।। श्री अनन्तनाथ चालीसा ।।
भक्ति, वैराग्य और मोक्ष की अमर गाथा
"अनन्त चतुष्टय धारी 'अनन्त', अनन्त गुणों की खान 'अनन्त'"
जैन धर्म के चौदहवें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ — यह नाम सुनते ही मन में एक असीम शांति की अनुभूति होती है। "अनन्त" शब्द का अर्थ ही है — जिसका कोई अंत नहीं। और सच में भगवान अनन्तनाथ के गुण, उनका ज्ञान और उनकी महिमा वास्तव में अनन्त है। श्री अनन्तनाथ चालीसा उनके उसी अनन्त जीवन की झलक हमें दिखाती है — जन्म से लेकर मोक्ष तक की पूरी यात्रा, जो हर भक्त के हृदय को छू जाती है।
🌸 अयोध्या की पावन धरती पर हुआ अवतरण
भगवान अनन्तनाथ का जन्म उसी अयोध्या नगरी में हुआ जो सदियों से पवित्रता और धर्म की प्रतीक रही है। उनके पिता राजा सिंहसेन एक महान और न्यायप्रिय शासक थे, और उनकी माता का नाम सर्वयशा था — जिन्हें जिनवर की जननी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
ज्येष्ठ मास की कृष्ण द्वादशी को जब इस धरती पर एक तीर्थंकर ने जन्म लिया, तो स्वयं इंद्र ने प्रभु को गोद में लेकर मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक किया। देवलोक में उत्सव हुआ, दिव्य ध्वनियाँ गूँजीं और "अनन्तनाथ" नाम से इस महान आत्मा को पुकारा गया।
यह नाम कोई साधारण नाम नहीं था — यह उनके गुणों का ही प्रतिबिंब था। उनके ज्ञान के सागर का पार पाना संभव ही नहीं था।
✨ दिव्य रूप और ज्ञान का वैभव
भगवान अनन्तनाथ का वर्ण सोने के समान था — दमकता हुआ, तेजस्वी और अलौकिक। वे मति, श्रुत और अवधि — इन तीनों ज्ञानों के स्वाभाविक धारक थे।
उनकी आयु तीस लाख वर्ष की थी और उनके शरीर की ऊंचाई पचास धनुष थी। इन आंकड़ों को पढ़कर मन में एक भव्य और विशाल छवि उभरती है — जो यह बताती है कि तीर्थंकर कोई साधारण मनुष्य नहीं होते, वे संसार की सबसे उन्नत आत्माएँ होती हैं जो अनंत काल की साधना के बाद इस पद को प्राप्त करती हैं।
🌿 सांसारिक जीवन — और फिर वैराग्य का पल
बचपन बीता, यौवन आया। राज्य मिला, विवाह हुआ और जीवन सुखमय था। पंद्रह लाख वर्षों तक उन्होंने गृहस्थ जीवन जिया। किंतु एक दिन आकाश में उल्कापात हुआ — और उस एक घटना ने सब कुछ बदल दिया।
उल्कापात देखकर भगवान अनन्तनाथ के मन में संसार की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। यह संसार कितना अनिश्चित है! यह सुख कितना अस्थायी है! उनके मन से राग, मोह और आसक्ति के भाव छूटने लगे। उन्होंने बारह भावनाओं का चिंतन किया और वैराग्य की अग्नि और प्रज्ज्वलित हो गई।
यह वह मोड़ था जब एक राजा, एक सम्राट — तीर्थंकर बनने की दिशा में अपना पहला कदम उठाता है।
🔱 दीक्षा — राजमहल से वन की ओर
अपने पुत्र "अनन्तविजय" को राजतिलक कराकर भगवान ने संसार की समस्त जिम्मेदारियों को विधिपूर्वक सौंप दिया। देवों ने दिव्य शिविका (पालकी) सजाई और भगवान अनन्तनाथ सहेतुक वन की ओर प्रस्थान कर गए। उनके साथ हजारों राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की।
ज्येष्ठ मास की कृष्ण द्वादशी को उन्होंने तीन दिन के उपवास के साथ दिगम्बर दीक्षा ली। इसके पश्चात् वे अयोध्या पहुँचे और "विशाख" नामक श्रावक ने उन्हें प्रथम आहार दान दिया — जिससे विशाख को अपार पुण्य की प्राप्ति हुई।
राजमहल की चमक-दमक छोड़कर जंगल की सादगी अपनाना — यही तो तीर्थंकर का असली परिचय है।
🌳 पीपल वृक्ष के नीचे — केवलज्ञान का उदय
दीक्षा के पश्चात् भगवान अनन्तनाथ मौन धारण करके वनों में विचरण करते रहे। एक दिन वे एक पीपल वृक्ष के नीचे आत्म-ध्यान में स्थिर हो गए। उनका ध्यान अटल था, मन निर्विकार था और आत्मा समस्त बाहरी विकारों से परे थी।
चैत्र मास की कृष्ण अमावस्या को उनके सभी घाती कर्म नष्ट हो गए और केवलज्ञान का उदय हुआ — लोक और अलोक का संपूर्ण ज्ञान उनकी आत्मा में एक साथ प्रकाशित हो उठा।
तत्काल दिव्य समवसरण की रचना हुई। देवता, मनुष्य और पशु — सभी उनके उपदेश सुनने के लिए आए। उनकी वाणी जब प्रकट हुई, तो वह कानों को अमृत के समान लगी।
📿 जिनवाणी — मुक्ति का सीधा मार्ग
भगवान अनन्तनाथ की वाणी में संसार का सच था। उन्होंने चारों गतियों (नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव) के दुखों का चित्रण किया। जो भी भव्य जीव उनकी वाणी सुनते, वे पापों से भयभीत होकर सत्मार्ग की ओर मुड़ जाते।
उनका संदेश अत्यंत स्पष्ट और सीधा था —
"जो चाहो तुम मुक्ति पाना, निज आतम की शरण में जाना।"
यह एक वाक्य पूरे जैन दर्शन का सार है। मुक्ति बाहर नहीं है, किसी देवता की कृपा में नहीं है — मुक्ति तो अपनी ही आत्मा की शरण में जाने से मिलती है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र — ये तीन रत्न ही मोक्ष का मार्ग हैं। व्यवहार में रत्नत्रय और निश्चय में शुद्धात्मा का ध्यान — यही शिवपद (मोक्ष) का द्वार है।
उनकी वाणी सुनकर अनेक भव्यजनों ने यथाशक्ति व्रत धारण किए और अपने जीवन को धर्मपथ पर मोड़ लिया।
🏔️ सम्मेद शिखर — अंतिम यात्रा और मोक्ष
विहार करते हुए उन्होंने देश-देश में सत्पथ का प्रकाश फैलाया। अनगिनत आत्माओं को सन्मार्ग दिखाया। और जब अंतिम समय आया, तो भगवान अनन्तनाथ सम्मेद शिखर की पावन भूमि पर पहुँचे।
एक माह तक वे वहाँ पूर्णतः निश्चल रहे — योगनिरोध की अवस्था में। शरीर, मन और वचन की समस्त क्रियाएँ रुक गईं। चैत्र मास की कृष्ण अमावस्या को समस्त अघाती कर्म भी नष्ट हो गए और भगवान अनन्तनाथ ने मोक्षमहल में प्रवेश किया।
देवगण आए, उत्सव मनाया और "कूट स्वयंप्रभ" पर उनका स्मरण करते हुए नमन किया। अनन्त भवों की यात्रा का अंत हो गया था — और एक परम आत्मा अनन्त आनंद में विलीन हो गई।
🙏 चालीसा पाठ — भक्त का निवेदन
इस चालीसा में भक्त "अरुणा" की एक सरल और मार्मिक अरज है —
"अरुणा अरज करे बस ये ही, पार करो भवसागर से ही।"
यही तो हर भक्त की पुकार है। संसार के इस भवसागर में हम सब डूब रहे हैं — कभी सुख में, कभी दुख में, कभी मोह में, कभी भय में। और प्रभु अनन्तनाथ के चरणों में आकर यही विनती है कि हे प्रभु! इस भवसागर से पार करो।
उनका लांछन (चिह्न) "सेही" (साही/सेहा) है जो उनके पद में सुशोभित होता है।
🌟 निष्कर्ष — अनन्त का अनन्त संदेश
भगवान अनन्तनाथ का जीवन हमें तीन बड़े सबक देता है।
पहला — संसार की कोई भी उपलब्धि, चाहे वह राजपाट हो या वैभव, स्थायी नहीं है। एक उल्कापात ने एक सम्राट को वैरागी बना दिया।
दूसरा — मुक्ति का मार्ग बाहर नहीं, भीतर है। अपनी आत्मा को पहचानो, उसकी शरण लो — यही सच्चा धर्म है।
तीसरा — भक्ति निर्लोभ होनी चाहिए। जो भक्त प्रभु से केवल भवसागर से पार होने की विनती करता है, वही सच्चा भक्त है।
श्री अनन्तनाथ चालीसा का नित्य पाठ करने वाले भक्त के जीवन में धीरे-धीरे वैराग्य, विवेक और आत्मशांति का उदय होता है। संसार के दुख हल्के लगने लगते हैं और मुक्ति का मार्ग स्पष्ट होने लगता है।
"हुआ अनन्त भवों का अन्त, अद्भुत तुम महिमा है 'अनन्त'।
आइये हम भी प्रभु के गुणों से युक्त भगवान अनन्तनाथ जी चालीसा का पाठ करके पुण्य एकत्रित करते है और अपने पापों की निर्जरा करते है-
।। श्री अनन्तनाथ चालीसा।।
अनन्त चतुष्टय धारी ‘अनन्त, अनन्त गुणों की खान “अनन्त’ ।
सर्वशुद्ध ज्ञायक हैं अनन्त, हरण करें मम दोष अनन्त ।
नगर अयोध्या महा सुखकार, राज्य करें सिहंसेन अपार ।
सर्वयशा महादेवी उनकी, जननी कहलाई जिनवर की ।
द्वादशी ज्येष्ठ कृष्ण सुखकारी, जन्मे तीर्थंकर हितकारी ।
इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, न्हवन करें मेरु पर जाकर ।
नाम “अनन्तनाथ’ शुभ दीना, उत्सव करते नित्य नवीना ।
सार्थक हुआ नाम प्रभुवर का, पार नहीं गुण के सागर का ।
वर्ण सुवर्ण समान प्रभु का, ज्ञान धरें मति- श्रुत- अवधि का ।
आयु तीस लख वर्ष उपाई, धनुष अर्धशत तन ऊंचाई ।
बचपन गया जवानी आई, राज्य मिला उनको सुखदाई ।
हुआ विवाह उनका मंगलमय, जीवन था जिनवर का सुखमय ।
पन्द्रह लाख बरस बीते जब, उल्कापात से हुए विरक्त तब ।
जग में सुख पाया किसने-कब, मन से त्याग राग भाव सब ।
बारह भावना मन में भाये, ब्रह्मर्षि वैराग्य बढाये ।
“अनन्तविजय” सुत तिलक-कराकर, देवोमई शिविका पधरा कर ।
गए सहेतुक वन जिनराज, दीक्षित हुए सहस नृप साथ ।
द्वादशी कृष्ण ज्येष्ठ शुभ मास, तीन दिन का धारा उपवास ।
गए अयोध्या प्रथम योग कर, धन्य ‘विशाख’ आहार करा कर ।
मौन सहित रहते थे वन में, एक दिन तिष्ठे पीपल- तल में ।
अटल रहे निज योग ध्यान में, झलके लोकालोक ज्ञान में ।
कृष्ण अमावस चैत्र मास की, रचना हुई शुभ समवशरण की ।
जिनवर की वाणी जब खिरती, अमृत रस कानों को लगती ।
चतुर्गति दुख चित्रण करते, भविजन सुन पापों से डरते ।
जो चाहो तुम मुक्ति पाना, निज आतम की शरण में जाना ।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित है, कहे व्यवहार मेँ रतनत्रय हैं ।
निश्चय से शुद्धातम ध्याकर, शिवपद मिलता सुख रत्नाकर ।
श्रद्धा करके भव्य जनों ने, यथाशक्ति व्रत धारे सबने ।
हुआ विहार देश और प्रान्त, सत्पथ दर्शाये जिननाथ ।
अन्त समय गए सम्मेदाचल, एक मास तक रहे सुनिश्चल ।
कृष्ण चैत्र अमावस पावन, मोक्षमहल पहुंचे मनभावन ।
उत्सव करते सुरगण आकर, कूट स्वयंप्रभ मन में ध्याकर ।
शुभ लक्षण प्रभुवर का ‘सेही’, शोभित होता प्रभु- पद में ही ।
अरुणा अरज करे बस ये ही, पार करो भवसागर से ही ।
है प्रभु लोकालोक अनन्त, झलकें सब तुम ज्ञान अनन्त ।
हुआ अनन्त भवों का अन्त, अद्भुत तुम महिमा है “अनन्त’ ।
अनन्त चतुष्टय धारी ‘अनन्त, अनन्त गुणों की खान “अनन्त’ ।
सर्वशुद्ध ज्ञायक हैं अनन्त, हरण करें मम दोष अनन्त ।
नगर अयोध्या महा सुखकार, राज्य करें सिहंसेन अपार ।
सर्वयशा महादेवी उनकी, जननी कहलाई जिनवर की ।
द्वादशी ज्येष्ठ कृष्ण सुखकारी, जन्मे तीर्थंकर हितकारी ।
इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, न्हवन करें मेरु पर जाकर ।
नाम “अनन्तनाथ’ शुभ दीना, उत्सव करते नित्य नवीना ।
सार्थक हुआ नाम प्रभुवर का, पार नहीं गुण के सागर का ।
वर्ण सुवर्ण समान प्रभु का, ज्ञान धरें मति- श्रुत- अवधि का ।
आयु तीस लख वर्ष उपाई, धनुष अर्धशत तन ऊंचाई ।
बचपन गया जवानी आई, राज्य मिला उनको सुखदाई ।
हुआ विवाह उनका मंगलमय, जीवन था जिनवर का सुखमय ।
पन्द्रह लाख बरस बीते जब, उल्कापात से हुए विरक्त तब ।
जग में सुख पाया किसने-कब, मन से त्याग राग भाव सब ।
बारह भावना मन में भाये, ब्रह्मर्षि वैराग्य बढाये ।
“अनन्तविजय” सुत तिलक-कराकर, देवोमई शिविका पधरा कर ।
गए सहेतुक वन जिनराज, दीक्षित हुए सहस नृप साथ ।
द्वादशी कृष्ण ज्येष्ठ शुभ मास, तीन दिन का धारा उपवास ।
गए अयोध्या प्रथम योग कर, धन्य ‘विशाख’ आहार करा कर ।
मौन सहित रहते थे वन में, एक दिन तिष्ठे पीपल- तल में ।
अटल रहे निज योग ध्यान में, झलके लोकालोक ज्ञान में ।
कृष्ण अमावस चैत्र मास की, रचना हुई शुभ समवशरण की ।
जिनवर की वाणी जब खिरती, अमृत रस कानों को लगती ।
चतुर्गति दुख चित्रण करते, भविजन सुन पापों से डरते ।
जो चाहो तुम मुक्ति पाना, निज आतम की शरण में जाना ।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित है, कहे व्यवहार मेँ रतनत्रय हैं ।
निश्चय से शुद्धातम ध्याकर, शिवपद मिलता सुख रत्नाकर ।
श्रद्धा करके भव्य जनों ने, यथाशक्ति व्रत धारे सबने ।
हुआ विहार देश और प्रान्त, सत्पथ दर्शाये जिननाथ ।
अन्त समय गए सम्मेदाचल, एक मास तक रहे सुनिश्चल ।
कृष्ण चैत्र अमावस पावन, मोक्षमहल पहुंचे मनभावन ।
उत्सव करते सुरगण आकर, कूट स्वयंप्रभ मन में ध्याकर ।
शुभ लक्षण प्रभुवर का ‘सेही’, शोभित होता प्रभु- पद में ही ।
अरुणा अरज करे बस ये ही, पार करो भवसागर से ही ।
है प्रभु लोकालोक अनन्त, झलकें सब तुम ज्ञान अनन्त ।
हुआ अनन्त भवों का अन्त, अद्भुत तुम महिमा है “अनन्त’ ।
इस लेख में हमने भगवान अनन्तनाथ के गुण और चरित्र के बारे में जाना एवं हमने उनकी चालीसा का भी पाठ किया। भगवान अनन्तनाथ नाम से ही नही बल्कि कृपा से भी अनन्त है। जो भी उनकी चालीसा का सच्चे मन से पाठ करता है वह भोग और मोक्ष दोनो को प्राप्त करता है। आशा है आपको यह हमारा पोस्ट पसन्द आया होगा। ऐसे ही हमारे ब्लॉग को पढ़ते रहे जय जिनेन्द्र🙏🙏
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