रविवार, 14 जून 2026

श्री मल्लिनाथ चालीसा | सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, लाभ एवं महत्व (Mallinath Chalisa)

जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ-
जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में भगवान मल्लिनाथ का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पूजनीय है। वे जैन परंपरा के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं, जिनकी भक्ति से भक्तों के जीवन में शांति, ज्ञान और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। "श्री मल्लिनाथ चालीसा" एक ऐसी पवित्र स्तुति है जिसमें भगवान मल्लिनाथ के जीवन, उनके त्याग, तपस्या और केवलज्ञान की प्राप्ति का अद्भुत वर्णन किया गया है। यह चालीसा न केवल एक धार्मिक रचना है, बल्कि यह आत्मा की उन्नति का मार्गदर्शक भी है।
प्रतिदिन इस चालीसा का पाठ करने से भक्त के जीवन में रोग, शोक और संकट दूर होते हैं। मन को शांति मिलती है और आत्मा परमात्मा की ओर उन्मुख होती है। इस लेख में हम श्री मल्लिनाथ चालीसा के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे — उनका जन्म, जीवन, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष — और जानेंगे कि यह चालीसा हमारे जीवन को किस प्रकार सुख और समृद्धि से भर सकती है।

भगवान मल्लिनाथ का परिचय-
भगवान मल्लिनाथ जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं। उनका जन्म मिथिला नगरी में हुआ था, जो आज के बिहार राज्य में स्थित है। उनके पिता का नाम राजा कुम्भ था और उनकी माता एक अत्यंत सात्विक और धर्मपरायण महिला थीं। भगवान मल्लिनाथ के जन्म के समय मिथिला नगरी में रत्नों की वृष्टि हुई थी, जो इस बात का संकेत था कि यह बालक साधारण नहीं, बल्कि संसार को मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला महान आत्मा है।
चालीसा में इस अद्भुत पल का वर्णन इस प्रकार किया गया है:
मिथिला नगरी धन्य हो गयी। रत्नों की वृष्टि भी हो गयी।
राजा कुम्भ घर शहनाई। माँ आंगन में बजी बधाई।।
भगवान मल्लिनाथ के जन्म के समय इंद्र ने स्वयं आकर तांडव नृत्य किया, देवताओं ने उत्सव मनाया और समस्त प्रकृति ने उनके स्वागत में अपनी छटा बिखेरी। वृक्ष फलों से लद गए, बागों में फूल खिल उठे और कोयल ने मीठे गीत गाए। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि भगवान मल्लिनाथ के रूप में संसार में एक असाधारण आत्मा का अवतरण हुआ है।
बाल्यकाल और आध्यात्मिक चेतना
भगवान मल्लिनाथ बचपन से ही अन्य बच्चों से बिल्कुल अलग थे। जहाँ अन्य बालक खेल-कूद में मग्न रहते थे, वहीं मल्लिनाथ जी ज्ञान, सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते थे। मात्र आठ वर्ष की आयु में ही उन्होंने अणुव्रत धारण कर लिए थे — यह वे पाँच छोटे व्रत हैं जो जैन गृहस्थ धर्म की नींव माने जाते हैं।
चालीसा में उनके बाल्यकाल की इस विशेषता का सुंदर वर्णन है:
आठ वर्ष में अणुव्रत धारे। सब बालक में वे थे न्यारे।।
आगम के अनुरूप थी चर्या। चलने में समती थी ईर्या।।
उनकी वाणी में जिनवाणी की मिठास थी। वे कभी किसी को नहीं सताते थे, सबको अच्छी बातें बताते थे। छोटी सी आयु में ही वे ऐसे गुरु प्रतीत होते थे जिनके पास बैठकर नर-नारी दोनों को मन की शांति मिलती थी। उनके भावों की शुद्धता और आत्मा की पवित्रता देखकर सभी उनके प्रति श्रद्धा से नत हो जाते थे।
मति, श्रुति और अवधि — इन तीनों ज्ञानों के वे धारक थे। इतनी कम आयु में इतना गहन ज्ञान होना यह सिद्ध करता था कि भगवान मल्लिनाथ वास्तव में एक महान तीर्थंकर के रूप में इस संसार में आए थे।

वैराग्य और दीक्षा ग्रहण-
जब युवावस्था आई, तो माता-पिता ने विवाह की तैयारी शुरू कर दी। महलों को सजाया गया, मिथिलापुर में उत्सव की तैयारियाँ हुईं। किंतु भगवान मल्लिनाथ के मन में संसार के प्रति वैराग्य पहले से ही जड़ जमा चुका था। उन्होंने विवाह करने से इनकार कर दिया, क्योंकि वे जानते थे कि संसार के ये क्षणभंगुर सुख आत्मा की मुक्ति में बाधक हैं।

चालीसा में इस महत्वपूर्ण मोड़ का वर्णन बड़े ही भावपूर्ण तरीके से किया गया है:
किंतु मन वैराग्य समाया। शादी करना मन न भाया।।
बने दिगम्बर लेली दीक्षा। क्षणभंगुर सुख तज दी इच्छा।।

भगवान मल्लिनाथ जी को वैराग्य उत्पत्ति एवं दिगम्बर दीक्षा ग्रहण करना-
अर्थात् उन्होंने समस्त वस्त्रों, संपत्ति और सांसारिक संबंधों का त्याग कर दिया। यह दीक्षा केवल बाहरी त्याग नहीं थी, बल्कि यह आंतरिक इच्छाओं, अहंकार और मोह से भी मुक्ति का संकल्प था। दिगम्बर दीक्षा का अर्थ है आकाश को ही वस्त्र मान लेना — यानी प्रकृति के साथ एकाकार होकर आत्मसाधना में लीन हो जाना।
यह साहसिक कदम हमें सिखाता है कि जब आत्मा में सच्चा वैराग्य जागता है, तो संसार की कोई भी सुख-सुविधा उसे रोक नहीं सकती। यह वैराग्य भय से नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक से उत्पन्न होता है।

तपस्या और केवलज्ञान की प्राप्ति-
दीक्षा ग्रहण करने के पश्चात् भगवान मल्लिनाथ वन में चले गए। वहाँ उन्होंने घोर तपस्या की। आत्मा में ध्यान लगाया और कर्मों को नष्ट करने का संकल्प लिया। उन्होंने मिथिला में ही एक बार आहार किया, जिसे पाकर नन्दीषेण को महान पुण्य प्राप्त हुआ।
चालीसा में इस तपस्या काल का वर्णन इस प्रकार है:
जंगल में ही वास बसाया। आतम में ही ध्यान लगाया।।
कर्म भी डरकर शीघ्र ही भागे। केवलज्ञान का दीप भी जागे।।
भगवान मल्लिनाथ की साधना के परिणामस्वरूप उनके सभी घाती कर्म नष्ट हो गए और उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। केवलज्ञान अर्थात् वह पूर्ण, असीमित और अनंत ज्ञान जो त्रिकाल और त्रिलोक को एक साथ जान लेता है। जब यह केवलज्ञान प्रकट हुआ, तो चारों दिशाओं में प्रकाश फैल गया।
इंद्र ने आज्ञा दी और धनकुबेर (कुबेर) ने समवसरण की रचना की। देवता और मनुष्य दौड़-दौड़कर आए और वीतराग प्रभु के दर्शन का लाभ उठाया। उनकी दिव्य मुद्रा को देखकर सूर्य और चंद्रमा भी फीके पड़ गए। यह वह क्षण था जब एक साधक तीर्थंकर के रूप में संसार के सामने प्रकट हुआ।

भगवान मल्लिनाथ की महिमा और चमत्कार-
जैन परंपरा में तीर्थंकरों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा जाता है कि उनके दर्शन मात्र से ही भक्तों के कष्ट दूर हो जाते हैं। चालीसा में भी भगवान मल्लिनाथ की इसी अलौकिक महिमा का वर्णन किया गया है:
अंधा प्रभु का दर्शन करता। लँगड़ा भी सीढ़ी चढ़ जाता।।
बेहरा प्रभु की वाणी सुनता। मिथ्यादृष्टि सिर को धुनता।।
पगले को बुद्धि मिल जाती। ध्यानी को मुक्ति मिल जाती।।
यह पंक्तियाँ हमें बताती हैं कि भगवान मल्लिनाथ के प्रति सच्ची आस्था और श्रद्धा रखने वाले भक्त को कभी निराशा नहीं होती। उनकी भक्ति से न केवल शारीरिक रोग और कष्ट दूर होते हैं, बल्कि मन की व्याकुलता भी शांत होती है। जो व्यक्ति मिथ्यादृष्टि (भ्रमित दृष्टिकोण) में फँसा है, वह भी उनकी शरण में आकर सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकता है।
दुष्ट कर्म उनके समीप नहीं आते, रोग-शोक और बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। यह महिमा केवल अंधविश्वास नहीं है, बल्कि जब भक्त सच्चे मन से वीतराग प्रभु का ध्यान करता है, तो उसका मन स्वयं ही शुद्ध और शांत हो जाता है, और शांत मन ही सभी रोगों की सबसे बड़ी औषधि है।

मोक्ष और परमातम पद की प्राप्ति-
भगवान मल्लिनाथ ने अपनी तपस्या और साधना के अंतिम चरण में श्री सम्मेद शिखर (झारखंड में स्थित जैनियों का सबसे पवित्र तीर्थ) पर जाकर योगनिरोध किया। योगनिरोध का अर्थ है — मन, वचन और काय की समस्त क्रियाओं को रोककर समाधि में लीन हो जाना।
चालीसा में इस परम घटना का वर्णन इस प्रकार है:
श्री सम्मेद शिखर जा पहुँचे। बैठे वहां पे आँखे मीचे।।
योगनिरोध से कर्म नशाये। फिर मुक्ति में वास वसाये।।
परमातम पद आपने पाया। भक्तों ने है शीश झुकाया।।
इस प्रकार भगवान मल्लिनाथ ने समस्त कर्मों को नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया और परमातम पद को प्राप्त किया। जैन दर्शन में मोक्ष का अर्थ है — आत्मा का उस अवस्था को प्राप्त करना जहाँ वह सभी कर्म-बंधनों से मुक्त होकर अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति को प्राप्त करती है। यही जैन धर्म का परम लक्ष्य है।

चालीसा पाठ का महत्व और लाभ-
श्री मल्लिनाथ चालीसा का नित्य पाठ करने से अनेक लाभ होते हैं। चालीसा के दोहे में स्पष्ट कहा गया है:
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि सिद्धि समृद्धि हो होवें भव से पार।।
लगातार चालीस दिनों तक इस चालीसा का पाठ करने से रिद्धि (भौतिक समृद्धि), सिद्धि (आध्यात्मिक उन्नति) और समृद्धि (सर्वांगीण विकास) की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही भव (संसार के जन्म-मृत्यु के चक्र) से पार जाने का मार्ग भी प्रशस्त होता है।

इस चालीसा का पाठ करने वाले भक्त को क्या लाभ प्राप्त होते हैं:
आत्मिक लाभ: मन में शांति आती है, आत्मा शुद्ध होती है और मुक्ति का मार्ग स्पष्ट होता है।
मानसिक लाभ: चिंता, भय और मानसिक अशांति दूर होती है। ध्यान की शक्ति बढ़ती है।
शारीरिक लाभ: रोग और बीमारियाँ दूर होती हैं। स्वास्थ्य में सुधार होता है।
सांसारिक लाभ: दुख और संकट कम होते हैं। जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

भक्ति का सार-
श्री मल्लिनाथ चालीसा केवल एक स्तुति नहीं है, यह एक जीवन-दर्शन है। इसमें हमें यह सिखाया गया है कि संसार के सुख क्षणभंगुर हैं और आत्मा की उन्नति ही जीवन का असली उद्देश्य है। भगवान मल्लिनाथ का जीवन हमें बताता है कि चाहे राजकुल में जन्म मिले, चाहे सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध हों — फिर भी जब आत्मा में सच्चा वैराग्य जागता है, तो साधक उन सबको छोड़कर मुक्ति के पथ पर चल देता है।
चालीसा की ये पंक्तियाँ विशेष रूप से मार्मिक हैं:
चिंतन में प्रभु मेरे रहना। और नही कुछ तुमसे कहना।।
शुद्ध भाव से तुमको ध्याऊँ। नित चरणों में शीश झुकाऊँ।।
यह भक्त की वह अवस्था है जहाँ वह परमात्मा से कुछ माँगता नहीं, बस उनके चरणों में अपना सिर झुकाता है और उनके चिंतन में लीन रहता है। यही सच्ची भक्ति है — निर्लोभ, निःस्वार्थ और शुद्ध।

निष्कर्ष-
श्री मल्लिनाथ चालीसा जैन परंपरा की एक अमूल्य धरोहर है। यह हमें भगवान मल्लिनाथ के जीवन की उस यात्रा से परिचित कराती है जो मिथिला के राजमहल से शुरू होकर सम्मेद शिखर पर मोक्ष में समाप्त होती है। इस यात्रा में त्याग है, तपस्या है, ज्ञान है और अंततः परम मुक्ति है।
जो भी भक्त सच्चे मन से इस चालीसा का पाठ करता है, वह न केवल अपने जीवन के कष्टों से राहत पाता है, बल्कि धीरे-धीरे आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। भगवान मल्लिनाथ का आशीर्वाद उन सभी पर बना रहे जो इस चालीसा को श्रद्धा के साथ पढ़ते हैं और उनके बताए हुए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
मल्लिनाथ भगवान से, विनती बारम्बार।
दुख संकट मेरे नशे, नमन है शत शत बार।।

दर्शकों आइये हम भी इस चालीसा का सम्पूर्ण पाठ करते है एवं आत्मोन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं-


।।श्री मल्लिनाथ चालीसा।।

दोहा:-
परमेष्ठी की भक्ति ही, करती पाप से दूर।
जिनवाणी की आरती, देती सुख भरपूर।।
मल्लिनाथ भगवान के, चरणन शीश झुकाये।
चालीसा मैं नित पढूं रोग शोक नश जाएं।।

चोपाई:-

ज्ञान ज्योति में मेरे जिनवर।
ध्यान मती में मेरे जिनवर।।
मल्लिनाथ जी नाम तुम्हारा।
चरणों में है नमन हमारा।।

सर्वगुणी और अनुपम ज्ञानी।
वाणी आपकी है जिनवाणी।।
मुक्ति सुख का आनन्द लेते।
भक्तों को शुभ ज्ञान भी देते।।

मिथिला नगरी धन्य हो गयी।
रत्नों की वृष्टि भी हो गयी।।
राजा कुम्भ घर शहनाई।
माँ आंगन में बजी बधाई।।

गर्भ, जन्म कल्याणक पाये।
सुर नर मिल उत्सव को गाये।।
खुश हो नाच नाचकर गाये।
तांडव नृत्य भी इंद्र दिखाये।।

बागों में आई फुलवारी।
वृक्ष फलों से लदे थे भारी।।
कोयल मीठे भजन सुनावे।
सबका मन पुलकित हो जावे।।

जिनवर मीठी बोली बोले।
मात- पिता सबका मन डोले।।
मति- श्रुति- अवधि ज्ञान के धारी।
भाव शुद्ध हो आत्मबिहारी।।

आठ वर्ष में अणुव्रत धारे।
सब बालक में वे थे न्यारे।।
आगम के अनुरूप थी चर्या।
चलने में समती थी ईर्या।।

नही किसी को आप सताते।
अच्छी अच्छी बात बताते।।
छोटे से गुरु आप ही लगते।
नर नारी के भाव उमड़ते।।

यौवन की जब बारी आई।
मात पिता ने करी सगाई।।
महलों में हो गयी तैयारी।
मिथिलापुर की शोभा न्यारी।।

किंतु मन वैराग्य समाया।
शादी करना मन न भाया।।
बने दिगम्बर लेली दीक्षा।
क्षणभंगुर सुख तज दी इच्छा।।

जंगल में ही वास बसाया।
आतम में ही ध्यान लगाया।।
मिथिला में आहार किया था।
नन्दीषेण ने पुण्य लिया था।।

कर्म भी डरकर शीघ्र ही भागे।
केवलज्ञान का दीप भी जागे।।
चारों और हुआ उजियाला।
भक्त फेरते आपकी माला।।

इंद्र ने आज्ञा तब कर दीनी।
धनकुबेर रचना कर दीनी।।
दौड़ दौड़कर सुर नर आये।
वीतराग प्रभु की छवि पाये।।

लख मुद्रा मोहित हो जाते।
सूर्य चाँद फीके पड़ जाते।।
दुष्ट कर्म भी पास न आवे।
रोग शोक बीमारी जावे।।

अंधा प्रभु का दर्शन करता।
लँगड़ा भी सीढ़ी चढ़ जाता।।
बेहरा प्रभु की वाणी सुनता।
मिथ्यादृष्टि सिर को धुनता।।

पगले को बुद्धि मिल जाती।
ध्यानी को मुक्ति मिल जाती।।
हम भी प्रभु जी भक्त तुम्हारे।
मिले आपके चरण सहारे।।

भाव विभाव सभी मिट जावे।
मुक्ति पथ पर हम भी जावे।।
क्षणभंगुर सुख की इच्छाएं।
हमको ये संसार घुमाएं।।

बस मन में शांति हो जावे।
हर क्षण तेरा ध्यान लगावे।।
श्री सम्मेद शिखर जा पहुँचे।
बैठे वहां पे आँखे मीचे।।

योगनिरोध से कर्म नशाये।
फिर मुक्ति में वास वसाये।।
परमातम पद आपने पाया।
भक्तों ने है शीश झुकाया।।

चिंतन में प्रभु मेरे रहना।
और नही कुछ तुमसे कहना।।
शुद्ध भाव से तुमको ध्याऊँ।
नित चरणों में शीश झुकाऊँ।।

दोहा:-
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि सिद्धि समृद्धि हो होवें भव से पार।।
मल्लिनाथ भगवान से, विनती बारम्बार।
दुख संकट मेरे नशे, नमन है शत शत बार।।

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