।। श्री अरहनाथ चालीसा ।। — चक्रवर्ती से सिद्ध परमेष्ठी तक की अलौकिक यात्रा
क्या आप जानते है भगवान अरहनाथ तीर्थंकर कामदेव और चक्रवर्ती पद के धारी थे। तीर्थंकरों की श्रृंखला में भगवान अरहनाथ जी शांतिनाथ और कुंथुनाथ भगवान के पश्चात तीसरे तीर्थंकर थे जो त्रयपद धारी कहलाते है।आज हम उनकी ही चालीसा और चरित्र प्रसंग के बारे में पढेंगे तो चलिए इस लेख को प्रारम्भ करते है।
जैन धर्म के अठारहवें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ — एक ऐसा नाम जो सुनते ही मन में भक्ति और श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ता है। "अरह" अर्थात् जो कर्मों के चक्र से परे हो गए हों। जिन्होंने न केवल छह खंडों पर राज किया, बल्कि उस सम्पूर्ण राज्य को एक पल में छोड़कर मोक्ष का वरण किया।
श्री अरहनाथ चालीसा उनकी इसी असाधारण जीवन-गाथा को शब्दों में पिरोती है। यह केवल एक स्तुति नहीं — यह उस आत्मा की कहानी है जो राजसिंहासन पर बैठकर भी भीतर से वैरागी थी। आइए इस दिव्य चालीसा के माध्यम से भगवान अरहनाथ के जीवन के हर पड़ाव को महसूस करें।
🌺 वन्दना — पाँच परमेष्ठी और जिनवाणी का महत्व-
चालीसा का आरंभ एक गहरे दार्शनिक भाव से होता है —
"पाँचों ही परमेष्ठी को, वन्दन बारम्बार।
जिनवाणी का ज्ञान ही, जीवन का आधार।।"
जैन धर्म में पाँच परमेष्ठी — अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु — को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इनकी वंदना से जीवन में सच्ची दिशा मिलती है। और जिनवाणी — अर्थात् तीर्थंकरों का उपदेश — यही हमारे जीवन का असली आधार है। संसार में जितने भी ग्रंथ, शास्त्र और विद्याएँ हैं, वे सब अधूरी हैं अगर आत्मज्ञान का बोध न हो।
भगवान अरहनाथ की वंदना के बारे में कहा गया है कि उनका नाम लेने मात्र से कर्मों का क्लेश कटता है और आत्मा का सच्चा स्वरूप प्रकट होने लगता है।
🏡 जन्म की दिव्य बेला — सोमवंश की शान-
भगवान अरहनाथ का जन्म सोमवंश में हुआ। उनके पिता का नाम सुदर्शन था — जो सम्यग्दृष्टि अर्थात् सच्चे ज्ञान के धारक थे — और माता का नाम मित्रसेना था।
जब तीर्थंकर के जन्म का समय निकट आया, तो प्रकृति ने स्वयं उसका स्वागत किया। माता मित्रसेना ने सोलह शुभ स्वप्न देखे — जो जैन परंपरा में तीर्थंकर के जन्म का संकेत माने जाते हैं। राजमहल में रत्नों की वृष्टि हुई। चारों दिशाओं में निर्मल वायु बहने लगी। छहों ऋतुएँ एक साथ अपनी सुंदरता बिखेरने लगीं और पूर्व दिशा में अलौकिक लालिमा छा गई।
चालीसा इस दृश्य को इन शब्दों में कैद करती है —
"चहुँ दिश निर्मल वायु बहती, छह ऋतुएँ भी संग-संग रहती।
सब प्राणी के मन खुशहाली, पूर्व दिशा में आई लाली।।"
इंद्र देवताओं के साथ धरती पर उतरे, जन्मकल्याणक का उत्सव मनाया और समस्त संसार में लक्ष्मी का वास हो गया। यह जन्म किसी साधारण राजपुत्र का नहीं था — यह एक युग-प्रवर्तक आत्मा का अवतरण था।
👑 चक्रवर्ती पद — छह खंडों का स्वामी-
यौवन आया तो राज्य मिला। विवाह हुआ और उनके जीवन में सांसारिक वैभव का हर रंग था। किंतु भगवान अरहनाथ यहीं नहीं रुके — उन्होंने चक्ररत्न को प्राप्त किया और चक्रवर्ती सम्राट बने।
चक्रवर्ती वह होता है जिसके राज्य में छहों खंड आते हैं — और जिसकी आज्ञा को षट्खंड के सभी राजा सिर माथे चढ़ाते हैं। भगवान अरहनाथ उस परम वैभव के स्वामी बने।
"षटखण्ड राजा शरण में आये, आज्ञा को सिर माथ चढ़ाये।"
वे कामदेव पदवी के धारी भी थे — अर्थात् उनका सौंदर्य इतना अनुपम था कि देखने वाले मोहित हो जाते थे। ऐसा व्यक्ति जिसके पास सब कुछ था — सत्ता, सौंदर्य, समृद्धि — उसका अगला कदम क्या था? यहीं से उनकी असली कहानी शुरू होती है।
🌧️ बादलों ने बदल दी जिंदगी की दिशा-
यह घटना बड़ी छोटी सी थी — किंतु इसने एक चक्रवर्ती सम्राट को वैरागी बना दिया।
एक दिन शरद ऋतु में भगवान अरहनाथ ने आकाश में बादलों को देखा। वे बादल फटे हुए थे — बिखरे हुए थे। और उस दृश्य ने उनके मन में संसार की नश्वरता का गहरा बोध करा दिया।
"शरद ऋतु के बादल देखे, फटे हुए थे कारण लेखे।
क्षणभंगुर संसार को जाना, पहना फिर वैराग्य का बाना।।"
जैसे बादल आते हैं, छा जाते हैं और फिर बिखर जाते हैं — ठीक वैसे ही यह संसार भी है। यह राज्य, यह सौंदर्य, यह वैभव — सब कुछ क्षणभंगुर है। इस एक अनुभूति ने उनके भीतर के वैराग्य को जगा दिया जो शायद जन्मों से सुप्त था।
कुम्भकार (कुम्हार) जैसे मिट्टी के चाक को एक पल में छोड़ देता है — वैसे ही भगवान अरहनाथ ने छह खंडों के चक्र को छोड़ दिया। गृहलक्ष्मी से नाता तोड़ा और संयम का मार्ग अपनाया।
🔱 दीक्षा — सम्राट से साधु तक-
दीक्षा के समय भगवान अरहनाथ ने पंचमुष्ठि केशलोंच किया — अर्थात् अपने हाथों से पाँच मुट्ठी में केश उखाड़े। यह क्रिया केवल शारीरिक नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक भी है — यह अहंकार, मोह और देह-आसक्ति को जड़ से उखाड़ने का संकल्प है।
उनके साथ एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ग्रहण की। एक सहज राजा विशेष रूप से उनके साथ आए। यह दृश्य कितना भव्य रहा होगा — एक सम्राट और उनके हजारों साथी, सब एक साथ संसार को छोड़कर आत्मसाधना की ओर चल पड़े।
"पँचमुष्ठी केशलोंच किया था, आतम निज में लीन किया था।
एक सहज राजा संग आये, दीक्षा ले संग ध्यान लगाये।।"
दीक्षा के बाद भगवान अरहनाथ वन में चले गए। मौन, ध्यान और तप — यही उनका जीवन बन गया।
🌟 केवलज्ञान — ज्ञान का दीपक जला-
वन में घोर तपस्या करते हुए भगवान अरहनाथ ने एक-एक कर्म को तप की अग्नि में जलाना शुरू किया। कर्मों की यह परतें आत्मा को ढकती हैं, उसके असली स्वरूप को छुपाती हैं। जैसे-जैसे ये परतें हटती गईं, आत्मा का प्रकाश और तेज होता गया।
और फिर वह दिव्य क्षण आया —
"तप अग्नि में कर्म जलाये, केवलज्ञान का दीप जलाये।
देवों ने आ पूजा कीनी, समवशरण रचना कर दीनी।।"
केवलज्ञान — वह परम प्रकाश जिसमें तीनों काल और तीनों लोक एक साथ प्रकाशित हो जाते हैं। देवताओं ने तुरंत आकर पूजा की और समवसरण की रचना की। भक्तों को स्थान मिला, हृदय खिल उठे और जिनवरमुद्रा ने ज्ञान-ध्यान का पाठ पढ़ाना शुरू किया।
📿 जिनवाणी का अमृत — चार गति से मुक्ति का मार्ग-
भगवान अरहनाथ की वाणी में एक ही संदेश था — आत्मा को पहचानो और कर्म-बंधन से मुक्त हो जाओ। उन्होंने चार गतियों — नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव — के दुखों का वर्णन करके भव्यजनों को सचेत किया।
चालीसा में भक्त की पुकार बड़ी मार्मिक है —
"चार गति से हमें छुड़ाओ, जग दुखों से हमें बचाओ।
ज्ञान किरण हमको दिखला दो, मुक्ति का रस्ता बतला दो।।"
और आगे भक्त की आकांक्षा और भी गहरी होती है —
"ज्ञानामृत का भोजन पाऊँ, और अमर इससे हो जाऊँ।।"
यह पंक्ति अद्भुत है। भक्त भोजन नहीं माँग रहा, धन नहीं माँग रहा — वह ज्ञानामृत माँग रहा है। वह अमरता माँग रहा है — और जैन दर्शन में यही सच्ची अमरता है — मोक्ष, जहाँ आत्मा फिर कभी जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं आती।
भगवान अरहनाथ के उपदेश का प्रभाव इतना गहरा था कि जिस-जिस ने उनका नाम लिया, उसका बेड़ा पार हो गया —
"जिस-जिस ने प्रभु नाम लिया था, उसका बेड़ापार हुआ था।"
🏔️ सम्मेद शिखर — अंतिम विश्राम और मोक्ष
विहार करते हुए, देश-देश में धर्म का प्रकाश फैलाते हुए अंत में भगवान अरहनाथ श्री सम्मेद शिखर पहुँचे — वह पवित्र भूमि जो जैन परंपरा में सबसे पूजनीय तीर्थ है और जहाँ असंख्य तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया है।
"श्री सम्मेद शिखर मन भाया, वहाँ से मुक्ति को पडराया।"
वहाँ योगनिरोध की अवस्था में रहकर, समस्त क्रियाओं को शांत करके उन्होंने शेष कर्मों को भी नष्ट किया और परम मोक्ष को प्राप्त हुए। आठों कर्म नष्ट हो गए और आत्मा सिद्धालय में विराजमान हो गई — अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त शक्ति के साथ।
🙏 भक्त का संकल्प — चालीसा की आत्मा
इस चालीसा में जो बात सबसे अलग और प्रभावशाली है, वह है भक्त का व्यक्तिगत संकल्प। भक्त केवल माँगता नहीं — वह बदलने का वादा भी करता है —
"पापकर्म से दूर हटेंगे, क्रोध मान से दूर रहेंगे।
भक्ति का पथ हमको प्यारा, क्षणभंगुर सुख इससे हारा।।"
यह पंक्तियाँ बताती हैं कि सच्ची भक्ति वह नहीं जो केवल मंदिर में सिर झुकाने से होती है। सच्ची भक्ति वह है जो जीवन में बदलाव लाए — क्रोध छूटे, मान (अहंकार) छूटे, पापकर्म से दूरी बने।
✨ चालीसा पाठ का फल
चालीसा के अंत में कहा गया है —
"चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि-सिद्धि मंगल करें, होवें भव से पार।।"
लगातार चालीस दिनों तक इस चालीसा का पाठ करने से रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है, जीवन में मंगल होता है और संसार के बंधन से मुक्ति का मार्ग खुलता है। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं — जब भक्त प्रतिदिन ऐसे शब्दों का पाठ करता है जो उसे वैराग्य, ज्ञान और आत्मशुद्धि की याद दिलाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से उसका जीवन बेहतर होने लगता है।
🌸 निष्कर्ष — अरहनाथ का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है
भगवान अरहनाथ का जीवन आज के युग में भी उतना ही प्रेरणादायक है। आज हम भी उसी दौड़ में हैं — धन, पद, प्रतिष्ठा। लेकिन एक फटा बादल किसी को भी यह याद दिला सकता है कि यह सब कितना अस्थायी है।
उनका संदेश सरल है — आत्मा की शरण लो, कर्म-बंधन तोड़ो और मुक्ति का मार्ग पकड़ो।
श्री अरहनाथ चालीसा का नित्य पाठ हमें इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
"श्री 'अर' प्रभु के चरण में, वन्दन शत-शत बार।
सबकी विपदायें हरो, विनती बारम्बार।।"
दर्शकों आईये अब हम पाठ करते हैं भगवान अरहनाथ जी के गुणों से युक्त प्रभु की मनोरम चालीसा का-
।।श्री अरहनाथ चालीसा।।
दोहा:-
पाँचों ही परमेष्ठी को, वन्दन बारम्बार।
जिनवाणी का ज्ञान ही, जीवन का आधार।।
श्री 'अरह' प्रभु की वन्दना, काटे कर्म क्लेश।
चालीसा पढ़कर मिले, सच्चा आतम भेष।।
चौपाई:-
सिद्धो की श्रेणी में रहते,
सिद्ध प्रभु हम आपको कहते।
आठों कर्मों को नाशा है,
सिद्धालय में ही वासा है।।
भक्तों के आराध्य आप हो,
भक्तों के भी साध्य आप हो।
साधन है 'अरह' नाम तुम्हारा,
मुक्ति का मिल जाये किनारा।।
नम्रीभूत जगत है सारा,
वन्दन करता बारम्बारा।
सोमवंश में जन्म है पाया,
मित्रसेना को माँ बतलाया।।
पिता सुदर्शन सम्यग्दृष्टि,
महल में होती रत्न की वृष्टि।
सोलह शुभ सपने लख माँ ने,
तीर्थंकर के जन्म को पाने।।
चहुँ दिश निर्मल वायु बहती,
छह ऋतुएँ भी संग- संग रहती।
सब प्राणी के मन खुशहाली,
पूर्व दिशा में आई लाली।।
इन्द्रों संग सुर भू पर आये,
कल्याणक खुशियाँ बरसाये।
लक्ष्मी ने आ डाला डेरा,
सबके दुर्दिन को है फेरा।।
तीर्थंकर की महिमा गाई,
बस 'अर' प्रभु का नाम सहाई।
जब यौवन का मौसम आया,
कन्यायों को फिर परिणाया।।
राज्य पिता ने तुमको दीना,
न्याय से प्रभु ने कार्य को कीना।
चक्ररत्न ने स्वामी माना,
चक्रवर्ती बन विजय को जाना।।
षटखण्ड राजा शरण में आये,
आज्ञा को सिर माथ चढाये।
स्वप्न में भी खुद पास न आता,
जोड़ा फिर आतम से नाता।।
कामदेव पदवी के धारी,
किससे उपमा करें तुम्हारी।
देख सभी मोहित हो जाते,
बात कोई वे सोच न पाते।।
शरद ऋतु के बादल देखे,
फटे हुए थे कारण लेखे।
क्षणभंगुर संसार को जाना,
पहना फिर वैराग्य का बाना।।
कुम्भकार सम चक्र को छोड़ा,
गृहलक्ष्मी से नाता तोड़ा।
दीक्षा ले संयम को धारा,
नश्वर सुख को दिया किनारा।।
पँचमुष्ठी केशलोंच किया था,
आतम निज में लीन किया था।
एक सहज राजा संग आये,
दीक्षा ले संग ध्यान लगाये।।
तप अग्नि में कर्म जलाये,
केवलज्ञान का दीप जलाये।
देवों ने आ पूजा कीनी,
समवशरण रचना कर दीनी।।
भक्तों को स्थान मिला था,
भक्त हृदय भी शीघ्र खिला था।
जिनवरमुद्रा पाठ पढ़ाती,
ज्ञान- ध्यान की याद दिलाती।।
जिस- जिस ने प्रभु नाम लिया था,
उसका बेड़ापार हुआ था।
चार गति से हमें छुड़ाओ,
जग दुखों से हमें बचाओ।।
कर्म-बन्ध ढीले हो जाये,
तब ही प्रभु हम शरण में आये।
सच्चे हृदय से भक्ति करेंगे,
मन से प्रभुजी जाप करेंगे।।
पापकर्म से दूर हटेंगे,
क्रोध मान से दूर रहेंगे।
भक्ति का पथ हमको प्यारा,
क्षणभंगुर सुख इससे हारा।।
ज्ञान किरण हमको दिखला दो,
मुक्ति का रस्ता बतला दो।
ज्ञानामृत का भोजन पाऊँ,
और अमर इससे हो जाऊँ।।
श्री सम्मेद शिखर मन भाया,
वहाँ से मुक्ति को पडराया।
बार- बार मैं अरज करूँगा,
चरण आपके सदा रहूँगा।।
दोहा:-
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि- सिद्धि मंगल करें, होवें भव से पार।।
श्री 'अर' प्रभु के चरण में, वन्दन शत-शत बार।
सबकी विपदायें हरो, विनती बारम्बार।।
दोहा:-
पाँचों ही परमेष्ठी को, वन्दन बारम्बार।
जिनवाणी का ज्ञान ही, जीवन का आधार।।
श्री 'अरह' प्रभु की वन्दना, काटे कर्म क्लेश।
चालीसा पढ़कर मिले, सच्चा आतम भेष।।
चौपाई:-
सिद्धो की श्रेणी में रहते,
सिद्ध प्रभु हम आपको कहते।
आठों कर्मों को नाशा है,
सिद्धालय में ही वासा है।।
भक्तों के आराध्य आप हो,
भक्तों के भी साध्य आप हो।
साधन है 'अरह' नाम तुम्हारा,
मुक्ति का मिल जाये किनारा।।
नम्रीभूत जगत है सारा,
वन्दन करता बारम्बारा।
सोमवंश में जन्म है पाया,
मित्रसेना को माँ बतलाया।।
पिता सुदर्शन सम्यग्दृष्टि,
महल में होती रत्न की वृष्टि।
सोलह शुभ सपने लख माँ ने,
तीर्थंकर के जन्म को पाने।।
चहुँ दिश निर्मल वायु बहती,
छह ऋतुएँ भी संग- संग रहती।
सब प्राणी के मन खुशहाली,
पूर्व दिशा में आई लाली।।
इन्द्रों संग सुर भू पर आये,
कल्याणक खुशियाँ बरसाये।
लक्ष्मी ने आ डाला डेरा,
सबके दुर्दिन को है फेरा।।
तीर्थंकर की महिमा गाई,
बस 'अर' प्रभु का नाम सहाई।
जब यौवन का मौसम आया,
कन्यायों को फिर परिणाया।।
राज्य पिता ने तुमको दीना,
न्याय से प्रभु ने कार्य को कीना।
चक्ररत्न ने स्वामी माना,
चक्रवर्ती बन विजय को जाना।।
षटखण्ड राजा शरण में आये,
आज्ञा को सिर माथ चढाये।
स्वप्न में भी खुद पास न आता,
जोड़ा फिर आतम से नाता।।
कामदेव पदवी के धारी,
किससे उपमा करें तुम्हारी।
देख सभी मोहित हो जाते,
बात कोई वे सोच न पाते।।
शरद ऋतु के बादल देखे,
फटे हुए थे कारण लेखे।
क्षणभंगुर संसार को जाना,
पहना फिर वैराग्य का बाना।।
कुम्भकार सम चक्र को छोड़ा,
गृहलक्ष्मी से नाता तोड़ा।
दीक्षा ले संयम को धारा,
नश्वर सुख को दिया किनारा।।
पँचमुष्ठी केशलोंच किया था,
आतम निज में लीन किया था।
एक सहज राजा संग आये,
दीक्षा ले संग ध्यान लगाये।।
तप अग्नि में कर्म जलाये,
केवलज्ञान का दीप जलाये।
देवों ने आ पूजा कीनी,
समवशरण रचना कर दीनी।।
भक्तों को स्थान मिला था,
भक्त हृदय भी शीघ्र खिला था।
जिनवरमुद्रा पाठ पढ़ाती,
ज्ञान- ध्यान की याद दिलाती।।
जिस- जिस ने प्रभु नाम लिया था,
उसका बेड़ापार हुआ था।
चार गति से हमें छुड़ाओ,
जग दुखों से हमें बचाओ।।
कर्म-बन्ध ढीले हो जाये,
तब ही प्रभु हम शरण में आये।
सच्चे हृदय से भक्ति करेंगे,
मन से प्रभुजी जाप करेंगे।।
पापकर्म से दूर हटेंगे,
क्रोध मान से दूर रहेंगे।
भक्ति का पथ हमको प्यारा,
क्षणभंगुर सुख इससे हारा।।
ज्ञान किरण हमको दिखला दो,
मुक्ति का रस्ता बतला दो।
ज्ञानामृत का भोजन पाऊँ,
और अमर इससे हो जाऊँ।।
श्री सम्मेद शिखर मन भाया,
वहाँ से मुक्ति को पडराया।
बार- बार मैं अरज करूँगा,
चरण आपके सदा रहूँगा।।
दोहा:-
चालीसा चालीस दिन, पढ़ना है सुखकार।
रिद्धि- सिद्धि मंगल करें, होवें भव से पार।।
श्री 'अर' प्रभु के चरण में, वन्दन शत-शत बार।
सबकी विपदायें हरो, विनती बारम्बार।।
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