गोम्मटेश भजन: भगवान बाहुबली और आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की महिमा
दर्शकों इस लेख में हम भगवान बाहुबली के वीतरागी स्वरूप का चिंतन करेंगे एवं समाधिस्थ आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी द्वारा रचित इस भजन का पाठन करेंगे। इस भजन के पाठ से भगवान बाहुबली जी के चरित्र एवं आचार्य श्री के गुणों का वर्णन स्वयं ही एकरूप प्रदर्शित होता है। कैसे भगवान बाहुबली प्रथम मोक्षगामी हुए और कैसे आचार्य श्री कलयुग के भगवान बने।
"हे सर्वत्यागी, हे वीतरागी, हे गोम्मटेशं तुभ्यं नमोस्तु।"
भूमिका-
भारत की आध्यात्मिक परंपरा में जैन धर्म का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। इस परंपरा में भगवान बाहुबली — जिन्हें गोम्मटेश्वर के नाम से भी जाना जाता है — का व्यक्तित्व अद्वितीय है। वे केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि त्याग, वैराग्य और आत्मजय का जीवंत प्रतीक हैं। और इस महान परंपरा को आधुनिक युग में जीवंत करने वाले संत थे — समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, जिनका जीवन स्वयं एक भजन था।
भगवान बाहुबली: गोम्मटेश्वर की अमर गाथा
भगवान बाहुबली आदिनाथ (ऋषभदेव) के पुत्र थे। जब उनके पिता ने सांसारिक राज्य त्यागकर दीक्षा ली, तब राज्य का विभाजन पुत्रों में हुआ। बाहुबली को पोदनपुर का राज्य मिला। परंतु उनके भ्राता भरत चक्रवर्ती बनने की महत्त्वाकांक्षा में सब राजाओं को अपने अधीन करना चाहते थे। जब बाहुबली ने भरत की अधीनता स्वीकार करने से इनकार किया, तो द्वंद्वयुद्ध की घोषणा हुई।
युद्ध के तीनों चरणों — दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध और मल्लयुद्ध — में बाहुबली विजयी हुए। जब वे भरत को भूमि पर पटकने ही वाले थे, तब उनके मन में एक विचार कौंधा — "यह राज्य किसके लिए? यह विजय किसलिए? क्या मैं अपने ही भ्राता का वध करूँगा?"
उसी क्षण बाहुबली के भीतर वैराग्य जाग उठा। उन्होंने भरत को छोड़ दिया, राज्य का त्याग किया और वन में चले गए। वहाँ उन्होंने कायोत्सर्ग की मुद्रा में — एकदम निश्चल, पैरों में लिपटी लताओं और शरीर पर बैठे पक्षियों के साथ — वर्षों तक ध्यान किया। उनके ध्यान की गहराई इतनी थी कि प्रकृति उनके चारों ओर सिमट आई।
भजन में इसी महिमा का गुणगान है —
"हे विंध्यवासी घट घट प्रवासी, न रागिद्वेषम तुभ्यं नमोस्तु।"
वे विंध्य के वासी हैं — पर्वत पर विराजते हैं। वे घट-घट में प्रवास करते हैं — हर आत्मा में हैं। और उनमें न राग है, न द्वेष — वे पूर्णतः वीतरागी हैं।
श्रवणबेलगोला: पाषाण में प्रकट परमात्मा-
कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में विंध्यगिरि (इंद्रगिरि) पर्वत पर स्थित भगवान गोम्मटेश्वर की प्रतिमा विश्व की सबसे ऊँची मुक्तकाशी प्रतिमाओं में से एक है। 57 फुट ऊँची यह एकाश्म प्रतिमा लगभग 1000 वर्ष पुरानी है। इसका निर्माण गंग वंश के सेनापति चामुण्डराय ने करवाया था, जिनका उल्लेख भजन में बड़े श्रद्धाभाव से किया गया है —
"हे मात कालल के वीर बालक, चामुंडरायं तुभ्यं नमोस्तु।"
इस प्रतिमा के निर्माण में आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांत चक्रवर्ती और जिनचंद्रस्वामी का महत्त्वपूर्ण योगदान था। भजन में उनकी वंदना इस प्रकार है —
"हे नेमिचन्द्रम जिन चन्द्रस्वामी, हे विंध्य गिरिवर तुभ्यं नमोस्तु।"
प्रतिमा के नीलवर्णी कमल जैसे नयन, धनुषाकार भौंहें, शांत दृष्टि, दिव्य ग्रीवा, मौनधारी अधर — ये सब ध्यानयोगी की उस अवस्था को दर्शाते हैं जहाँ शरीर स्थिर है और आत्मा उड़ान पर है। भजन में इन्हीं दिव्य लक्षणों का भावपूर्ण वर्णन है —
"हे नीलकमलं हे वर्णविमलं... हे धनुषभृकुटि हे शान्तनयनं... हे मौनअधरं हे लम्बकर्णम्।"
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज: युग के महाध्यानी
यदि भगवान बाहुबली पाषाण में परमात्मा का रूप हैं, तो आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज आधुनिक युग में उसी वैराग्य के जीवंत अवतार थे।
10 अक्टूबर 1946 को जन्मे विद्यासागर जी ने मात्र 22 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की और दिगंबर जैन साधु के कठोरतम व्रतों को जीवन भर निभाया। वे नग्न रहते थे, पैरों में चप्पल नहीं, बर्तन में भोजन नहीं — केवल हाथ की अंजुलि में। उनका जीवन स्वयं कायोत्सर्ग था।
उन्होंने हजारों किलोमीटर पैदल विहार किया। उनके प्रवचनों में वेदांत, न्याय, व्याकरण, काव्य — सब समाहित थे। उनकी हिंदी काव्य रचना "मूकमाटी" हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जाती है।
17 फरवरी 2024 को उन्होंने संथारा (संलेखना) द्वारा — अर्थात् भोजन-जल का स्वैच्छिक त्याग करके — देह त्यागी। यह जैन परंपरा की सर्वोच्च साधना है, जिसमें साधक पूर्ण जागरूकता और समता के साथ मृत्यु को वरण करता है। जैसे बाहुबली ने शरीर की परवाह किए बिना ध्यान में खड़े रहे, वैसे ही विद्यासागर जी ने देह को साक्षी भाव से विसर्जित किया।
वे समाधिस्थ गए — न भय, न आसक्ति, न पीड़ा — केवल शांति।
भजन का आध्यात्मिक संदेश
यह भजन केवल स्तुति नहीं है — यह एक साधना है। जब हम गाते हैं "हे सर्वत्यागी, हे वीतरागी" — तो हम केवल बाहुबली को नहीं, उस आदर्श को नमन करते हैं जो हर आत्मा में संभव है।
"हे प्रतिमा योगी हे कामदेवं, हे पुण्यशाली तुभ्यं नमोस्तु।"
गोम्मटेश्वर की प्रतिमा योगी है — वे स्वयं साक्षात् तपस्वी हैं। वे कामदेव भी हैं — अर्थात् जो काम (इच्छाओं) को जीत चुके। यह विरोधाभास नहीं, यह सत्य है — जो सब इच्छाओं से मुक्त हो जाए, वही सच्चा सुंदर है, वही सच्चा सुखी है।
"हे निर्विकारी वैराग्यधारी, मुद्रा तुम्हारी तुभ्यं नमोस्तु।"
उनकी मुद्रा ही उनका संदेश है — निश्चल, निर्भय, निर्विकार।
उपसंहार
भगवान बाहुबली और आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज — दोनों एक ही सत्य के दो रूप हैं। एक पाषाण में, एक जीवन में — दोनों ने यह सिद्ध किया कि जब मनुष्य राग-द्वेष से ऊपर उठता है, तो वह देव हो जाता है।
यह भजन उसी देवत्व का आह्वान है। जब भी हम "जय जय जय जय गोम्मटेशं" पुकारते हैं — तो हम अपने भीतर के उस निर्मल, शांत, वीतराग आत्मस्वरूप को जगाते हैं।
तुभ्यं नमोस्तु। — हे भगवान, आपको नमस्कार।
।।गोम्मटेश भजन।।
हे सर्वत्यागी, हे वीतरागी,
हे गोम्मटेशं तुभ्यं नमोस्तु।
हे आदिपुत्रं हे ज्ञानवृत्तम
हे जगहितेशं तुभ्यं नमोस्तु।
हे नीलकमलं हे वर्णविमलं
हे श्यामकेशं तुभ्यं नमोस्तु।
हे धनुषभृकुटि हे शान्तनयनं
हे दृष्टि नासा तुभ्यं नमोस्तु।
हे मौनअधरं हे लम्बकर्णम्
हे दिव्य ग्रीवा तुभ्यं नमोस्तु।
हे विंध्यवासी घट घट प्रवासी
न रागिद्वेषम तुभ्यं नमोस्तु।
हे मात कालल के वीर बालक
चामुंडरायं तुभ्यं नमोस्तु।
हे नेमिचन्द्रम जिन चन्द्रस्वामी
हे विंध्य गिरिवर तुभ्यं नमोस्तु।
हे प्रतिमा योगी हे कामदेवं
हे पुण्यशाली तुभ्यं नमोस्तु।
हे निर्विकारी वैराग्यधारी
मुद्रा तुम्हारी तुभ्यं नमोस्तु।
हे नाथ नारायण वासुदेवं
हे सर्वपूज्यम तुभ्यं नमोस्तु।
हे विंध्य गिरी पर प्रतिमा तुम्हारी
अप लख निहारी तुभ्यं नमोस्तु।
जय जय जय जय गोम्मटेशं......
हे सर्वत्यागी, हे वीतरागी,
हे गोम्मटेशं तुभ्यं नमोस्तु।
हे आदिपुत्रं हे ज्ञानवृत्तम
हे जगहितेशं तुभ्यं नमोस्तु।
हे नीलकमलं हे वर्णविमलं
हे श्यामकेशं तुभ्यं नमोस्तु।
हे धनुषभृकुटि हे शान्तनयनं
हे दृष्टि नासा तुभ्यं नमोस्तु।
हे मौनअधरं हे लम्बकर्णम्
हे दिव्य ग्रीवा तुभ्यं नमोस्तु।
हे विंध्यवासी घट घट प्रवासी
न रागिद्वेषम तुभ्यं नमोस्तु।
हे मात कालल के वीर बालक
चामुंडरायं तुभ्यं नमोस्तु।
हे नेमिचन्द्रम जिन चन्द्रस्वामी
हे विंध्य गिरिवर तुभ्यं नमोस्तु।
हे प्रतिमा योगी हे कामदेवं
हे पुण्यशाली तुभ्यं नमोस्तु।
हे निर्विकारी वैराग्यधारी
मुद्रा तुम्हारी तुभ्यं नमोस्तु।
हे नाथ नारायण वासुदेवं
हे सर्वपूज्यम तुभ्यं नमोस्तु।
हे विंध्य गिरी पर प्रतिमा तुम्हारी
अप लख निहारी तुभ्यं नमोस्तु।
जय जय जय जय गोम्मटेशं......