायब हो गईं।
बस यही एक पल था। और इसी एक पल ने एक चक्रवर्ती सम्राट को बदल दिया।
यह कहानी है जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ की।
🌫️ रहस्य की शुरुआत — कौन थे विमलनाथ?
"विमल" — अर्थात् जो पूर्णतः निर्मल हो। जिनके मन में, वचन में, कर्म में — कहीं भी कोई मैल न हो। भगवान विमलनाथ का यह नाम उनके संपूर्ण जीवन का सार है।
श्री विमलनाथ चालीसा उनकी उस यात्रा को शब्दों में उतारती है जो एक राजमहल से शुरू होकर सम्मेद शिखर पर समाप्त होती है। लेकिन इस यात्रा के बीच में जो घटता है — वह किसी रहस्यकथा से कम नहीं।
चालीसा का पहला ही भाव मन को ठहरा देता है —
"विमलप्रभु की विमल भक्ति कर, चरण कमल में शीश नवाय।"
यह केवल वंदना नहीं — यह एक निमंत्रण है। उस यात्रा पर चलने का निमंत्रण जो भीतर की ओर जाती है।
👶 जन्म की रात — जब देवताओं ने उत्सव मनाया
कंपिलापुर नगरी। राजा कृतवर्मा का महल। रानी जयश्यामा की आँखें उस रात अजीब सपनों से भरी थीं — मंगलमय, शुभ, अलौकिक सपने। जैन परंपरा में ये सोलह स्वप्न एक ही बात का संकेत देते हैं — कोई महान आत्मा आने वाली है।
और फिर आया वह दिन — माघ मास की शुक्ल चतुर्थी।
भगवान विमलनाथ का जन्म हुआ।
"जन्योत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया।
मेरु पर अभिषेक कराया, गन्धोंदक श्रद्धा से लगाया।।"
इंद्र स्वयं आए। मेरु पर्वत पर अभिषेक हुआ। दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाकर बालक को माता-पिता को सौंपा गया। यह कोई साधारण जन्म नहीं था — यह एक ऐसी आत्मा का आगमन था जो अनंत काल की साधना के बाद अंतिम जन्म लेने आई थी।
उनका तन सोने जैसा दमकता था। साठ धनुष की ऊँचाई और साठ लाख वर्ष की आयु — ये संख्याएँ हमें बताती हैं कि तीर्थंकर का अस्तित्व हमारी कल्पना से भी परे होता है।
👑 राजपाट, विवाह और वैभव — पर भीतर कुछ और था
समय बीता। बचपन गया, यौवन आया। पिता ने राजतिलक किया। सुंदर वधुओं से विवाह हुआ। राज्य मिला। सब कुछ था — जो एक राजा को चाहिए होता है, वह सब।
लेकिन...
क्या आपने कभी महसूस किया है कि कभी-कभी सब कुछ होते हुए भी भीतर एक अजीब सी खालीपन रहती है? एक अनजानी बेचैनी? एक अनुत्तरित प्रश्न?
भगवान विमलनाथ के भीतर भी कुछ ऐसा ही था। राजसिंहासन पर बैठे थे — पर आत्मा किसी और ही दिशा में देख रही थी।
और फिर आया वह रहस्यमय सुबह का क्षण।
💧 ओस की बूँद — जो राज़ खोल गई
"एक दिन देखी ओस घास पर, हिमकण देखें नयन प्रीतिभर।
हुआ संसर्ग सूर्य रश्मि से, लुप्त हुए सब मोती जैसे।।"
सोचिए उस दृश्य को —
सुबह की ताज़ी हवा। हरी-हरी घास। उस पर टिकी ओस की बूँदें — मोतियों की तरह चमकती हुईं। एक राजा उन्हें देख रहा है, मुग्ध होकर।
और तभी... सूरज निकला।
बस एक किरण पड़ी — और वे सारी बूँदें जो इतनी सुंदर थीं, इतनी चमकदार थीं — एक पल में वाष्प बन गईं। जैसे थीं ही नहीं।
भगवान विमलनाथ वहीं ठिठक गए। चित्रलिखित से खड़े रह गए।
उनके मन में एक विचार कौंधा —
"क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार।"
यह राज्य — इस ओस जैसा है।
यह सौंदर्य — इस ओस जैसा है।
यह वैभव, यह सत्ता, यह प्रेम — सब इस ओस जैसा है।
सूरज की एक किरण — यानी काल का एक पल — और सब कुछ समाप्त।
यह दर्शन किसी दार्शनिक ने नहीं दिया था। यह दर्शन एक बूँद ओस ने दिया था।
🚶 महल से वन की ओर — वह निर्णय जो बदल गया सब
उस दिन के बाद भगवान विमलनाथ बदल गए।
वे घर लौटे — पर अनमने होकर। मन पहले जैसा नहीं रहा था। क्रोध, मान और माया — ये तीनों उनके हृदय से एक-एक कर छूटने लगे। वैराग्य की जो आग भीतर सुलगी थी, वह अब लौ बन चुकी थी।
उन्होंने अपना राजपाट अपने पुत्र को सौंपा। दिव्य शिविका पर चढ़कर सहेतुक वन की ओर चल पड़े।
"माघ मास-चतुर्थी कारी, 'नम: सिद्ध' कह दीक्षाधारी।।"
"नमः सिद्धेभ्यः" — सिद्धों को नमन — यह उनका पहला उद्घोष था दीक्षा के क्षण में। और उसी माघ चतुर्थी को जिस दिन उनका जन्म हुआ था — उसी तिथि को उन्होंने दीक्षा ली। जन्म और त्याग — एक ही तिथि पर। यह संयोग नहीं था — यह नियति थी।
🔥 तप का रहस्य — आत्मा जब कर्मों से लड़ती है
दीक्षा के बाद का जीवन बाहर से देखने में सरल लगता है — मौन, ध्यान, तप। पर भीतर से यह एक भयंकर युद्ध था।
कर्मों का युद्ध।
हर कर्म जो अनंत जन्मों में बाँधा था — वह आत्मा को जकड़े रखता है। और साधक उन्हें तप की अग्नि में एक-एक कर जलाता है। यह प्रक्रिया दिखती नहीं — पर होती है। चुपचाप। गहराई में।
भगवान विमलनाथ के उपदेश में एक रहस्य था जो उन्होंने समवसरण में खोला —
"उपशम करके मिथ्यात्व का, अनुभव करलो निज आत्म का।"
मिथ्यात्व — अर्थात् वह भ्रम जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम यह शरीर हैं, यह नाम हैं, यह पद हैं। जब तक यह भ्रम है, संसार-भ्रमण जारी रहेगा।
और उन्होंने एक और गहरा सत्य कहा —
"बिन सम्यक्त्व के जप-तप-पूजन, विफल हैं सारे व्रत-अर्चन।"
यह बात चौंकाती है। क्या बिना सम्यक्त्व (सच्चे ज्ञान) के की गई पूजा व्यर्थ है? हाँ — क्योंकि जब तक आत्मा का सही बोध नहीं, तब तक सब कर्मकाण्ड केवल आदत है, भक्ति नहीं।
🌌 55 गणधर और 68 हजार मुनि — एक विशाल संघ
भगवान विमलनाथ अकेले नहीं थे। उनके संघ की विशालता देखकर मन में एक भव्य दृश्य उभरता है —
"'मन्दर' आदि पचपन गणधर, अड़सठ सहस दिगम्बर मुनिवर।।"
पचपन गणधर — जिनमें मन्दर प्रमुख थे। अड़सठ हजार दिगम्बर मुनि। यह कोई छोटा-मोटा आध्यात्मिक आंदोलन नहीं था। यह एक पूरी क्रांति थी — आत्मा की क्रांति। जो बाहर की दुनिया को नहीं, भीतर की दुनिया को बदलती है।
उनकी दिव्य वाणी सुनकर दूर-दूर तक लोगों ने आत्मोद्धार किया। जिनवाणी का यह प्रवाह रुका नहीं — बहता रहा, फैलता रहा।
🏔️ सम्मेद शिखर का अंतिम रहस्य
जब आयु के केवल तीस दिन शेष बचे, तो भगवान विमलनाथ सम्मेद शिखर की ओर चल पड़े।
वह पर्वत जो रहस्यों का घर है। जहाँ असंख्य तीर्थंकरों की आत्माएँ मोक्ष को प्राप्त हुई हैं। जहाँ की मिट्टी में ही मुक्ति की सुगंध है।
"उम्र रही जब तीस दिनों क, जा पहुँचे सम्मेद शिखर जी।
हुआ बाह्य वैभव परिहार, शेष कर्म बन्धन निरवार।।"
वहाँ पहुँचकर उन्होंने योगनिरोध लिया। श्वास थमी। शरीर स्थिर हुआ। और आत्मा ने उस अंतिम छलाँग लगाई जो हर तीर्थंकर लगाता है —
मोक्ष।
"आवागमन का कर संहार, प्रभु ने पाया मोक्षागारा।।"
आषाढ़ मास की कृष्ण षष्ठी को — वह पल आया। भव-बंधन का अंत। जन्म-मृत्यु के चक्र का अंत। और आत्मा का अनंत आनंद में विलीन होना।
"सुबीर कूट" — सम्मेद शिखर पर उनका निर्वाण स्थल — आज भी लाखों भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है।
🙏 अरुणा की विनती — और हर भक्त की पुकार
चालीसा का अंत एक भक्त की सरल, निर्मल विनती से होता है —
"'अरुणा' करती विमल-स्तवन, ढीले हो जावें भव-बन्धन।।"
यह एक पंक्ति पूरी चालीसा का सार है। भक्त कुछ बड़ा नहीं माँग रहा। सोना नहीं, राज्य नहीं, यश नहीं। बस एक विनती — भव-बंधन ढीले हो जाएँ।
और जो भी सच्चे मन से विमलनाथ प्रभु का ध्यान करता है —
"जो भवि विमलप्रभु को ध्यावें, वे सब मन वांछित फल पावें।।"
✨ अंतिम बात — उस ओस की बूँद को याद रखो
आज जब आप सुबह उठें और घास पर ओस देखें — एक पल के लिए रुकिए।
देखिए कैसे वे चमकती हैं। और फिर देखिए कैसे सूरज की एक किरण में मिट जाती हैं।
भगवान विमलनाथ ने यही देखा था। और उनका जीवन बदल गया था।
शायद हमारा भी बदले।
"क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार।"

दर्शकों हमने भगवान विमलनथ जी के चरित्र के बारे जाना और अब हम उनकी सुंदर चालीसा का पाठ करेंगे इस चालीसा को पढ़ते ही सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। और हमारे सभी मनवांछित कार्य पूरे होने लगते हैं तो चलिए देर ना करते हुए इसका पाठ करते हैं।

।।श्री विमलनाथ चालीसा।।

सिद्ध अनन्तानन्त नमन कर, सरस्वती को मन में ध्याय ।।
विमलप्रभु क्री विमल भक्ति कर, चरण कमल में शीश नवाय ।।
जय श्री विमलनाथ विमलेश, आठों कर्म किए नि:शेष ।।
कृतवर्मा के राजदुलारे, रानी जयश्यामा के प्यारे ।।
मंगलीक शुभ सपने सारे, जगजननी ने देखे न्यारे ।।
शुक्ल चतुर्थी माघ मास की, जन्म जयन्ती विमलनाथ की ।।
जन्योत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया ।।
मेरु पर अभिषेक कराया, गन्धोंदक श्रद्धा से लगाया ।।
वस्त्राभूषण दिव्य पहनाकर, मात-पिता को सौंपा आकर ।।
साठ लाख वर्षायु प्रभु की, अवगाहना थी साठ धनुष की ।।
कंचन जैसी छवि प्रभु- तन की, महिमा कैसे गाऊँ मैं उनकी ।।
बचपन बीता, यौवन आया, पिता ने राजतिलक करवाया ।।
चयन किया सुन्दर वधुओं का, आयोजन किया शुभ विवाह का ।।
एक दिन देखी ओस घास पर, हिमकण देखें नयन प्रीतिभर ।।
हुआ संसर्ग सूर्य रश्मि से, लुप्त हुए सब मोती जैसे ।।
हो विश्वास प्रभु को कैसे, खड़े रहे वे चित्रलिखित से ।।
“क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार ।।
वैराग्य हृदय में समाया, छोडे क्रोध -मान और माया ।।
घर पहुँचे अनमने से होकर, राजपाट निज सुत को देकर ।।
देवीमई शिविका पर चढ़कर, गए सहेतुक वन में जिनवर ।।
माघ मास-चतुर्थी कारी, “नम: सिद्ध” कह दीक्षाधारी ।।
रचना समोशरण हितकार, दिव्य देशना हुई सुरवकार ।।
उपशम करके मिथ्यात्व का, अनुभव करलो निज आत्म का ।।
मिथ्यात्व का होय निवारण, मिटे संसार भ्रमण का कारणा ।।
बिन सम्यक्तव के जप-तप-पूजन, विष्फल हैँ सारे व्रत- अर्चन ।।
विषफल हैं ये विषयभोग सब, इनको त्यागो हेय जान अब ।।
द्रव्य- भाव्-नो कमोदि से, भिन्न हैं आत्म देव सभी से ।।
निश्चय करके हे निज आतम का, ध्यान करो तुम परमात्म का ।।
ऐसी प्यारी हित की वाणी, सुनकर सुखी हुए सब प्राणी ।।
दूर-दूर तक हुआ विहार, किया सभी ने आत्मोद्धारा ।।
‘मन्दर’ आदि पचपन गणधर, अड़सठ सहस दिगम्बर मुनिवर ।।
उम्र रही जब तीस दिनों क, जा पहुँचे सम्मेद शिखर जी ।।
हुआ बाह्य वैभव परिहार, शेष कर्म बन्धन निरवार ।।
आवागमन का कर संहार, प्रभु ने पाया मोक्षागारा ।।
षष्ठी कृष्णा मास आसाढ़, देव करें जिनभवित प्रगाढ़ ।।
सुबीर कूट पूजें मन लाय, निर्वाणोत्सव को’ हर्षाय ।।
जो भवि विमलप्रभु को ध्यावें। वे सब मन वांछित फल पावें ।।
‘अरुणा’ करती विमल-स्तवन, ढीले हो जावें भव-बन्धन ।।

रविवार, 14 जून 2026

श्री अरहनाथ चालीसा – अर्थ, महत्व और मोक्ष की गाथा

।। श्री अरहनाथ चालीसा ।। — चक्रवर्ती से सिद्ध परमेष्ठी तक की अलौकिक यात्रा
क्या आप जानते है भगवान अरहनाथ तीर्थंकर कामदेव और चक्रवर्ती पद के धारी थे। तीर्थंकरों की श्रृंखला में भगवान अरहनाथ जी शांतिनाथ और कुंथुनाथ भगवान के पश्चात तीसरे तीर्थंकर थे जो त्रयपद धारी कहलाते है।आज हम उनकी ही चालीसा और चरित्र प्रसंग के बारे में पढेंगे तो चलिए इस लेख को प्रारम्भ करते है।

जैन धर्म के अठारहवें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ — एक ऐसा नाम जो सुनते ही मन में भक्ति और श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ता है। "अरह" अर्थात् जो कर्मों के चक्र से परे हो गए हों। जिन्होंने न केवल छह खंडों पर राज किया, बल्कि उस सम्पूर्ण राज्य को एक पल में छोड़कर मोक्ष का वरण किया।

श्री अरहनाथ चालीसा उनकी इसी असाधारण जीवन-गाथा को शब्दों में पिरोती है। यह केवल एक स्तुति नहीं — यह उस आत्मा की कहानी है जो राजसिंहासन पर बैठकर भी भीतर से वैरागी थी। आइए इस दिव्य चालीसा के माध्यम से भगवान अरहनाथ के जीवन के हर पड़ाव को महसूस करें।

🌺 वन्दना — पाँच परमेष्ठी और जिनवाणी का महत्व-
चालीसा का आरंभ एक गहरे दार्शनिक भाव से होता है —
"पाँचों ही परमेष्ठी को, वन्दन बारम्बार।
जिनवाणी का ज्ञान ही, जीवन का आधार।।"
जैन धर्म में पाँच परमेष्ठी — अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु — को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इनकी वंदना से जीवन में सच्ची दिशा मिलती है। और जिनवाणी — अर्थात् तीर्थंकरों का उपदेश — यही हमारे जीवन का असली आधार है। संसार में जितने भी ग्रंथ, शास्त्र और विद्याएँ हैं, वे सब अधूरी हैं अगर आत्मज्ञान का बोध न हो।
भगवान अरहनाथ की वंदना के बारे में कहा गया है कि उनका नाम लेने मात्र से कर्मों का क्लेश कटता है और आत्मा का सच्चा स्वरूप प्रकट होने लगता है।

🏡 जन्म की दिव्य बेला — सोमवंश की शान-
भगवान अरहनाथ का जन्म सोमवंश में हुआ। उनके पिता का नाम सुदर्शन था — जो सम्यग्दृष्टि अर्थात् सच्चे ज्ञान के धारक थे — और माता का नाम मित्रसेना था।
जब तीर्थंकर के जन्म का समय निकट आया, तो प्रकृति ने स्वयं उसका स्वागत किया। माता मित्रसेना ने सोलह शुभ स्वप्न देखे — जो जैन परंपरा में तीर्थंकर के जन्म का संकेत माने जाते हैं। राजमहल में रत्नों की वृष्टि हुई। चारों दिशाओं में निर्मल वायु बहने लगी। छहों ऋतुएँ एक साथ अपनी सुंदरता बिखेरने लगीं और पूर्व दिशा में अलौकिक लालिमा छा गई।

चालीसा इस दृश्य को इन शब्दों में कैद करती है —
"चहुँ दिश निर्मल वायु बहती, छह ऋतुएँ भी संग-संग रहती।
सब प्राणी के मन खुशहाली, पूर्व दिशा में आई लाली।।"
इंद्र देवताओं के साथ धरती पर उतरे, जन्मकल्याणक का उत्सव मनाया और समस्त संसार में लक्ष्मी का वास हो गया। यह जन्म किसी साधारण राजपुत्र का नहीं था — यह एक युग-प्रवर्तक आत्मा का अवतरण था।

👑 चक्रवर्ती पद — छह खंडों का स्वामी-
यौवन आया तो राज्य मिला। विवाह हुआ और उनके जीवन में सांसारिक वैभव का हर रंग था। किंतु भगवान अरहनाथ यहीं नहीं रुके — उन्होंने चक्ररत्न को प्राप्त किया और चक्रवर्ती सम्राट बने।
चक्रवर्ती वह होता है जिसके राज्य में छहों खंड आते हैं — और जिसकी आज्ञा को षट्खंड के सभी राजा सिर माथे चढ़ाते हैं। भगवान अरहनाथ उस परम वैभव के स्वामी बने।
"षटखण्ड राजा शरण में आये, आज्ञा को सिर माथ चढ़ाये।"
वे कामदेव पदवी के धारी भी थे — अर्थात् उनका सौंदर्य इतना अनुपम था कि देखने वाले मोहित हो जाते थे। ऐसा व्यक्ति जिसके पास सब कुछ था — सत्ता, सौंदर्य, समृद्धि — उसका अगला कदम क्या था? यहीं से उनकी असली कहानी शुरू होती है।

🌧️ बादलों ने बदल दी जिंदगी की दिशा-
यह घटना बड़ी छोटी सी थी — किंतु इसने एक चक्रवर्ती सम्राट को वैरागी बना दिया।
एक दिन शरद ऋतु में भगवान अरहनाथ ने आकाश में बादलों को देखा। वे बादल फटे हुए थे — बिखरे हुए थे। और उस दृश्य ने उनके मन में संसार की नश्वरता का गहरा बोध करा दिया।
"शरद ऋतु के बादल देखे, फटे हुए थे कारण लेखे।
क्षणभंगुर संसार को जाना, पहना फिर वैराग्य का बाना।।"
जैसे बादल आते हैं, छा जाते हैं और फिर बिखर जाते हैं — ठीक वैसे ही यह संसार भी है। यह राज्य, यह सौंदर्य, यह वैभव — सब कुछ क्षणभंगुर है। इस एक अनुभूति ने उनके भीतर के वैराग्य को जगा दिया जो शायद जन्मों से सुप्त था।
कुम्भकार (कुम्हार) जैसे मिट्टी के चाक को एक पल में छोड़ देता है — वैसे ही भगवान अरहनाथ ने छह खंडों के चक्र को छोड़ दिया। गृहलक्ष्मी से नाता तोड़ा और संयम का मार्ग अपनाया।

🔱 दीक्षा — सम्राट से साधु तक-
दीक्षा के समय भगवान अरहनाथ ने पंचमुष्ठि केशलोंच किया — अर्थात् अपने हाथों से पाँच मुट्ठी में केश उखाड़े। यह क्रिया केवल शारीरिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी है — यह अहंकार, मोह और देह-आसक्ति को जड़ से उखाड़ने का संकल्प है।
उनके साथ एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की। एक सहज राजा विशेष रूप से उनके साथ आए। यह दृश्य कितना भव्य रहा होगा — एक सम्राट और उनके हजारों साथी, सब एक साथ संसार को छोड़कर आत्मसाधना की ओर चल पड़े।
"पँचमुष्ठी केशलोंच किया था, आतम निज में लीन किया था।
एक सहज राजा संग आये, दीक्षा ले संग ध्यान लगाये।।"
दीक्षा के बाद भगवान अरहनाथ वन में चले गए। मौन, ध्यान और तप — यही उनका जीवन बन गया।

🌟 केवलज्ञान — ज्ञान का दीपक जला-
वन में घोर तपस्या करते हुए भगवान अरहनाथ ने एक-एक कर्म को तप की अग्नि में जलाना शुरू किया। कर्मों की यह परतें आत्मा को ढकती हैं, उसके असली स्वरूप को छुपाती हैं। जैसे-जैसे ये परतें हटती गईं, आत्मा का प्रकाश और तेज होता गया।
और फिर वह दिव्य क्षण आया —
"तप अग्नि में कर्म जलाये, केवलज्ञान का दीप जलाये।
देवों ने आ पूजा कीनी, समवशरण रचना कर दीनी।।"
केवलज्ञान — वह परम प्रकाश जिसमें तीनों काल और तीनों लोक एक साथ प्रकाशित हो जाते हैं। देवताओं ने तुरंत आकर पूजा की और समवसरण की रचना की। भक्तों को स्थान मिला, हृदय खिल उठे और जिनवरमुद्रा ने ज्ञान-ध्यान का पाठ पढ़ाना शुरू किया।

📿 जिनवाणी का अमृत — चार गति से मुक्ति का मार्ग-
भगवान अरहनाथ की वाणी में एक ही संदेश था — आत्मा को पहचानो और कर्म-बंधन से मुक्त हो जाओ। उन्होंने चार गतियों — नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव — के दुखों का वर्णन करके भव्यजनों को सचेत किया।
चालीसा में भक्त की पुकार बड़ी मार्मिक है —
"चार गति से हमें छुड़ाओ, जग दुखों से हमें बचाओ।
ज्ञान किरण हमको दिखला दो, मुक्ति का रस्ता बतला दो।।"
और आगे भक्त की आकांक्षा और भी गहरी होती है —
"ज्ञानामृत का भोजन पाऊँ, और अमर इससे हो जाऊँ।।"
यह पंक्ति अद्भुत है। भक्त भोजन नहीं माँग रहा, धन नहीं माँग रहा — वह ज्ञानामृत माँग रहा है। वह अमरता माँग रहा है — और जैन दर्शन में यही सच्ची अमरता है — मोक्ष, जहाँ आत्मा फिर कभी जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं आती।
भगवान अरहनाथ के उपदेश का प्रभाव इतना गहरा था कि जिस-जिस ने उनका नाम लिया, उसका बेड़ा पार हो गया —
"जिस-जिस ने प्रभु नाम लिया था, उसका बेड़ापार हुआ था।"
🏔️ सम्मेद शिखर — अंतिम विश्राम और मोक्ष
विहार करते हुए, देश-देश में धर्म का प्रकाश फैलाते हुए अंत में भगवान अरहनाथ श्री सम्मेद शिखर पहुँचे — वह पवित्र भूमि जो जैन परंपरा में सबसे पूजनीय तीर्थ है और जहाँ असंख्य तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया है।
"श्री सम्मेद शिखर मन भाया, वहाँ से मुक्ति को पडराया।"
वहाँ योगनिरोध की अवस्था में रहकर, समस्त क्रियाओं को शांत करके उन्होंने शेष कर्मों को भी नष्ट किया और परम मोक्ष को प्राप्त हुए। आठों कर्म नष्ट हो गए और आत्मा सिद्धालय में विराजमान हो गई — अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त शक्ति के साथ।

🙏 भक्त का संकल्प — चालीसा की आत्मा
इस चालीसा में जो बात सबसे अलग और प्रभावशाली है, वह है भक्त का व्यक्तिगत संकल्प। भक्त केवल माँगता नहीं — वह बदलने का वादा भी करता है —
"पापकर्म से दूर हटेंगे, क्रोध मान से दूर रहेंगे।
भक्ति का पथ हमको प्यारा, क्षणभंगुर सुख इससे हारा।।"
यह पंक्तियाँ बताती हैं कि सच्ची भक्ति वह नहीं जो केवल मंदिर में सिर झुकाने से होती है। सच्ची भक्ति वह है जो जीवन में बदलाव लाए — क्रोध छूटे, मान (अहंकार) छूटे, पापकर्म से दूरी बने।

✨ चालीसा पाठ का फल
चालीसा के अंत में कहा गया है —
"चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि-सिद्धि मंगल करें, होवें भव से पार।।"
लगातार चालीस दिनों तक इस चालीसा का पाठ करने से रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है, जीवन में मंगल होता है और संसार के बंधन से मुक्ति का मार्ग खुलता है। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं — जब भक्त प्रतिदिन ऐसे शब्दों का पाठ करता है जो उसे वैराग्य, ज्ञान और आत्मशुद्धि की याद दिलाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उसका जीवन बेहतर होने लगता है।
🌸 निष्कर्ष — अरहनाथ का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है
भगवान अरहनाथ का जीवन आज के युग में भी उतना ही प्रेरणादायक है। आज हम भी उसी दौड़ में हैं — धन, पद, प्रतिष्ठा। लेकिन एक फटा बादल किसी को भी यह याद दिला सकता है कि यह सब कितना अस्थायी है।
उनका संदेश सरल है — आत्मा की शरण लो, कर्म-बंधन तोड़ो और मुक्ति का मार्ग पकड़ो।
श्री अरहनाथ चालीसा का नित्य पाठ हमें इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
"श्री 'अर' प्रभु के चरण में, वन्दन शत-शत बार।
सबकी विपदायें हरो, विनती बारम्बार।।"
दर्शकों आईये अब हम पाठ करते हैं भगवान अरहनाथ जी के गुणों से युक्त प्रभु की मनोरम चालीसा का-

।।श्री अरहनाथ चालीसा।।

दोहा:-
पाँचों ही परमेष्ठी को, वन्दन बारम्बार।
जिनवाणी का ज्ञान ही, जीवन का आधार।।
श्री 'अरह' प्रभु की वन्दना, काटे कर्म क्लेश।
चालीसा पढ़कर मिले, सच्चा आतम भेष।।

चौपाई:-
सिद्धो की श्रेणी में रहते, 
सिद्ध प्रभु हम आपको कहते।
आठों कर्मों को नाशा है,
सिद्धालय में ही वासा है।।

भक्तों के आराध्य आप हो,
भक्तों के भी साध्य आप हो।
साधन है 'अरह' नाम तुम्हारा,
मुक्ति का मिल जाये किनारा।।

नम्रीभूत जगत है सारा,
वन्दन करता बारम्बारा।
सोमवंश में जन्म है पाया,
मित्रसेना को माँ बतलाया।।

पिता सुदर्शन सम्यग्दृष्टि,
महल में होती रत्न की वृष्टि।
सोलह शुभ सपने लख माँ ने,
तीर्थंकर के जन्म को पाने।।

चहुँ दिश निर्मल वायु बहती,
छह ऋतुएँ भी संग- संग रहती।
सब प्राणी के मन खुशहाली,
पूर्व दिशा में आई लाली।।

इन्द्रों संग सुर भू पर आये,
कल्याणक खुशियाँ बरसाये।
लक्ष्मी ने आ डाला डेरा,
सबके दुर्दिन को है फेरा।।

तीर्थंकर की महिमा गाई,
बस 'अर' प्रभु का नाम सहाई।
जब यौवन का मौसम आया,
कन्यायों को फिर परिणाया।।

राज्य पिता ने तुमको दीना,
न्याय से प्रभु ने कार्य को कीना।
चक्ररत्न ने स्वामी माना,
चक्रवर्ती बन विजय को जाना।।

षटखण्ड राजा शरण में आये,
आज्ञा को सिर माथ चढाये।
स्वप्न में भी खुद पास न आता,
जोड़ा फिर आतम से नाता।।

कामदेव पदवी के धारी,
किससे उपमा करें तुम्हारी।
देख सभी मोहित हो जाते,
बात कोई वे सोच न पाते।।

शरद ऋतु के बादल देखे,
फटे हुए थे कारण लेखे।
क्षणभंगुर संसार को जाना,
पहना फिर वैराग्य का बाना।।

कुम्भकार सम चक्र को छोड़ा,
गृहलक्ष्मी से नाता तोड़ा।
दीक्षा ले संयम को धारा,
नश्वर सुख को दिया किनारा।।

पँचमुष्ठी केशलोंच किया था,
आतम निज में लीन किया था।
एक सहज राजा संग आये,
दीक्षा ले संग ध्यान लगाये।।

तप अग्नि में कर्म जलाये,
केवलज्ञान का दीप जलाये।
देवों ने आ पूजा कीनी,
समवशरण रचना कर दीनी।।

भक्तों को स्थान मिला था,
भक्त हृदय भी शीघ्र खिला था।
जिनवरमुद्रा पाठ पढ़ाती,
ज्ञान- ध्यान की याद दिलाती।।

जिस- जिस ने प्रभु नाम लिया था,
उसका बेड़ापार हुआ था।
चार गति से हमें छुड़ाओ,
जग दुखों से हमें बचाओ।।

कर्म-बन्ध ढीले हो जाये,
तब ही प्रभु हम शरण में आये।
सच्चे हृदय से भक्ति करेंगे,
मन से प्रभुजी जाप करेंगे।।

पापकर्म से दूर हटेंगे,
क्रोध मान से दूर रहेंगे।
भक्ति का पथ हमको प्यारा,
क्षणभंगुर सुख इससे हारा।।

ज्ञान किरण हमको दिखला दो,
मुक्ति का रस्ता बतला दो।
ज्ञानामृत का भोजन पाऊँ,
और अमर इससे हो जाऊँ।।

श्री सम्मेद शिखर मन भाया,
वहाँ से मुक्ति को पडराया।
बार- बार मैं अरज करूँगा,
चरण आपके सदा रहूँगा।।

दोहा:-
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि- सिद्धि मंगल करें, होवें भव से पार।।
श्री 'अर' प्रभु के चरण में, वन्दन शत-शत बार।
सबकी विपदायें हरो, विनती बारम्बार।।

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श्री अनन्तनाथ चालीसा | सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व एवं लाभ (Anantanath Chalisa)

।। श्री अनन्तनाथ चालीसा ।। 
भक्ति, वैराग्य और मोक्ष की अमर गाथा
"अनन्त चतुष्टय धारी 'अनन्त', अनन्त गुणों की खान 'अनन्त'"
जैन धर्म के चौदहवें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ — यह नाम सुनते ही मन में एक असीम शांति की अनुभूति होती है। "अनन्त" शब्द का अर्थ ही है — जिसका कोई अंत नहीं। और सच में भगवान अनन्तनाथ के गुण, उनका ज्ञान और उनकी महिमा वास्तव में अनन्त है। श्री अनन्तनाथ चालीसा उनके उसी अनन्त जीवन की झलक हमें दिखाती है — जन्म से लेकर मोक्ष तक की पूरी यात्रा, जो हर भक्त के हृदय को छू जाती है।
🌸 अयोध्या की पावन धरती पर हुआ अवतरण
भगवान अनन्तनाथ का जन्म उसी अयोध्या नगरी में हुआ जो सदियों से पवित्रता और धर्म की प्रतीक रही है। उनके पिता राजा सिंहसेन एक महान और न्यायप्रिय शासक थे, और उनकी माता का नाम सर्वयशा था — जिन्हें जिनवर की जननी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
ज्येष्ठ मास की कृष्ण द्वादशी को जब इस धरती पर एक तीर्थंकर ने जन्म लिया, तो स्वयं इंद्र ने प्रभु को गोद में लेकर मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक किया। देवलोक में उत्सव हुआ, दिव्य ध्वनियाँ गूँजीं और "अनन्तनाथ" नाम से इस महान आत्मा को पुकारा गया।
यह नाम कोई साधारण नाम नहीं था — यह उनके गुणों का ही प्रतिबिंब था। उनके ज्ञान के सागर का पार पाना संभव ही नहीं था।
✨ दिव्य रूप और ज्ञान का वैभव
भगवान अनन्तनाथ का वर्ण सोने के समान था — दमकता हुआ, तेजस्वी और अलौकिक। वे मति, श्रुत और अवधि — इन तीनों ज्ञानों के स्वाभाविक धारक थे।
उनकी आयु तीस लाख वर्ष की थी और उनके शरीर की ऊंचाई पचास धनुष थी। इन आंकड़ों को पढ़कर मन में एक भव्य और विशाल छवि उभरती है — जो यह बताती है कि तीर्थंकर कोई साधारण मनुष्य नहीं होते, वे संसार की सबसे उन्नत आत्माएँ होती हैं जो अनंत काल की साधना के बाद इस पद को प्राप्त करती हैं।
🌿 सांसारिक जीवन — और फिर वैराग्य का पल
बचपन बीता, यौवन आया। राज्य मिला, विवाह हुआ और जीवन सुखमय था। पंद्रह लाख वर्षों तक उन्होंने गृहस्थ जीवन जिया। किंतु एक दिन आकाश में उल्कापात हुआ — और उस एक घटना ने सब कुछ बदल दिया।
उल्कापात देखकर भगवान अनन्तनाथ के मन में संसार की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। यह संसार कितना अनिश्चित है! यह सुख कितना अस्थायी है! उनके मन से राग, मोह और आसक्ति के भाव छूटने लगे। उन्होंने बारह भावनाओं का चिंतन किया और वैराग्य की अग्नि और प्रज्ज्वलित हो गई।
यह वह मोड़ था जब एक राजा, एक सम्राट — तीर्थंकर बनने की दिशा में अपना पहला कदम उठाता है।
🔱 दीक्षा — राजमहल से वन की ओर
अपने पुत्र "अनन्तविजय" को राजतिलक कराकर भगवान ने संसार की समस्त जिम्मेदारियों को विधिपूर्वक सौंप दिया। देवों ने दिव्य शिविका (पालकी) सजाई और भगवान अनन्तनाथ सहेतुक वन की ओर प्रस्थान कर गए। उनके साथ हजारों राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की।
ज्येष्ठ मास की कृष्ण द्वादशी को उन्होंने तीन दिन के उपवास के साथ दिगम्बर दीक्षा ली। इसके पश्चात् वे अयोध्या पहुँचे और "विशाख" नामक श्रावक ने उन्हें प्रथम आहार दान दिया — जिससे विशाख को अपार पुण्य की प्राप्ति हुई।
राजमहल की चमक-दमक छोड़कर जंगल की सादगी अपनाना — यही तो तीर्थंकर का असली परिचय है।
🌳 पीपल वृक्ष के नीचे — केवलज्ञान का उदय
दीक्षा के पश्चात् भगवान अनन्तनाथ मौन धारण करके वनों में विचरण करते रहे। एक दिन वे एक पीपल वृक्ष के नीचे आत्म-ध्यान में स्थिर हो गए। उनका ध्यान अटल था, मन निर्विकार था और आत्मा समस्त बाहरी विकारों से परे थी।
चैत्र मास की कृष्ण अमावस्या को उनके सभी घाती कर्म नष्ट हो गए और केवलज्ञान का उदय हुआ — लोक और अलोक का संपूर्ण ज्ञान उनकी आत्मा में एक साथ प्रकाशित हो उठा।
तत्काल दिव्य समवसरण की रचना हुई। देवता, मनुष्य और पशु — सभी उनके उपदेश सुनने के लिए आए। उनकी वाणी जब प्रकट हुई, तो वह कानों को अमृत के समान लगी।
📿 जिनवाणी — मुक्ति का सीधा मार्ग
भगवान अनन्तनाथ की वाणी में संसार का सच था। उन्होंने चारों गतियों (नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव) के दुखों का चित्रण किया। जो भी भव्य जीव उनकी वाणी सुनते, वे पापों से भयभीत होकर सत्मार्ग की ओर मुड़ जाते।
उनका संदेश अत्यंत स्पष्ट और सीधा था —
"जो चाहो तुम मुक्ति पाना, निज आतम की शरण में जाना।"
यह एक वाक्य पूरे जैन दर्शन का सार है। मुक्ति बाहर नहीं है, किसी देवता की कृपा में नहीं है — मुक्ति तो अपनी ही आत्मा की शरण में जाने से मिलती है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र — ये तीन रत्न ही मोक्ष का मार्ग हैं। व्यवहार में रत्नत्रय और निश्चय में शुद्धात्मा का ध्यान — यही शिवपद (मोक्ष) का द्वार है।
उनकी वाणी सुनकर अनेक भव्यजनों ने यथाशक्ति व्रत धारण किए और अपने जीवन को धर्मपथ पर मोड़ लिया।
🏔️ सम्मेद शिखर — अंतिम यात्रा और मोक्ष
विहार करते हुए उन्होंने देश-देश में सत्पथ का प्रकाश फैलाया। अनगिनत आत्माओं को सन्मार्ग दिखाया। और जब अंतिम समय आया, तो भगवान अनन्तनाथ सम्मेद शिखर की पावन भूमि पर पहुँचे।
एक माह तक वे वहाँ पूर्णतः निश्चल रहे — योगनिरोध की अवस्था में। शरीर, मन और वचन की समस्त क्रियाएँ रुक गईं। चैत्र मास की कृष्ण अमावस्या को समस्त अघाती कर्म भी नष्ट हो गए और भगवान अनन्तनाथ ने मोक्षमहल में प्रवेश किया।
देवगण आए, उत्सव मनाया और "कूट स्वयंप्रभ" पर उनका स्मरण करते हुए नमन किया। अनन्त भवों की यात्रा का अंत हो गया था — और एक परम आत्मा अनन्त आनंद में विलीन हो गई।
🙏 चालीसा पाठ — भक्त का निवेदन
इस चालीसा में भक्त "अरुणा" की एक सरल और मार्मिक अरज है —
"अरुणा अरज करे बस ये ही, पार करो भवसागर से ही।"
यही तो हर भक्त की पुकार है। संसार के इस भवसागर में हम सब डूब रहे हैं — कभी सुख में, कभी दुख में, कभी मोह में, कभी भय में। और प्रभु अनन्तनाथ के चरणों में आकर यही विनती है कि हे प्रभु! इस भवसागर से पार करो।
उनका लांछन (चिह्न) "सेही" (साही/सेहा) है जो उनके पद में सुशोभित होता है।
🌟 निष्कर्ष — अनन्त का अनन्त संदेश
भगवान अनन्तनाथ का जीवन हमें तीन बड़े सबक देता है।
पहला — संसार की कोई भी उपलब्धि, चाहे वह राजपाट हो या वैभव, स्थायी नहीं है। एक उल्कापात ने एक सम्राट को वैरागी बना दिया।
दूसरा — मुक्ति का मार्ग बाहर नहीं, भीतर है। अपनी आत्मा को पहचानो, उसकी शरण लो — यही सच्चा धर्म है।
तीसरा — भक्ति निर्लोभ होनी चाहिए। जो भक्त प्रभु से केवल भवसागर से पार होने की विनती करता है, वही सच्चा भक्त है।
श्री अनन्तनाथ चालीसा का नित्य पाठ करने वाले भक्त के जीवन में धीरे-धीरे वैराग्य, विवेक और आत्मशांति का उदय होता है। संसार के दुख हल्के लगने लगते हैं और मुक्ति का मार्ग स्पष्ट होने लगता है।
"हुआ अनन्त भवों का अन्त, अद्भुत तुम महिमा है 'अनन्त'।

आइये हम भी प्रभु के गुणों से युक्त भगवान अनन्तनाथ जी चालीसा का पाठ करके पुण्य एकत्रित करते है और अपने पापों की निर्जरा करते है-

।। श्री अनन्तनाथ चालीसा।।

अनन्त चतुष्टय धारी ‘अनन्त, अनन्त गुणों की खान “अनन्त’ ।
सर्वशुद्ध ज्ञायक हैं अनन्त, हरण करें मम दोष अनन्त ।
नगर अयोध्या महा सुखकार, राज्य करें सिहंसेन अपार ।
सर्वयशा महादेवी उनकी, जननी कहलाई जिनवर की ।
द्वादशी ज्येष्ठ कृष्ण सुखकारी, जन्मे तीर्थंकर हितकारी ।
इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, न्हवन करें मेरु पर जाकर ।
नाम “अनन्तनाथ’ शुभ दीना, उत्सव करते नित्य नवीना ।
सार्थक हुआ नाम प्रभुवर का, पार नहीं गुण के सागर का ।
वर्ण सुवर्ण समान प्रभु का, ज्ञान धरें मति- श्रुत- अवधि का ।
आयु तीस लख वर्ष उपाई, धनुष अर्धशत तन ऊंचाई ।
बचपन गया जवानी आई, राज्य मिला उनको सुखदाई ।
हुआ विवाह उनका मंगलमय, जीवन था जिनवर का सुखमय ।
पन्द्रह लाख बरस बीते जब, उल्कापात से हुए विरक्त तब ।
जग में सुख पाया किसने-कब, मन से त्याग राग भाव सब ।
बारह भावना मन में भाये, ब्रह्मर्षि वैराग्य बढाये ।
“अनन्तविजय” सुत तिलक-कराकर, देवोमई शिविका पधरा कर ।
गए सहेतुक वन जिनराज, दीक्षित हुए सहस नृप साथ ।
द्वादशी कृष्ण ज्येष्ठ शुभ मास, तीन दिन का धारा उपवास ।
गए अयोध्या प्रथम योग कर, धन्य ‘विशाख’ आहार करा कर ।
मौन सहित रहते थे वन में, एक दिन तिष्ठे पीपल- तल में ।
अटल रहे निज योग ध्यान में, झलके लोकालोक ज्ञान में ।
कृष्ण अमावस चैत्र मास की, रचना हुई शुभ समवशरण की ।
जिनवर की वाणी जब खिरती, अमृत रस कानों को लगती ।
चतुर्गति दुख चित्रण करते, भविजन सुन पापों से डरते ।
जो चाहो तुम मुक्ति पाना, निज आतम की शरण में जाना ।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित है, कहे व्यवहार मेँ रतनत्रय हैं ।
निश्चय से शुद्धातम ध्याकर, शिवपद मिलता सुख रत्नाकर ।
श्रद्धा करके भव्य जनों ने, यथाशक्ति व्रत धारे सबने ।
हुआ विहार देश और प्रान्त, सत्पथ दर्शाये जिननाथ ।
अन्त समय गए सम्मेदाचल, एक मास तक रहे सुनिश्चल ।
कृष्ण चैत्र अमावस पावन, मोक्षमहल पहुंचे मनभावन ।
उत्सव करते सुरगण आकर, कूट स्वयंप्रभ मन में ध्याकर ।
शुभ लक्षण प्रभुवर का ‘सेही’, शोभित होता प्रभु- पद में ही ।
अरुणा अरज करे बस ये ही, पार करो भवसागर से ही ।
है प्रभु लोकालोक अनन्त, झलकें सब तुम ज्ञान अनन्त ।
हुआ अनन्त भवों का अन्त, अद्भुत तुम महिमा है “अनन्त’ ।

इस लेख में हमने भगवान अनन्तनाथ के गुण और चरित्र के बारे में जाना एवं हमने उनकी चालीसा का भी पाठ किया। भगवान अनन्तनाथ नाम से ही नही बल्कि कृपा से भी अनन्त है। जो भी उनकी चालीसा का सच्चे मन से पाठ करता है वह भोग और मोक्ष दोनो को प्राप्त करता है। आशा है आपको यह हमारा पोस्ट पसन्द आया होगा। ऐसे ही हमारे ब्लॉग को पढ़ते रहे जय जिनेन्द्र🙏🙏

जैन सामायिक पाठ (32 पद) | सम्पूर्ण पाठ, महत्व, शिक्षाएँ एवं आध्यात्मिक लाभ

परिचय-
जैन धर्म में सामायिक आत्मशुद्धि, समता और आत्मचिंतन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधना है। "सामायिक" शब्द का अर्थ है समभाव में स्थित होना अर्थात् राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों से दूर होकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का प्रयास करना। सामायिक के माध्यम से साधक सभी जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और क्षमा का भाव विकसित करता है तथा अपने द्वारा हुए दोषों का आत्मनिरीक्षण करता है।
प्रस्तुत सामायिक पाठ जैन परंपरा का अत्यंत लोकप्रिय और प्रेरणादायक पाठ है। इसके पदों में जीवदया, समता, आत्मज्ञान, वैराग्य, कर्म सिद्धांत, प्रायश्चित तथा मोक्षमार्ग का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। इस पाठ का नियमित अध्ययन और मनन मन को शांति प्रदान करता है तथा साधक को आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। सामायिक केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाने वाली आध्यात्मिक साधना है।

सामायिक पाठ का महत्व-
सामायिक जैन साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को सांसारिक आसक्ति, राग-द्वेष और मानसिक अशांति से ऊपर उठाकर समता की अवस्था तक पहुँचाना है। सामायिक के समय साधक सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखता है तथा अपने दोषों और भूलों का आत्मचिंतन करता है।
जैन दर्शन के अनुसार आत्मा स्वभाव से शुद्ध, ज्ञानमय और अनन्त शक्तियों से सम्पन्न है, किन्तु कर्मों के बंधन के कारण उसका वास्तविक स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता। सामायिक का अभ्यास आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाने का एक प्रभावी माध्यम माना गया है। यह पाठ साधक को संयम, विवेक, आत्मानुशासन और आध्यात्मिक जागृति की प्रेरणा प्रदान करता है।

 ।।सामयिक पाठ।।
प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणीजनोंमें हर्ष प्रभो।
करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥ 1॥
यह अनन्त बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो।
ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनन्त बल दो मुझको॥ 2॥
सुख दुख बैरी बन्धु वर्ग में, काँच कनक में समता हो।
वन उपवन प्रासाद कुटी में नहीं खेद, नहिं ममता हो॥ 3॥
जिस सुन्दर तम पथ पर चलकर, जीते मोह मान मन्मथ।
वह सुन्दर पथ ही प्रभु मेरा, बना रहे अनुशीलन पथ॥ 4॥
एकेन्द्रिय आदिक जीवों की यदि मैंने हिंसा की हो।
शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह,निष्फल हो दुष्कृत्य विभो॥ 5॥
मोक्षमार्ग प्रतिकूल प्रवर्तन जो कुछ किया कषायों से।
विपथ गमन सब कालुष मेरे, मिट जावें सद्भावों से॥ 6॥
चतुर वैद्य विष विक्षत करता, त्यों प्रभु मैं भी आदि उपान्त।
अपनी निन्दा आलोचन से करता हूँ पापों को शान्त॥ 7॥
सत्य अहिंसादिक व्रत में भी मैंने हृदय मलीन किया।
व्रत विपरीत प्रवर्तन करके शीलाचरण विलीन किया॥ 8॥
कभी वासना की सरिता का, गहन सलिल मुझ पर छाया।
पी पीकर विषयों की मदिरा मुझ में पागलपन आया॥ 9॥
मैंने छली और मायावी, हो असत्य आचरण किया।
परनिन्दा गाली चुगली जो मुँह पर आया वमन किया॥ 10॥
निरभिमान उज्ज्वल मानस हो, सदा सत्य का ध्यान रहे।
निर्मल जल की सरिता सदृश, हिय में निर्मल ज्ञान बहे॥ 11॥
मुनि चक्री शक्री के हिय में, जिस अनन्त का ध्यान रहे।
गाते वेद पुराण जिसे वह, परम देव मम हृदय रहे॥12॥
दर्शन ज्ञान स्वभावी जिसने, सब विकार हों वमन किये।
परम ध्यान गोचर परमातम, परम देव मम हृदय रहे॥13॥
जो भव दुख का विध्वंसक है, विश्व विलोकी जिसका ज्ञान।
योगी जन के ध्यान गम्य वह, बसे हृदय में देव महान्॥ 14॥
मुक्ति मार्ग का दिग्दर्शक है, जनम मरण से परम अतीत।
निष्कलंक त्रैलोक्य दर्शी वह देव रहे मम हृदय समीप॥ 15॥
निखिल विश्व के वशीकरण वे, राग रहे न द्वेष रहे।
शुद्ध अतीन्द्रिय ज्ञान स्वभावी, परम देव मम हृदय रहे॥ 16॥
देख रहा जो निखिल विश्व को कर्म कलंक विहीन विचित्र।
स्वच्छ विनिर्मल निर्विकार वह देव करें मम हृदय पवित्र॥ 17॥
कर्म कलंक अछूत न जिसको कभी छू सके दिव्य प्रकाश।
मोह तिमिर को भेद चला जो परम शरण मुझको वह आप्त॥ 18॥
जिसकी दिव्य ज्योति के आगे, फीका पड़ता सूर्य प्रकाश।
स्वयं ज्ञानमय स्व पर प्रकाशी, परम शरण मुझको वह आप्त॥ 19॥
जिसके ज्ञान रूप दर्पण में, स्पष्ट झलकते सभी पदार्थ।
आदि अन्तसे रहित शान्तशिव, परम शरण मुझको वह आप्त॥
जैसे अग्नि जलाती तरु को, तैसे नष्ट हुए स्वयमेव।
भय विषाद चिन्ता नहीं जिनको, परम शरण मुझको वह देव॥
तृण, चौकी, शिल, शैलशिखर नहीं, आत्म समाधि के आसन।
संस्तर, पूजा, संघ-सम्मिलन, नहीं समाधि के साधन॥ 22॥
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, विश्व मनाता है मातम।
हेय सभी हैं विषय वासना, उपादेय निर्मल आतम॥ 23॥
बाह्य जगत कुछ भी नहीं मेरा, और न बाह्य जगत का मैं।
यह निश्चय कर छोड़ बाह्य को, मुक्ति हेतु नित स्वस्थ रमें॥
अपनी निधि तो अपने में है, बाह्य वस्तु में व्यर्थ प्रयास।
जग का सुख तो मृग तृष्णा है, झूठे हैं उसके पुरुषार्थ॥ 25॥
अक्षय है शाश्वत है आत्मा, निर्मल ज्ञान स्वभावी है।
जो कुछ बाहर है, सब पर है, कर्माधीन विनाशी है॥ 26॥
तन से जिसका ऐक्य नहीं हो, सुत, तिय, मित्रों से कैसे।
चर्म दूर होने पर तन से, रोम समूह रहे कैसे॥ 27॥
महा कष्ट पाता जो करता, पर पदार्थ, जड़-देह संयोग।
मोक्षमहल का पथ है सीधा, जड़-चेतन का पूर्ण वियोग॥ 28॥
जो संसार पतन के कारण, उन विकल्प जालों को छोड़।
निर्विकल्प निद्र्वन्द्व आत्मा, फिर-फिर लीन उसी में हो॥ 29॥
स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ, फल निश्चय ही वे देते।
करे आप, फल देय अन्य तो स्वयं किये निष्फल होते॥ 30॥
अपने कर्म सिवाय जीव को, कोई न फल देता कुछ भी।
पर देता है’ यह विचार तज स्थिर हो, छोड़ प्रमादी बुद्धि॥ 31॥
निर्मल, सत्य, शिवं सुन्दर है, ‘अमितगति’ वह देव महान।
शाश्वत निज में अनुभव करते, पाते निर्मल पद निर्वाण॥ 32॥
दोहा
इन बत्तीस पदों से जो कोई, परमातम को ध्याते हैं।
साँची सामायिक को पाकर, भवोदधि तर जाते हैं॥

सामायिक पाठ की शिक्षाएँ-
सामायिक पाठ हमें सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि किसी भी जीव के प्रति द्वेष, हिंसा या घृणा का भाव आत्मकल्याण में बाधक है। पाठ में समता का विशेष महत्व बताया गया है, जिसके अनुसार सुख-दुःख, लाभ-हानि, मित्र-शत्रु तथा मान-अपमान जैसी परिस्थितियों में समान भाव रखना चाहिए।
यह पाठ आत्मा और शरीर के भेद का ज्ञान कराता है तथा बताता है कि आत्मा शाश्वत, चेतन और ज्ञानस्वरूप है जबकि शरीर नश्वर और परिवर्तनशील है। सामायिक पाठ आत्मचिंतन, प्रायश्चित और आत्मसुधार की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। इसमें कर्म सिद्धांत का सुंदर वर्णन मिलता है और यह समझाया गया है कि प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है।
पाठ में वैराग्य, संयम और मोक्षमार्ग की प्रेरणा भी निहित है। यह साधक को बाहरी विषयों और मोह-माया से हटाकर आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होने का संदेश देता है।

सामायिक पाठ के लाभ-
सामायिक पाठ का नियमित अध्ययन और मनन मन को शांति प्रदान करता है। इससे क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाओं में कमी आती है तथा मैत्री, करुणा और क्षमा जैसे श्रेष्ठ गुणों का विकास होता है।
यह पाठ आत्मचिंतन की आदत विकसित करता है और व्यक्ति को अपनी भूलों को पहचानने तथा उन्हें सुधारने की प्रेरणा देता है। सामायिक का अभ्यास मानसिक संतुलन बढ़ाता है और जीवन में समता की भावना को मजबूत करता है। धार्मिक दृष्टि से यह आत्मशुद्धि, पुण्य संचय और आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
सामायिक पाठ के माध्यम से साधक धीरे-धीरे आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने लगता है और मोक्षमार्ग के प्रति उसकी श्रद्धा और दृढ़ होती जाती है।

निष्कर्ष-
सामायिक पाठ जैन धर्म की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर है। इसके प्रत्येक पद में आत्मकल्याण, समता, करुणा, संयम और मोक्षमार्ग का गहन संदेश निहित है। यह पाठ केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि जीवन को धर्ममय, शांत और संतुलित बनाने की प्रेरणा प्रदान करता है। जो साधक श्रद्धा, भक्ति और एकाग्रता के साथ सामायिक पाठ का अध्ययन तथा मनन करता है, वह आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में निरंतर आगे बढ़ सकता है।

FAQ-
सामायिक क्या है?
सामायिक जैन धर्म की एक महत्वपूर्ण साधना है जिसका उद्देश्य समता भाव में स्थित होकर आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि करना है।
सामायिक पाठ में मुख्य रूप से क्या वर्णित है?
सामायिक पाठ में मैत्री, करुणा, समता, आत्मज्ञान, प्रायश्चित, कर्म सिद्धांत और मोक्षमार्ग का वर्णन मिलता है।
सामायिक पाठ का नियमित अध्ययन क्यों करना चाहिए?
नियमित अध्ययन से मन की शांति, आत्मचिंतन, समता भाव और आध्यात्मिक जागृति का विकास होता है।
क्या सामायिक केवल जैन साधकों के लिए ही उपयोगी है?
यद्यपि यह जैन परंपरा का पाठ है, किन्तु इसमें वर्णित समता, करुणा, क्षमा और आत्मचिंतन के सिद्धांत सभी के लिए प्रेरणादायक हैं।
सामायिक का मुख्य उद्देश्य क्या है?
सामायिक का मुख्य उद्देश्य राग-द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर होना और मोक्षमार्ग की साधना करना है।

स्रोत-
सामायिक पाठ को कई ग्रन्थों से लिया गया हैं जैसे भावना द्वात्रिंशतका, भगवती आराधना, रत्नकरण्डक श्रावकाचार आदि। जिनमें आचार्य अमितगति जी का सामायिक पद्यानुवाद अत्यंत प्रचलित हैं।

महत्वपूर्ण बिंदु-
सामायिक पाठ क्यों किया जाता है सामायिक पाठ से कर्मों की निर्जरा होती हैं। आत्मा की विशुद्धि हेतु इस पाठ को प्रतिदिन किया जाता हैं। जैन श्रावक प्रतिदिन तीनों पहर इस पाठ को करते है।

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