दर्शकों आज हम भगवान बाहुबली का विश्व प्रसिद्ध भजन होली खेले युवराज बाहुबली होली खेले रे इस भजन का पाठन करेंगे और भगवान बाहुबली के गुणों
को समझेंगे कैसे भगवान बाहुबली नर से नारायण बनने की यात्रा में आगे बढ़े-
होली खेले युवराज बाहुबली — भरत और बाहुबली की वह अमर गाथा जो जैनागम में अमर है
दो भाई। एक ही पिता। एक ही महल। एक ही होली।
और फिर — दो बिल्कुल अलग रास्ते।
एक रास्ता चक्रवर्ती सम्राट बना। दूसरा रास्ता प्रथम केवली।
जब यह भजन कानों में पड़ता है — "होली खेले युवराज बाहुबली, भरत संग होली खेले रे" — तो मन में एक चित्र उभरता है। अयोध्या का वह स्वर्णिम महल। दो राजकुमार। रंगों की बौछार। हँसी-ठिठोली। और एक माँ जो दूर से यह सब देखकर मुस्कुरा रही है।
लेकिन यह भजन केवल होली का उत्सव नहीं है। यह उस गहरी जैन दार्शनिक कथा का काव्यात्मक रूप है जो हमें बताती है — संसार में साथ खेलने वाले भाई भी जब कर्म की राह पर चलते हैं, तो उनकी मंजिलें अलग हो जाती हैं।
आइए जैनागम के आलोक में इस भजन की गहराई को समझें।
🏰 अयोध्या का वह सुनहरा दौर — जब दोनों भाई साथ थे
जैनागम के अनुसार भगवान ऋषभनाथ (आदिनाथ) — जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं — के सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े थे भरत और उनसे छोटे थे बाहुबली।
भरत की माता का नाम सुमंगला था और बाहुबली की माता का नाम सुनन्दा था। दोनों ही भगवान ऋषभनाथ की पत्नियाँ थीं। भजन में इसी तथ्य को सुंदर प्रश्नोत्तर शैली में प्रस्तुत किया गया है —
"कौन सा देश, कहाँ के राजा, कौन पिता कहलाय...
मात सुनन्दा जाय बाहुबली..."
भारत देश। अयोध्या नगरी। ऋषभनाथ पिता। सुनन्दा माता।
यह परिचय केवल वंशावली नहीं है — यह उस युग का परिचय है जब इस धरती पर पहली बार सभ्यता का सूर्योदय हो रहा था। भगवान ऋषभनाथ ने ही इस युग के मनुष्यों को कृषि, शिल्प, व्यापार और समाज व्यवस्था सिखाई थी। उनके पुत्र भरत और बाहुबली उसी युग के दो सबसे तेजस्वी राजकुमार थे।
भजन में उनकी बाल-छवि का वर्णन मन को मोह लेता है —
"चंदा सूरज सी छवि जिनकी, क्या क्या नाम धराये,
करत कलोल महल में दोनों सब मन भाय रे..."
भरत — सूर्य जैसे तेजस्वी। बाहुबली — चंद्रमा जैसे शीतल और सौम्य। दोनों महल में मिलकर खेलते थे, होली खेलते थे, हँसते थे। यह वह निर्मल बचपन था जिसमें न राज्य की चिंता थी, न सीमाओं का विवाद।
👑 ऋषभनाथ का वैराग्य — और राज्य का बँटवारा
जैनागम बताता है कि एक दिन इंद्र की सभा में नीलांजना नामक देवांगना नृत्य करते-करते अचानक काल के गाल में समा गई। यह दृश्य देखकर भगवान ऋषभनाथ के मन में संसार की नश्वरता का गहरा बोध हुआ।
भजन इसे बड़े सरल शब्दों में कहता है —
"कालचक्र की गति है न्यारी, ऋषभ भये वैरागी,
वेष दिगम्बर धार करम संग होली खेले रे..."
यहाँ "करम संग होली खेले" का अर्थ अत्यंत गहरा है। भगवान ऋषभनाथ ने दिगम्बर वेष धारण करके कर्मों के साथ होली खेली — अर्थात् कर्मों को जलाकर भस्म कर दिया। जैसे होली में पुरानी बुराइयाँ जलाई जाती हैं, वैसे ही उन्होंने अपने कर्म जलाए।
दीक्षा लेने से पूर्व भगवान ऋषभनाथ ने अपना राज्य अपने पुत्रों में बाँटा। भरत को अयोध्या का राज्य मिला — जो सबसे बड़ा और वैभवशाली था। बाहुबली को पोदनपुर (तक्षशिला) का राज्य मिला। शेष 98 पुत्रों को भी विभिन्न राज्य दिए गए।
⚔️ भरत-बाहुबली संग्राम — जैनागम की महाकथा
यहाँ से कहानी उस मोड़ पर आती है जो इतिहास, दर्शन और अध्यात्म तीनों को एक साथ छूती है।
भगवान ऋषभनाथ के दीक्षा लेने के बाद भरत ने दिग्विजय अभियान शुरू किया। उनके पास चक्ररत्न था — जो चक्रवर्ती का प्रतीक है। एक-एक कर सभी राजा भरत के सामने झुकते गए। षट्खंड जीते गए।
लेकिन जब चक्ररत्न भरत की अयोध्या वापस आया तो वह नगर के द्वार पर रुक गया। शकुन शास्त्र के अनुसार इसका अर्थ था — अभी कोई राजा शेष है जिसने अधीनता स्वीकार नहीं की।
वह राजा थे — बाहुबली।
भरत ने बाहुबली को संदेश भेजा — अधीनता स्वीकार करो।
बाहुबली ने उत्तर दिया — मैं किसी के अधीन नहीं।
युद्ध की तैयारी हुई। लेकिन जैनागम के अनुसार दोनों पक्षों के मंत्रियों ने सुझाव दिया कि लाखों सैनिकों का रक्त बहाने की बजाय तीन प्रकार के द्वंद्व से निर्णय हो —
दृष्टियुद्ध (एक-दूसरे को देखते रहना — जो पहले आँख झुकाए वह हारा), जलयुद्ध (जल में एक-दूसरे को पराजित करना) और मल्लयुद्ध (कुश्ती)।
तीनों में बाहुबली विजयी हुए।
अब बाहुबली के हाथ में था भरत को उठाकर पटकने का क्षण। और वे यह कर भी सकते थे। लेकिन उसी क्षण उनके मन में एक विचार आया —
"मैं अपने बड़े भाई को मारने जा रहा हूँ? यह क्या कर रहा हूँ मैं? यह राज्य किसलिए? क्या यही जीवन का उद्देश्य है?"
उन्होंने अपना हाथ रोक लिया।
और उसी क्षण — एक चक्रवर्ती को जीतने वाले बाहुबली के भीतर वैराग्य का उदय हुआ।
🌿 बाहुबली का वैराग्य — सबसे नाटकीय त्याग
बाहुबली ने उसी रणभूमि में खड़े-खड़े अपने केश उखाड़े और दिगम्बर दीक्षा ले ली।
जैनागम में यह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। वे पोदनपुर की ओर पैदल चल पड़े — लेकिन रास्ते में ही एक वन में रुककर ध्यान में स्थिर हो गए। एक वर्ष तक वे निश्चल खड़े रहे। इतने निश्चल कि उनके पैरों में बाँबी बन गई, शरीर पर लताएँ लिपट गईं, पक्षियों ने घोंसले बना लिए।
लेकिन केवलज्ञान नहीं हुआ।
क्यों?
जैनागम का उत्तर अत्यंत सूक्ष्म है — उनके मन में अभी भी एक सूक्ष्म अहंकार था। वे सोचते थे — "मैंने चक्रवर्ती भरत को जीता। मैं इस वन में खड़ा हूँ। यह साधना मेरी है।"
यह "मेरी" — यही एक शब्द केवलज्ञान में बाधा था।
तब भगवान ऋषभनाथ की पुत्रियाँ (बाहुबली की बहनें) ब्राह्मी और सुंदरी आईं। उन्होंने बाहुबली से कहा —
"हाथी से उतरो।"
बाहुबली चौंके — "मैं तो वन में खड़ा हूँ, कहाँ का हाथी?"
तब उन्हें बोध हुआ — अहंकार रूपी हाथी पर अभी भी सवार हैं।
उसी क्षण अहंकार गला। और केवलज्ञान प्रकट हुआ।
🏆 प्रथम केवली — आदिनाथ से भी पहले
यह जैनागम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है जिसे भजन ने बड़े सुंदर ढंग से कहा है —
"आदिनाथ से पूर्व बाहुबली मुक्ति पाये रे,
केवली प्रथम कहाये रे..."
भगवान बाहुबली इस अवसर्पिणी काल के प्रथम केवली बने — अर्थात् भगवान ऋषभनाथ (जो स्वयं तीर्थंकर थे) से भी पहले बाहुबली को केवलज्ञान हुआ। यह इस बात का प्रमाण है कि तीर्थंकर का पद और केवलज्ञान अलग-अलग हैं। तीर्थंकर वह होता है जो धर्म-तीर्थ की स्थापना करता है — और वह पद पूर्व जन्मों की विशेष साधना से मिलता है।
बाहुबली तीर्थंकर नहीं थे — पर वे प्रथम केवली थे। यह उनकी अपनी विशिष्ट महिमा है।
🗿 गोम्मटेश — वह विशाल प्रतिमा जो युगों से मौन खड़ी है
भगवान बाहुबली की उसी ध्यानस्थ मुद्रा को — जब वे एक वर्ष तक निश्चल खड़े थे — श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में विश्व की सबसे ऊँची एकाश्म प्रतिमा के रूप में स्थापित किया गया है।
गोम्मटेश — यही नाम है उनका। 57 फुट ऊँची यह प्रतिमा ग्रेनाइट पत्थर से बनी है। पैरों में बाँबी, शरीर पर लताएँ — सब कुछ उकेरा गया है। यह प्रतिमा केवल पत्थर नहीं — यह उस संदेश का मूर्त रूप है कि जब अहंकार जाता है, तब ज्ञान आता है।
हर बारह वर्ष में एक बार महामस्तकाभिषेक होता है — जब हजारों भक्त मिलकर इस विशाल प्रतिमा पर दूध, दही, केसर और पुष्पों से अभिषेक करते हैं। यह दृश्य अपने आप में अलौकिक होता है।
🎨 भजन का दर्शन — होली का असली रंग
अब इस भजन को फिर से सुनिए —
"होली खेले युवराज बाहुबली, भरत संग होली खेले रे..."
यह होली केवल रंगों की होली नहीं है। यह जीवन की होली है।
भरत ने सत्ता के रंग में होली खेली — और चक्रवर्ती बने।
बाहुबली ने वैराग्य के रंग में होली खेली — और प्रथम केवली बने।
ऋषभनाथ ने मोक्ष के रंग में होली खेली — और तीर्थंकर पद पाया।
तीनों ने होली खेली — पर तीनों के रंग अलग थे। और तीनों की मंजिल भी अलग।
जैनागम हमें यही सिखाता है — यह संसार एक रंगमंच है। हर आत्मा यहाँ अपनी-अपनी होली खेलती है। लेकिन जो आत्मा कर्मों की होली जलाकर आत्मा के असली रंग को पहचान लेती है — वही सच्ची विजेता है।
🙏 निष्कर्ष — बाहुबली का संदेश आज के लिए
भरत और बाहुबली की यह कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
आज भी दो भाई संपत्ति के लिए लड़ते हैं। आज भी अहंकार ज्ञान को रोकता है। और आज भी वह एक पल आता है जब कोई बाहुबली की तरह रुककर सोचता है — "यह सब किसलिए?"
भगवान बाहुबली का जीवन हमें बताता है —
जीतना बड़ी बात नहीं। जीतकर छोड़ देना — यही सबसे बड़ी जीत है।
"कर्म काट शिवपुर को ध्याये, तीर्थंकर पद पाये,
आदिनाथ से पूर्व बाहुबली मुक्ति पाये रे...
तो चलिए दर्शकों हम पढ़ते है इस सुंदर भजन को-
।।गोम्मटेश भजन।।
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे...... 2
कौन सा देश, कहाँ के राजा, कौन पिता कहलाय...2
कौन मात के जाय बाहुबली, होली खेले रे...
महल में होली खेले रे...2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे......2
भारत देश में राज्य अयोध्या, ऋषभनाथ सुत पाय,
मात सुनन्दा जाय बाहुबली, होली खेले रे...
महल में होली खेले रे...2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे......2
चंदा सूरज सी छवि जिनकी, क्या क्या नाम धराये,
करत कलोल महल में दोनों सब मन भाय रे...2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे......2
भरत बड़े, बाहुबली छोटे, नाम जगत में पायें... 2
दो बहनों संग दोनों भैया होली खेले रे...
महल में होली खेले रे....
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे......2
कालचक्र की गति है न्यारी, ऋषभ भये वैरागी,
वेष दिगम्बर धार करम संग होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे...
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे......2
कर्म काट शिवपुर को ध्याये, तीर्थंकर पद पाये...2
आदिनाथ से पूर्व बाहुबली मुक्ति पाये रे....
केवली प्रथम कहाये रे....
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे......2
होली खेले युवराज बाहुबली, होली खेले रे...
भरत संग होली खेले रे...... 2
कौन सा देश, कहाँ के राजा, कौन पिता कहलाय...2
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