सोमवार, 15 जून 2026

श्री विमलनाथ चालीसा | सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, महत्व एवं लाभ (Vimalnath Chalisa)

।। श्री विमलनाथ चालीसा ।। — एक बूँद ओस और नर से नारायण बनने तक का सफर
कभी-कभी जिंदगी का सबसे बड़ा सच... सबसे छोटी सी चीज़ बता देती है।
सुबह की धूप अभी-अभी निकली थी। राजमहल के बगीचे में घास पर ओस की बूँदें चमक रही थीं — मोतियों जैसी, हीरों जैसी। एक राजा खड़ा था और उन्हें देख रहा था। तभी सूरज की किरणें आईं... और वे सारी बूँदें — एक पल में — गायब हो गईं।
बस यही एक पल था। और इसी एक पल ने एक चक्रवर्ती सम्राट को बदल दिया।
यह कहानी है जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ की।
🌫️ रहस्य की शुरुआत — कौन थे विमलनाथ?
"विमल" — अर्थात् जो पूर्णतः निर्मल हो। जिनके मन में, वचन में, कर्म में — कहीं भी कोई मैल न हो। भगवान विमलनाथ का यह नाम उनके संपूर्ण जीवन का सार है।
श्री विमलनाथ चालीसा उनकी उस यात्रा को शब्दों में उतारती है जो एक राजमहल से शुरू होकर सम्मेद शिखर पर समाप्त होती है। लेकिन इस यात्रा के बीच में जो घटता है — वह किसी रहस्यकथा से कम नहीं।
चालीसा का पहला ही भाव मन को ठहरा देता है —
"विमलप्रभु की विमल भक्ति कर, चरण कमल में शीश नवाय।"
यह केवल वंदना नहीं — यह एक निमंत्रण है। उस यात्रा पर चलने का निमंत्रण जो भीतर की ओर जाती है।
👶 जन्म की रात — जब देवताओं ने उत्सव मनाया
कंपिलापुर नगरी। राजा कृतवर्मा का महल। रानी जयश्यामा की आँखें उस रात अजीब सपनों से भरी थीं — मंगलमय, शुभ, अलौकिक सपने। जैन परंपरा में ये सोलह स्वप्न एक ही बात का संकेत देते हैं — कोई महान आत्मा आने वाली है।
और फिर आया वह दिन — माघ मास की शुक्ल चतुर्थी।
भगवान विमलनाथ का जन्म हुआ।
"जन्योत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया।
मेरु पर अभिषेक कराया, गन्धोंदक श्रद्धा से लगाया।।"
इंद्र स्वयं आए। मेरु पर्वत पर अभिषेक हुआ। दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाकर बालक को माता-पिता को सौंपा गया। यह कोई साधारण जन्म नहीं था — यह एक ऐसी आत्मा का आगमन था जो अनंत काल की साधना के बाद अंतिम जन्म लेने आई थी।
उनका तन सोने जैसा दमकता था। साठ धनुष की ऊँचाई और साठ लाख वर्ष की आयु — ये संख्याएँ हमें बताती हैं कि तीर्थंकर का अस्तित्व हमारी कल्पना से भी परे होता है।
👑 राजपाट, विवाह और वैभव — पर भीतर कुछ और था
समय बीता। बचपन गया, यौवन आया। पिता ने राजतिलक किया। सुंदर वधुओं से विवाह हुआ। राज्य मिला। सब कुछ था — जो एक राजा को चाहिए होता है, वह सब।
लेकिन...
क्या आपने कभी महसूस किया है कि कभी-कभी सब कुछ होते हुए भी भीतर एक अजीब सी खालीपन रहती है? एक अनजानी बेचैनी? एक अनुत्तरित प्रश्न?
भगवान विमलनाथ के भीतर भी कुछ ऐसा ही था। राजसिंहासन पर बैठे थे — पर आत्मा किसी और ही दिशा में देख रही थी।
और फिर आया वह रहस्यमय सुबह का क्षण।
💧 ओस की बूँद — जो राज़ खोल गई
"एक दिन देखी ओस घास पर, हिमकण देखें नयन प्रीतिभर।
हुआ संसर्ग सूर्य रश्मि से, लुप्त हुए सब मोती जैसे।।"
सोचिए उस दृश्य को —
सुबह की ताज़ी हवा। हरी-हरी घास। उस पर टिकी ओस की बूँदें — मोतियों की तरह चमकती हुईं। एक राजा उन्हें देख रहा है, मुग्ध होकर।
और तभी... सूरज निकला।
बस एक किरण पड़ी — और वे सारी बूँदें जो इतनी सुंदर थीं, इतनी चमकदार थीं — एक पल में वाष्प बन गईं। जैसे थीं ही नहीं।
भगवान विमलनाथ वहीं ठिठक गए। चित्रलिखित से खड़े रह गए।
उनके मन में एक विचार कौंधा —
"क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार।"
यह राज्य — इस ओस जैसा है।
यह सौंदर्य — इस ओस जैसा है।
यह वैभव, यह सत्ता, यह प्रेम — सब इस ओस जैसा है।
सूरज की एक किरण — यानी काल का एक पल — और सब कुछ समाप्त।
यह दर्शन किसी दार्शनिक ने नहीं दिया था। यह दर्शन एक बूँद ओस ने दिया था।
🚶 महल से वन की ओर — वह निर्णय जो बदल गया सब
उस दिन के बाद भगवान विमलनाथ बदल गए।
वे घर लौटे — पर अनमने होकर। मन पहले जैसा नहीं रहा था। क्रोध, मान और माया — ये तीनों उनके हृदय से एक-एक कर छूटने लगे। वैराग्य की जो आग भीतर सुलगी थी, वह अब लौ बन चुकी थी।
उन्होंने अपना राजपाट अपने पुत्र को सौंपा। दिव्य शिविका पर चढ़कर सहेतुक वन की ओर चल पड़े।
"माघ मास-चतुर्थी कारी, 'नम: सिद्ध' कह दीक्षाधारी।।"
"नमः सिद्धेभ्यः" — सिद्धों को नमन — यह उनका पहला उद्घोष था दीक्षा के क्षण में। और उसी माघ चतुर्थी को जिस दिन उनका जन्म हुआ था — उसी तिथि को उन्होंने दीक्षा ली। जन्म और त्याग — एक ही तिथि पर। यह संयोग नहीं था — यह नियति थी।
🔥 तप का रहस्य — आत्मा जब कर्मों से लड़ती है
दीक्षा के बाद का जीवन बाहर से देखने में सरल लगता है — मौन, ध्यान, तप। पर भीतर से यह एक भयंकर युद्ध था।
कर्मों का युद्ध।
हर कर्म जो अनंत जन्मों में बाँधा था — वह आत्मा को जकड़े रखता है। और साधक उन्हें तप की अग्नि में एक-एक कर जलाता है। यह प्रक्रिया दिखती नहीं — पर होती है। चुपचाप। गहराई में।
भगवान विमलनाथ के उपदेश में एक रहस्य था जो उन्होंने समवसरण में खोला —
"उपशम करके मिथ्यात्व का, अनुभव करलो निज आत्म का।"
मिथ्यात्व — अर्थात् वह भ्रम जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम यह शरीर हैं, यह नाम हैं, यह पद हैं। जब तक यह भ्रम है, संसार-भ्रमण जारी रहेगा।
और उन्होंने एक और गहरा सत्य कहा —
"बिन सम्यक्त्व के जप-तप-पूजन, विफल हैं सारे व्रत-अर्चन।"
यह बात चौंकाती है। क्या बिना सम्यक्त्व (सच्चे ज्ञान) के की गई पूजा व्यर्थ है? हाँ — क्योंकि जब तक आत्मा का सही बोध नहीं, तब तक सब कर्मकाण्ड केवल आदत है, भक्ति नहीं।
🌌 55 गणधर और 68 हजार मुनि — एक विशाल संघ
भगवान विमलनाथ अकेले नहीं थे। उनके संघ की विशालता देखकर मन में एक भव्य दृश्य उभरता है —
"'मन्दर' आदि पचपन गणधर, अड़सठ सहस दिगम्बर मुनिवर।।"
पचपन गणधर — जिनमें मन्दर प्रमुख थे। अड़सठ हजार दिगम्बर मुनि। यह कोई छोटा-मोटा आध्यात्मिक आंदोलन नहीं था। यह एक पूरी क्रांति थी — आत्मा की क्रांति। जो बाहर की दुनिया को नहीं, भीतर की दुनिया को बदलती है।
उनकी दिव्य वाणी सुनकर दूर-दूर तक लोगों ने आत्मोद्धार किया। जिनवाणी का यह प्रवाह रुका नहीं — बहता रहा, फैलता रहा।
🏔️ सम्मेद शिखर का अंतिम रहस्य
जब आयु के केवल तीस दिन शेष बचे, तो भगवान विमलनाथ सम्मेद शिखर की ओर चल पड़े।
वह पर्वत जो रहस्यों का घर है। जहाँ असंख्य तीर्थंकरों की आत्माएँ मोक्ष को प्राप्त हुई हैं। जहाँ की मिट्टी में ही मुक्ति की सुगंध है।
"उम्र रही जब तीस दिनों क, जा पहुँचे सम्मेद शिखर जी।
हुआ बाह्य वैभव परिहार, शेष कर्म बन्धन निरवार।।"
वहाँ पहुँचकर उन्होंने योगनिरोध लिया। श्वास थमी। शरीर स्थिर हुआ। और आत्मा ने उस अंतिम छलाँग लगाई जो हर तीर्थंकर लगाता है —
मोक्ष।
"आवागमन का कर संहार, प्रभु ने पाया मोक्षागारा।।"
आषाढ़ मास की कृष्ण षष्ठी को — वह पल आया। भव-बंधन का अंत। जन्म-मृत्यु के चक्र का अंत। और आत्मा का अनंत आनंद में विलीन होना।
"सुबीर कूट" — सम्मेद शिखर पर उनका निर्वाण स्थल — आज भी लाखों भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है।
🙏 अरुणा की विनती — और हर भक्त की पुकार
चालीसा का अंत एक भक्त की सरल, निर्मल विनती से होता है —
"'अरुणा' करती विमल-स्तवन, ढीले हो जावें भव-बन्धन।।"
यह एक पंक्ति पूरी चालीसा का सार है। भक्त कुछ बड़ा नहीं माँग रहा। सोना नहीं, राज्य नहीं, यश नहीं। बस एक विनती — भव-बंधन ढीले हो जाएँ।
और जो भी सच्चे मन से विमलनाथ प्रभु का ध्यान करता है —
"जो भवि विमलप्रभु को ध्यावें, वे सब मन वांछित फल पावें।।"
✨ अंतिम बात — उस ओस की बूँद को याद रखो
आज जब आप सुबह उठें और घास पर ओस देखें — एक पल के लिए रुकिए।
देखिए कैसे वे चमकती हैं। और फिर देखिए कैसे सूरज की एक किरण में मिट जाती हैं।
भगवान विमलनाथ ने यही देखा था। और उनका जीवन बदल गया था।
शायद हमारा भी बदले।
"क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार।"

दर्शकों हमने भगवान विमलनथ जी के चरित्र के बारे जाना और अब हम उनकी सुंदर चालीसा का पाठ करेंगे इस चालीसा को पढ़ते ही सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। और हमारे सभी मनवांछित कार्य पूरे होने लगते हैं तो चलिए देर ना करते हुए इसका पाठ करते हैं।

।।श्री विमलनाथ चालीसा।।

सिद्ध अनन्तानन्त नमन कर, सरस्वती को मन में ध्याय ।।
विमलप्रभु क्री विमल भक्ति कर, चरण कमल में शीश नवाय ।।
जय श्री विमलनाथ विमलेश, आठों कर्म किए नि:शेष ।।
कृतवर्मा के राजदुलारे, रानी जयश्यामा के प्यारे ।।
मंगलीक शुभ सपने सारे, जगजननी ने देखे न्यारे ।।
शुक्ल चतुर्थी माघ मास की, जन्म जयन्ती विमलनाथ की ।।
जन्योत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया ।।
मेरु पर अभिषेक कराया, गन्धोंदक श्रद्धा से लगाया ।।
वस्त्राभूषण दिव्य पहनाकर, मात-पिता को सौंपा आकर ।।
साठ लाख वर्षायु प्रभु की, अवगाहना थी साठ धनुष की ।।
कंचन जैसी छवि प्रभु- तन की, महिमा कैसे गाऊँ मैं उनकी ।।
बचपन बीता, यौवन आया, पिता ने राजतिलक करवाया ।।
चयन किया सुन्दर वधुओं का, आयोजन किया शुभ विवाह का ।।
एक दिन देखी ओस घास पर, हिमकण देखें नयन प्रीतिभर ।।
हुआ संसर्ग सूर्य रश्मि से, लुप्त हुए सब मोती जैसे ।।
हो विश्वास प्रभु को कैसे, खड़े रहे वे चित्रलिखित से ।।
“क्षणभंगुर है ये संसार, एक धर्म ही है बस सार ।।
वैराग्य हृदय में समाया, छोडे क्रोध -मान और माया ।।
घर पहुँचे अनमने से होकर, राजपाट निज सुत को देकर ।।
देवीमई शिविका पर चढ़कर, गए सहेतुक वन में जिनवर ।।
माघ मास-चतुर्थी कारी, “नम: सिद्ध” कह दीक्षाधारी ।।
रचना समोशरण हितकार, दिव्य देशना हुई सुरवकार ।।
उपशम करके मिथ्यात्व का, अनुभव करलो निज आत्म का ।।
मिथ्यात्व का होय निवारण, मिटे संसार भ्रमण का कारणा ।।
बिन सम्यक्तव के जप-तप-पूजन, विष्फल हैँ सारे व्रत- अर्चन ।।
विषफल हैं ये विषयभोग सब, इनको त्यागो हेय जान अब ।।
द्रव्य- भाव्-नो कमोदि से, भिन्न हैं आत्म देव सभी से ।।
निश्चय करके हे निज आतम का, ध्यान करो तुम परमात्म का ।।
ऐसी प्यारी हित की वाणी, सुनकर सुखी हुए सब प्राणी ।।
दूर-दूर तक हुआ विहार, किया सभी ने आत्मोद्धारा ।।
‘मन्दर’ आदि पचपन गणधर, अड़सठ सहस दिगम्बर मुनिवर ।।
उम्र रही जब तीस दिनों क, जा पहुँचे सम्मेद शिखर जी ।।
हुआ बाह्य वैभव परिहार, शेष कर्म बन्धन निरवार ।।
आवागमन का कर संहार, प्रभु ने पाया मोक्षागारा ।।
षष्ठी कृष्णा मास आसाढ़, देव करें जिनभवित प्रगाढ़ ।।
सुबीर कूट पूजें मन लाय, निर्वाणोत्सव को’ हर्षाय ।।
जो भवि विमलप्रभु को ध्यावें। वे सब मन वांछित फल पावें ।।
‘अरुणा’ करती विमल-स्तवन, ढीले हो जावें भव-बन्धन ।।

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