।।श्री सम्भवनाथ चालीसा ।। — कैसे असंभव को सम्भव कर दिया भगवान सम्भवनाथ जी ने।
कभी-कभी सबसे बड़ा जागरण... सबसे छोटी घटना से होता है।
महल की छत। शाम की हवा। दूर तक फैला वन। और आकाश में एक बादल — जिस पर बर्फ का एक टुकड़ा टिका था। अचानक तेज़ हवा चली... और वह बर्फ का टुकड़ा हवा में उड़कर... मिट गया।
बस।
एक राजा जो चवालिस लाख पूर्व से राज कर रहा था — वह उस एक पल में बदल गया।
यह कहानी है जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान सम्भवनाथ की।
🌸 श्रावस्ती — वह नगरी जो धन्य हो गई
जैनागम के अनुसार भगवान सम्भवनाथ का जन्म श्रावस्ती नगरी में हुआ — वही नगरी जो इतनी सुंदर थी कि देवताओं के मन को भी मोह लेती थी।
उनके पिता का नाम राजा दृढ़राज और माता का नाम सुषेणा था। फाल्गुन शुक्ला अष्टमी को गर्भ कल्याणक हुआ और कार्तिक पूर्णिमा को इस धरती पर एक तीर्थंकर ने जन्म लिया।
चालीसा में इस दिव्य क्षण का वर्णन है —
"तीन लोक में खुशियाँ छाई। शची प्रभु को लेने आई।
मेरू पर अभिषेक कराया। सम्भव प्रभु शुभ नाम धराया।।"
इंद्र की पत्नी शची स्वयं आईं। मेरु पर्वत पर अभिषेक हुआ। तीनों लोकों में उत्सव मना। और इस महान आत्मा को नाम मिला — सम्भव — अर्थात् जो असम्भव को सम्भव कर दे।
यह नाम सार्थक था। क्योंकि मोक्ष — जो इस संसार में सबसे कठिन और असम्भव लगता है — उसे सम्भव करने का मार्ग उन्होंने दिखाया।
उनके चरण में अश्व (घोड़े) का शुभ लक्षण था। उनकी आयु साठ लाख पूर्व की थी।
👑 राज्य, वैभव और... एक खालीपन
बचपन बीता। यौवन आया। पिता ने राज्याभिषेक किया। सुंदर रानियाँ मिलीं। राज्य का सुख भोगा — पूरे चवालिस लाख पूर्व तक।
यह संख्या हमारी कल्पना से परे है। लेकिन जैन दर्शन एक गहरी बात कहता है — चाहे सुख कितने भी वर्षों तक भोगो, आत्मा की प्यास नहीं बुझती। क्योंकि जो प्यास लगी है वह आत्मज्ञान की है — और उसे सांसारिक सुख से नहीं बुझाया जा सकता।
भगवान सम्भवनाथ के साथ भी यही हुआ।
❄️ वह एक पल — बर्फ का टुकड़ा और वैराग्य का उदय
"एक दिन महल की छत के ऊपर। देख रहे वन-सुषमा मनहर।
देखा मेघ-महल हिमखण्ड। हुआ नष्ट चली वायु प्रचण्ड।।
तभी हुआ वैराग्य एकदम। गृहबन्धन लगा नागपाश सम।।"
महल की छत पर खड़े थे। वन की सुंदरता निहार रहे थे। आकाश में बादलों का एक विशाल महल जैसा आकार बना था — और उस पर बर्फ का एक टुकड़ा। अचानक तेज़ हवा आई और वह सब — वह भव्य बादल-महल, वह हिमखंड — पल भर में नष्ट हो गया।
और उस एक दृश्य ने भगवान सम्भवनाथ को भीतर तक हिला दिया।
"यह राज्य भी तो ऐसा ही है। यह महल भी। यह वैभव भी। यह शरीर भी।
एक हवा का झोंका — और सब खत्म।"
घर के बंधन अब नागपाश जैसे लगने लगे। वस्तुओं के स्वरूप का चिंतन शुरू हुआ। लौकांतिक देवों ने आकर वैराग्य का समर्थन किया।
निर्णय हो गया।
🔱 दीक्षा — राजसिंहासन से वन की धरती तक
अपने पुत्र को राज्य सौंपकर भगवान सम्भवनाथ सिद्धार्थ पालकी पर सवार हुए और सहेतुक वन की ओर चल पड़े।
मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा को हजारों राजाओं के साथ उन्होंने दिगम्बर दीक्षा ली। केशलोंच किया। परिग्रह त्यागा। पूर्व दिशा की ओर मुख करके ध्यान लगाया।
और उसी दिन — दीक्षा के तत्काल बाद — एक चमत्कार हुआ।
"आत्मशुद्धि का प्रबल प्रणाम। तत्क्षण हुआ मनः पर्याय ज्ञान।।"
मनःपर्यायज्ञान — यह वह दिव्य शक्ति है जिससे दूसरों के मन के विचार जाने जा सकते हैं। दीक्षा लेते ही यह ज्ञान प्रकट हो गया। यह इस बात का प्रमाण था कि उनकी आत्मा कितनी शुद्ध थी — और मोक्ष का मार्ग अब अधिक दूर नहीं था।
उनका प्रथम आहार सुरेन्द्र नामक श्रावक के यहाँ हुआ — जिसका जीवन उस एक दान से धन्य हो गया।
🌟 चौदह वर्ष की साधना — और केवलज्ञान का उदय
दीक्षा के बाद चौदह वर्षों तक उन्होंने घोर तपस्या की। ध्यान, मौन, उपवास — एक-एक कर्म की परत हटती गई।
और फिर —
"चौदह वर्ष की आत्म सिद्धि। स्वयं ही उपजी केवल ऋद्धि।।
कृष्ण चतुर्थी कार्तिक सार। समवशरण रचना हितकार।।"
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को केवलज्ञान प्रकट हुआ। देवताओं ने समवसरण की रचना की। और भगवान सम्भवनाथ की दिव्य वाणी प्रकट हुई — जो हर जीव को उसकी अपनी भाषा में समझ आई।
यह जिनवाणी की सबसे बड़ी विशेषता है — वह सबको अपनी भाषा में सुनाई देती है।
📿 जिनवाणी का सार — तीन शब्दों में मोक्ष का रास्ता
भगवान सम्भवनाथ की वाणी में जो सबसे गहरी बात थी, वह चालीसा में इन पंक्तियों में है —
"जिनलिंग से निज को पहचानो। अपना शुद्धातम सरधानो।
दर्शन-ज्ञान-चरित्र बतावे। मोक्ष मार्ग एकत्व दिखाये।।"
सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र — यही रत्नत्रय है। यही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।
और एक और कठोर सत्य —
"विषयभोग हैं भोगों से। काया घिरती है रोगों से।।"
जितने भी विषय-भोग हैं — वे सब अंततः शरीर को रोगों से घेर देते हैं। यह केवल आध्यात्मिक सत्य नहीं, यह वैज्ञानिक सत्य भी है। इंद्रियों के पीछे भागने से न सुख मिलता है, न शांति।
उनके संघ में 105 गणधर थे और पंद्रह हजार मुनिवर थे। देव, मनुष्य, तिर्यंच — सभी उनके समवसरण में उपस्थित रहते थे।
🏔️ सम्मेद शिखर — अंतिम पड़ाव
जब आयु का केवल एक महीना शेष बचा, तो भगवान सम्भवनाथ सम्मेद शिखर पहुँचे।
"अचल हुए खड्गासन में प्रभु। कर्म नाश कर हुए स्वयम्भु।।
चैत सुदी षष्ठी था न्यारी। धवल कूट की महिमा भारी।।"
चैत्र शुक्ल षष्ठी को धवल कूट पर — उन्होंने समस्त कर्मों को नष्ट किया और मोक्ष प्राप्त किया। खड्गासन में अचल खड़े रहकर आत्मा ने अपनी अंतिम उड़ान भरी — संसार से परे, कर्मों से परे, जन्म-मृत्यु से परे।
🙏 चालीसा पाठ का फल और निष्कर्ष
"चालीसा श्री सम्भवनाथ, पाठ करो श्रद्धा के साथ।
मनवांछित सब पूरण होवे, जनम-मरन दुख खोवे।।"
भगवान सम्भवनाथ का जीवन हमें एक ही बात सिखाता है — जागरण के लिए कोई बड़ी घटना की ज़रूरत नहीं। एक बूँद ओस, एक फटा बादल, एक पिघला बर्फ का टुकड़ा — बस इतना काफी है, अगर आँखें देखने वाली हों।
असम्भव को सम्भव करने वाले प्रभु सम्भवनाथ के चरणों में —
दर्शकों भले ही तीर्थंकरों का जीवन सुख में रहा हो और उन्होंने कई वैभव और आनन्द को अपने जीवन काल में व्यतीत किया हो लेकिन नर से नारायण बनने तक की यात्रा कठिन होती है और तीर्थंकर श्री संभवनाथ जी ने अपने जीवनकाल में यह करके दिखाया।
तो आइए हम भी उन प्रभु की चालीसा का पाठ करते हैं-
।।श्री सम्भवनाथ चालीसा।।
दोहा:-
श्री जिनदेव को करके वंदन, जिनवानी को मन में ध्याय ।
काम असम्भव कर दे सम्भव, समदर्शी सम्भव जिनराय ।।
चोपाई:-
जगतपूज्य श्री सम्भव स्वामी । तीसरे तीर्थकंर है नामी ।।
धर्म तीर्थ प्रगटाने वाले । भव दुख दुर भगाने वाले ।।
श्रावस्ती नगरी अती सोहे । देवो के भी मन को मोहे ।।
मात सुषेणा पिता दृडराज । धन्य हुए जन्मे जिनराज ।।
फाल्गुन शुक्ला अष्टमी आए । गर्भ कल्याणक देव मनाये ।।
पूनम कार्तिक शुक्ला आई । हुई पूज्य प्रगटे जिनराई ।।
तीन लोक में खुशियाँ छाई । शची पर्भु को लेने आई ।।
मेरू पर अभिषेक कराया । सम्भवपर्भु शुभ नाम धराया ।।
बीता बचबन यौवन आया । पिता ने राज्यभिषेक कराया ।।
मिली रानियाँ सब अनुरूप । सुख भोगे चवालिस लक्ष पूर्व ।।
एक दिन महल की छत के ऊपर । देख रहे वन-सुषमा मनहर ।।
देखा मेघ – महल हिमखण्ड । हुआ नष्ट चली वासु प्रचण्ड ।।
तभी हुआ वैराग्य एकदम । गृहबन्धन लगा नागपाश सम ।।
करते वस्तु-स्वरूप चिन्तवन । देव लौकान्तिक करें समर्थन ।।
निज सुत को देकर के राज । वन को गमन करें जिनराज ।।
हुए स्वार सिद्धार्थ पालकी । गए राह सहेतुक वन की ।।
मंगसिर शुक्ल पूर्णिमा प्यारी । सहस भूप संग दीक्षा धारी ।।
तजा परिग्रह केश लौंच कर । ध्यान धरा पूरब को मुख कर ।।
धारण कर उस दिन उपवास । वन में ही फिर किया निवास ।।
आत्मशुद्धि का प्रबल प्रणाम । तत्क्षण हुआ मनः पर्याय ज्ञान ।।
प्रथमाहार हुआ मुनिवर का । धन्य हुआ जीवन सुरेन्द्र का ।।
पंचाश्चर्यो से देवो के । हुए प्रजाजन सुखी नगर के ।।
चौदह वर्ष की आत्म सिद्धि । स्वयं ही उपजी केवल ऋद्धि ।।
कृष्ण चतुर्थी कार्तिक सार । समोशरण रचना हितकार ।।
खिरती सुखकारी जिनवाणी । निज भाषा में समझे प्राणी ।।
विषयभोग हैं भोगों से । काया घिरती है रोगो से ।।
जिनलिंग से निज को पहचानो । अपना शुद्धातम सरधानो ।।
दर्शन-ज्ञान-चरित्र बतावे । मोक्ष मार्ग एकत्व दिखाये ।।
जीवों का सन्मार्ग बताया । भव्यो का उद्धार कराया ।।
गणधर एक सौ पाँच प्रभु के । मुनिवर पन्द्रह सहस संघ के ।।
देवी – देव – मनुज बहुतेरे । सभा में थे तिर्यंच घनेरे ।।
एक महीना उम्र रही जब । पहुँच गए सम्मेद शिखर तब ।।
अचल हुए खङगासन में प्रभु । कर्म नाश कर हुए स्वयम्भु ।।
चैत सुदी षष्ठी था न्यारी । धवल कूट की महिमा भारी ।।
साठ लाख पूर्व का जीवन । पग में अश्व का था शुभ लक्षण ।।
दोहा:-
चालीसा श्री सम्भवनाथ, पाठ करो श्रद्धा के साथ ।
मनवांछित सब पूरण होवे, जनम – मरन दुख खोवे ।।
दोहा:-
श्री जिनदेव को करके वंदन, जिनवानी को मन में ध्याय ।
काम असम्भव कर दे सम्भव, समदर्शी सम्भव जिनराय ।।
चोपाई:-
जगतपूज्य श्री सम्भव स्वामी । तीसरे तीर्थकंर है नामी ।।
धर्म तीर्थ प्रगटाने वाले । भव दुख दुर भगाने वाले ।।
श्रावस्ती नगरी अती सोहे । देवो के भी मन को मोहे ।।
मात सुषेणा पिता दृडराज । धन्य हुए जन्मे जिनराज ।।
फाल्गुन शुक्ला अष्टमी आए । गर्भ कल्याणक देव मनाये ।।
पूनम कार्तिक शुक्ला आई । हुई पूज्य प्रगटे जिनराई ।।
तीन लोक में खुशियाँ छाई । शची पर्भु को लेने आई ।।
मेरू पर अभिषेक कराया । सम्भवपर्भु शुभ नाम धराया ।।
बीता बचबन यौवन आया । पिता ने राज्यभिषेक कराया ।।
मिली रानियाँ सब अनुरूप । सुख भोगे चवालिस लक्ष पूर्व ।।
एक दिन महल की छत के ऊपर । देख रहे वन-सुषमा मनहर ।।
देखा मेघ – महल हिमखण्ड । हुआ नष्ट चली वासु प्रचण्ड ।।
तभी हुआ वैराग्य एकदम । गृहबन्धन लगा नागपाश सम ।।
करते वस्तु-स्वरूप चिन्तवन । देव लौकान्तिक करें समर्थन ।।
निज सुत को देकर के राज । वन को गमन करें जिनराज ।।
हुए स्वार सिद्धार्थ पालकी । गए राह सहेतुक वन की ।।
मंगसिर शुक्ल पूर्णिमा प्यारी । सहस भूप संग दीक्षा धारी ।।
तजा परिग्रह केश लौंच कर । ध्यान धरा पूरब को मुख कर ।।
धारण कर उस दिन उपवास । वन में ही फिर किया निवास ।।
आत्मशुद्धि का प्रबल प्रणाम । तत्क्षण हुआ मनः पर्याय ज्ञान ।।
प्रथमाहार हुआ मुनिवर का । धन्य हुआ जीवन सुरेन्द्र का ।।
पंचाश्चर्यो से देवो के । हुए प्रजाजन सुखी नगर के ।।
चौदह वर्ष की आत्म सिद्धि । स्वयं ही उपजी केवल ऋद्धि ।।
कृष्ण चतुर्थी कार्तिक सार । समोशरण रचना हितकार ।।
खिरती सुखकारी जिनवाणी । निज भाषा में समझे प्राणी ।।
विषयभोग हैं भोगों से । काया घिरती है रोगो से ।।
जिनलिंग से निज को पहचानो । अपना शुद्धातम सरधानो ।।
दर्शन-ज्ञान-चरित्र बतावे । मोक्ष मार्ग एकत्व दिखाये ।।
जीवों का सन्मार्ग बताया । भव्यो का उद्धार कराया ।।
गणधर एक सौ पाँच प्रभु के । मुनिवर पन्द्रह सहस संघ के ।।
देवी – देव – मनुज बहुतेरे । सभा में थे तिर्यंच घनेरे ।।
एक महीना उम्र रही जब । पहुँच गए सम्मेद शिखर तब ।।
अचल हुए खङगासन में प्रभु । कर्म नाश कर हुए स्वयम्भु ।।
चैत सुदी षष्ठी था न्यारी । धवल कूट की महिमा भारी ।।
साठ लाख पूर्व का जीवन । पग में अश्व का था शुभ लक्षण ।।
दोहा:-
चालीसा श्री सम्भवनाथ, पाठ करो श्रद्धा के साथ ।
मनवांछित सब पूरण होवे, जनम – मरन दुख खोवे ।।
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